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राजनीति में विलुप्त होती वैचारिकता

राजनीति में विलुप्त होती वैचारिकता

राजनीति में वैचारिकता और सिद्धांत दोनों विलुप्त होते जा रहे हैं। राजनीति, सत्ता हासिल करने की सीढ़ी बन गई है और इन सीढिय़ों पर चढऩे की ऊर्जा देने का काम स्वार्थ कर रहा है। इसीलिए दलगत पलायन का ऐसा दौर शुरू हो गया है कि सुबह किसी दल में रहने वाला व्यक्ति शाम को किसी और दल का हो जाता है। ढ़ाई दशक में नए दल और दलबदल के कई कीर्तिमान स्थापित हुए हैं। वैचारिक राजनीति को कुचलने वालों में राजनीतिक परिवार सबसे शीर्ष पर है। इसमें सबसे अधिक पतन कांग्रेस का हुआ है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के वैचारिक समझौते वाली नीति से आहत होकर कई बड़े नेताओं ने पार्टी से किनारा कर लिया था। 70 के दशक में कांग्रेस में मनमानी की नीति के चलते कई वैचारिक प्रतिवद्धता वाले लोगों को या तो निकाल दिया गया, या उन्हें पार्टी छोडऩे के लिए विवश कर दिया गया। 90 के दशक में कांग्रेस परिवारवाद में तब्दील हो गई, उसके बाद विचारधारा ने कांग्रेस का साथ पूरी तरह से छोड़ दिया।

उस दौर से कांग्रेस से पलायन का सिलसिला जो चला वह अभी तक थमा नहीं है। हाल के दिनों में हेमंत विश्व सरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद वैचारिकता से इतर सत्तावाद के बड़े उदाहरण हैं। इसी में सचिन पायलट उस किनारे पर खड़े हैं जो कभी भी कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य दल में जा सकते हैं। दरअसल, किसी भी पार्टी की सबसे मजबूत कड़ी कार्यकर्ता होता है। वैचारिक भट्टी पर तपकर जो कार्यकर्ता निर्मित होता है, वह सहजता से पलायन नहीं करता। यदि वह दल छोड़ता भी है, तो किसी अन्य दल में जाने में वह असहज महसूस करता है। इसलिए या तो वह अपना अलग दल बना लेता है या फिर राजनीति से खुद को दूर कर लेता है। इसमें भाजपा अपवाद है। भारतीय जनता पार्टी एक मात्र ऐसी पार्टी है, जिसके विचारधारा से जुड़े नेता ने यदि पार्टी को छोड़ा भी है तो वह किसी अन्य दल में नहीं गये। चाहे वह मध्य प्रदेश में उमा भारती हों, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह हों, झारखंड में बाबूराम मरांडी हों या राजस्थान के घनश्याम तिवाड़ी हों, इन्होंने अपना दल बनाया। भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन किसी अन्य दल में नहीं गए। वापसी भी किए तो भाजपा में और उसी वैचारिकता के साथ, जिसमें तपकर वह राजनीतिक रूप से परिपक्व हुए थे।

आखिर वैचारिक पतन का कारण क्या है? वास्तव में अब राजनीति की परिभाषा  बदल गई है। राजनीति का मतलब सार्वजनिक हित नहीं रह गया, बल्कि स्वहित हो गया है। राजनीतिक परिवार में पले-बढ़े युवा पावर पालिटिक्स के आदी हो गए हैं। उन्हें पावर में रहने की आदत पड़ चुकी है। वह सत्ता के बिना नहीं रह सकते। ऐसे में उनके पास पलायन के अलावा कोई और विकल्प नहीं सूझता। वास्तव में परिवारवादी राजनीति से आने वालों को कार्यकर्ता की तरह तपाया नहीं जाता, अपितु उनकी राजनीति चमकाने के लिए वैचारिक भट्टी से तपाए गए कार्यकर्ताओं की टोली लगाई जाती है। उसी टोली के संघर्ष के दम पर राजनीतिक परिवार की पीढ़ी स्वार्थ की सीढ़ी चढ़ते हुए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचती है। इनका ना विचारधारा से कोई सरोकार होता और ना सिद्धांत से। इसलिए सत्ता में पहुंचने के बाद भी वह राजनीति के सार्वजनिक हित और सैद्धांतिक ज्ञान के मायने से पूरी तरह अनजान रहते हैं। उनमें केवल इतनी समझ विकसित हो पाती है कि पालिटिक्स सिर्फ पावर हासिल करने की एक प्रक्रिया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। इन राज्यों में सत्ता के लिए बेमेल गठबंधन हुए। बिहार में राजद-जद (यू) गठजोड़ की सरकार, उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए सपा-बसपा के बीच चुनावी गठबंधन, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा का सत्ता के लिए कभी भाजपा के साथ तो कभी कांग्रेस के साथ गठजोड़ बनाना और महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस का शिवसेना के साथ मिलकर सरकार चलाना। इन गठजोड़ से साफ हो जाता है कि राजनीतिक परिवार का उद्देश्य बदल गया है। राजनीतिक परिवार की वैचारिक प्रतिवद्धता की बेड़ी से मुक्त होकर प्राथमिकता जनहित की वजाय स्वहित है।

70 के दशक को वैचारिक प्रतिबद्धता का अवसान काल माना जाता है। कांग्रेस की मनमानी नीति के खिलाफ अलग-अलग विचारधारा की पार्टियां एक मंच पर आई। कांग्रेस के विरूद्ध आंदोलन का असर हुआ और कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। उस दौर में जनसंघ को छोड़कर अधिकांश नेता कांग्रेस के बागी थे। 80 के दशक में जनता दल का गठन हुआ और इसके साथ देश में विचारधारा और सिद्धांत को लेकर भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। महज एक दशक में जनता दल बिखंडित हो गया। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, जार्ज फर्नाडीज, बीजू पटनायक अपना-अपना दल बना लिए। इसके बाद समाजवाद की परिभाषा जातिवाद में परिवर्तित हो गई। 90 के दशक में रही सही कसर शरद पवार, अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी ने पूरी कर दी। इन्होंने कांग्रेस को तोड़ा और बची हुई कांग्रेस को प्रणव मुखर्जी, पी. चिदम्बरम, माधवराव सिंधिया, ममता बनर्जी ने अलग होकर कमजोर कर डाला। सत्ता के लिए कांग्रेस ने उन तमाम नेताओं के साथ समझौता किया, जिन्होंने कांग्रेस को इस हाल पर लाकर खड़ाकर दिया था। कांग्रेस सत्ता में लौटी, लेकिन नए कलेवर के साथ पार्टी के पास ना कोई नीति थी, ना नीयत थी। जातिवादी और परिवारवादी दलों का गठजोड़ दस साल शासन में रहा। इन दस सालों में साफ हो गया कि कांग्रेस वैचारिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी है। इसका ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल है, जहां वामपंथी दलों के पीछे उसे खड़ा होना पड़ा। देश में भाजपा के बाद विचारधारा पर चलने वालों में कम्युनिस्ट पार्टी को गिना जाता था, लेकिन बंगाल, बिहार में कांग्रेस, राजद के साथ वामपंथी दलों के गठबंधन से साफ हो गया कि ये दल भी सत्ता के लिए विचारधारा को त्याग चुके हैं।

देश में वैचारिक दलों में केवल भाजपा बची थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में पलायनवादी नेताओं का जिस तेजी से भाजपा में प्रवेश हुआ है, उससे भाजपा भी अब यह दावा करने की स्थिति में नहीं है। सत्ता हो या संगठन हर जगह पलायनवादियों का बोलबाला है। यदि यह बात चुनावी राजनीति तक सीमित रहती तो बात और थी, लेकिन पलायनवादी नेताओं का संगठन में समायोजन के चलते वैचारिक भट्टी पर तपे हुए कार्यकर्ता उनके साथ काम करने में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। कारण, भाजपा में जिन सिद्धांतों को लेकर चलने की सीख इन कार्यकर्ताओं को दी गई है, पलायनवादी नेताओं का उससे कोई सरोकार नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम हो या राज्यों की टीम हर जगह संगठन के उच्च पदों पर पलायनवादी काबिज हैं। सिद्धांत पर हावी हुआ स्वार्थ और वैचारिक बिमुखता में राजनीति अवसरवाद की कुंजी बन गई है। इसी के चलते राजनीति में वैचारिक पतन के साथ अब भाषाई स्तरहीनता का नया दौर शुरू हो गया है। लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर राजनीति में हर दिन मर्यादा की सीमा लांघने का सिलसिला तेज हो गया है।

राकेश शुक्ला

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