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योगी को हटाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन

योगी को हटाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन

बात करते है देश के सबसे बड़े सूबे यूपी की, ये वही यूपी है जो  देश की दिशा तय करता है। आज देश की दिशा तय करने वाले यूपी में हलचल है। केंद्र के नेता और आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व यूपी में लगातार बैठक कर रहा है। कोई महामहिम से मिल रहा है तो कोई संगठन के नेताओ से बैठक करके वापस दिल्ली जा रहा है। तो किसी की फ्लाइट नागपुर के बजाय लखनऊ घूम जा रही। तो किसी प्रदेश के नेता को प्रधानमंत्री दिल्ली बुला कर बैठक कर रहे है, तो कार्यकर्ता टकटकी लगाए सिर्फ टीवी चैनल और अखबार को निहार रहा है। कार्यकर्ता सिर्फ मूकदर्शक बना हुआ है। हालांकि कार्यकर्ता 2017 जब से यूपी में भाजपा की सरकार बनी है तब से सिर्फ मूर्ख और मूकदर्शक ही बना है। क्योंकि जब सरकार के विधायक और मंत्री की कोई नही सुन रहा है तो कार्यकर्ता की कौन सुनेगा।

अब 2017 के चुनाव के बाद के हलचल को याद करिए जब यूपी में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था तब भाजपा सोच रही थी कि सीएम किसको बनाए। वर्तमान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पर सीएम बनने की खबरें आ रही थी, कारण था राजनाथ सिंह यूपी की कमान पहले सम्भाल चुके थे, और यूपी में काम और कार्यकर्ता दोनो बहुत खुश थे इसलिए पार्टी और यूपी के कार्यकर्ता चाहते थे कि यूपी की कमान राजनाथ सिंह सम्भाले। लेकिन ऐसा नही हुआ। उस समय के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य भी अपने आप को सीएम मान चुके थे लेकिन यह एक सपना था इससे ज्यादा कुछ नही। फिर खबर आइ पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सीएम बनेगे। मनोज सिन्हा बनारस के बाबा विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए लेकिन मनोकामना पूरी नही हुई। तब तक योगी आदित्यनाथ के समर्थक जिसको विश्व हिंदू वाहिनी भी कह सकते है प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पहुंच चुके थे और साथ में यूपी के सभी हिंदुओ

का समर्थन भी योगी को था। आरएसएस नागपुर से पूरे घटनाक्रम में नजरे टिकाए हुए थी। लेकिन बाबा दिल्ली में ही थे लखनऊ में सिर्फ योगी की छवि थी। इधर सभी पत्रकार मनोज सिन्हा पर लगे थे लेकिन योगी बाबा यूपी के राज्य सम्पत्ति विभाग की अंबेसडर कार  दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे चुके थे क्योंकि नागपुर से आदेश हो चुका था कि सीएम योगी ही बनेगे।

आज इस पुराने परिदृश्य को देखे तो वैसे का वैसा है आज-भी आरएसएस नजर बनाए हुए है, राजनाथ सिंह का नाम सीएम के लिए चल रहा है, प्रदेश के कार्यकर्ता और विधायक मंत्री आज भी मूकदर्शक बने हुए है। आज भी दिल्ली के प्रभारी राष्ट्रीय सचिव बी. एल. संतोष और आरएसएस नम्बर दो दत्ता जी आए सब के साथ बैठक किए और बिना सीएम से मिले चले गए। लोग हर दिन सुबह से लेकर शाम तक यही सोच रहे हंै कि क्या सीएम बदल रहा है। पूरे यूपी में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। लेकिन अगर हम धरातल पर देखे तो यूपी का पंडित, भाजपा के कार्यकर्ता, एमएलए, मंत्री, सांसद सब योगी से बहुत नाराज है। सब का सिर्फ यही कहना है कि कोई सुनने वाला नही है अधिकारी सिर्फ योगी की सुनते है कार्यकर्ता की बात करें तो भाजपा कैडर कहता है कि कोई सुनने वाला नही है। विधायक की बात करे तो कहते है की अधिकारियों के पास फोन करते रहिए मजाल है कभी किसी अधिकारी ने फोन उठाया हो। अगर उठाया है तो काम नही होना है ये पक्का है। ये सब सीएम योगी से शिकायतें है। यही शिकायतें दिल्ली और नागपुर पहुंची है लेकिन मेरी जितनी समझ है यूपी राजनीति में योगी से यूपी की कमान वापस नही ली जाएगी। कारण है, चुनाव नजदीक है अगर सीएम बदला जाता है तो पार्टी कार्यकर्ता और जनता में संदेश गलत जाएगा। जिन शिकायतों का ऊपर जिक्र किया गया है अब चुनाव नजदीक है अगर इन शिकायतों को दूर ना किया गया तो पंचायत चुनाव जैसे भाजपा का हाल होगा।

लेकिन हिंदुव आज भी यूपी में जिंदा है। अगर 2022 का चुनाव जीतना है तो भाजपा को हिंदुत्व को फिर से जगाना होगा। छटके-भटके हिंदुओ को एक करना होगा कार्यकर्ताओं, एमएलए, मंत्रियो की सुननी पड़ेगी।

हवाई सर्वेक्षण से काम नही चलेगा जमीनी स्तर पर नाराज लोगों को मानना पड़ेगा।

अब आगे चर्चा करते है कि यूपी में योगी के बदलने कि अटकलने तेज तो हुई लेकिन ये उसी तरह तेज हुई जैसे कुछ समय के लिए आंधी आए और लोग सोचने लगे कि सब तहस-नहस हो जाएगा। उसी आंधी की तरह उत्तर प्रदेश के लोग योगी को हटाने को लेकर चर्चा करने लगे। लेकिन चर्चा खामोश हो गई। फिर लोगों ने चर्चा शुरू की कि योगी को जन्म वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी. एल. संतोष और पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने ट्वीटर पर बधाई नहीं दी। लेकिन समझने और समझाने वाले ये नहीं समझ पाए कि ट्वीटर ही बधाई का एकलौता माध्यम नहीं है बधाई तो टेलिफोन के माध्यम से भी दी जा सकती है। लेकिन सोचने समझने वाले समझे की योगी तो गए। चर्चा फिर आंधी की तरह तेजी से शुरू हुई। लेकिन जितनी तेजी से शुरू हुई उतनी तेजी से शांत हो गई, और योगी आदित्यनाथ अपने काम में मस्त हो गए। लेकिन पंचायत चुनाव की हार को भाजपा और संघ पचा नही पा रहा है। आखिर कमी हुई तो कहा से हुई। इस पर यूपी के समुंदर में मंथन चल रहा है। क्योंकि पंचायत चुनाव को भाजपा विधानसभा का सेमिफाइनल मान रही थी। लेकिन मेरी नजर में चुनाव हारने का कारण सिर्फ कार्यकर्ताओं और पंडितो की नाराजगी है। क्योंकि कई ऐसे जिले है जहां पर भाजपा बाहुल्य होने के नाते भी भाजपा हार गई। कई ऐसे भाजपा के कद्दावर नेता है जिनके घर के लोग चुनाव हार गए। इस सब के बाद यूपी में उप-मुख्यमंत्री को हटाने को लेकर चर्चा हुई, कि इनकी प्रधानमंत्री मोदी के नजदीकी गुजरात कैडर के आईएएस और यूपी के मऊ जिले के रहने वाले ए. के. शर्मा को उप-मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा शुरू हुई।

प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी में बनारस माडल की खूब चर्चा कि जिसमें ए. के. शर्मा की खूब सराहना हुई। उसके बाद ए. के. शर्मा को दिल्ली बुलाया गया। लोगों को पक्का हो गया कि शर्मा जी अब शपथ ले लेंगे। लेकिन गुरु वो मोदी है और ये यूपी है दोनो को आज तक कोई नही समझ पाया। दोनो शतरंज के वो घोड़े है जो ढाई नही साढ़े सात कदम चलते है। फिर योगी को लेकर बाजार गर्म हुआ, कि योगी हट रहे है। राज्यपाल से योगी का मिलना। लोगों ने सोचा अब तो योगी गए लेकिन योगी को हिंदुत्व बचा ले गया। आज भी योगी कि वो लाइन सभी हिंदू कंठस्थ है कि है हम ईद उतनी मनायेंगे जितनी मुस्लिम दिवाली होली मनाएगा। कही ना कहीं यूपी जैसे राज्य में जातिवादी राजनीति को सीएम योगी ने धर्म के धागे में पिरो के रखा है। इन सब बातों को ध्यान में रख पार्टी, केन्द्र सरकार और आरएसएस कुछ कड़ा कदम उठाने से पहले कई बार सोच रहा है।


रजनीश
त्रिपाठी

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