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प्राकृतिक आक्सीजन केन्द्र

प्राकृतिक आक्सीजन केन्द्र

कोरोना महामारी ने प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, सामाजिक संगठनों, सरकारों के साथ-साथ समूचे अन्तर्राष्ट्रीय जगत को कई नये अनुभव दिये हैं। हर व्यक्ति ने जीवन की इस आपातस्थिति को बड़ी गहराई से देखा और अनुभव किया। लॉकडाउन की मजबूरी के चलते परिवारों में नजदीकियां बढ़ीं। धन कमाने और सुख-सुविधाओं पर खर्च करने की अंधाधुध जीवनशैली से समय निकालकर कोटि-कोटि लोगों को अपने जीवन के भीतर आध्यात्मिकता के पथ पर अग्रसर होने का अवसर प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि कोरोना काल में आध्यात्मवादियों की संख्या में अवश्यमेव वृद्धि हुई होगी। हो भी क्यों न! मृत्यु का तांडव भी तो रोगों से कम भयानक नहीं रहा। रोगों से तो आदमी लड़ लेता है, समाज और सरकारें भी इस लड़ाई में उसका साथ देती हैं, परन्तु मृत्यु से तो कोई लड़ भी नहीं सकता। कोरोना के इस दौर में अनेकों वृद्धों ने जान गंवाई, परन्तु अनेकों जगह कहीं चालीस-पचास वर्ष के व्यक्ति तो कहीं बीस-पच्चीस वर्ष के युवक मृत्यु का शिकार होते दिखायी दिये। इस वर्ष मृत्यु का यह तांडव इस रूप में सामने आया, जिसे देखकर हर व्यक्ति यह सोचने के लिए मजबूर हो गया कि मेरी बारी किसी भी दिन आ सकती है। कोरोना के इस नये रूप ने शरीर की रोग निरोधक क्षमता को भी मात दे दी।

इस दूसरे दौर में आक्सीजन की कमी आम जनता के सामने पहली बार व्यापक रूप से उभरकर आयी है। वैसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण विशेषज्ञ पिछले कई वर्षों से यह चेतावनी दे रहे हैं कि समूचे विश्व में ऑक्सीजन का स्तर बीस से तीस प्रतिशत कम हो चुका है। यह तो सारे विश्व का औसत है। इसे देखकर छोटे-बड़े शहरों के ऑक्सीजन स्तर की कल्पना करें तो इन्हें ऑक्सीजन के स्थान पर कार्बन जैसी गन्दी वायु के चैम्बर माना जाने लगा है। भारत के हिन्दू और सिख परिवारों ने मृत व्यक्ति का अन्तिम संस्कार करने के लिए औसतन चार सौ किलोग्राम प्रति शव लकड़ी प्रयोग की जाती है। चार सौ किलोग्राम लकड़ी का अर्थ है कि एक बड़े वृक्ष का या दो छोटे वृक्षों का कटना। इस प्रकार प्रतिवर्ष कितने लाखों वृक्ष काटने पड़ते हैं? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने से अच्छा है कि हम इस विकल्प पर निरन्तर एक चिन्तन और अपनी चेतना को लगायें कि प्रतिवर्ष हम कितने वृक्ष लगा पाते हैं। वृक्ष लगाने का अभियान अब गेहूं, चावल जैसे अनाज तथा सब्जियों एवं फलों के उगाने से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

सरकारों ने सड़क से, रेलमार्गों से तथा हवाई मार्गों से देश के कोने-कोने में ऑक्सीजन की आपूर्ति पहुंचाने का भरसक प्रयास किया। सरकारों के साथ-साथ मन्दिरों-गुरुद्वारों और अनेकों अन्य धार्मिक सामाजिक संस्थाओं ने भी अपने कोष इन कार्यों के लिए खोल दिये और स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करवाने के भरपूर प्रयास किये। आज लग रहा है कि कोरोना का प्रभाव शीघ्र ही समाप्ति की ओर है, परन्तु अभी भी इस महामारी के तीसरे चरण की कल्पनायें भय पैदा कर देती हैं। अब कोरोना से भयभीत होने के आधार पर योजनायें बनाने से कोई लाभ नहीं होगा। अब तो हमें भगवान और प्रकृति की गोद में खेलने वाला भविष्य स्वयं ही निर्मित करना पड़ेगा। अब ऑक्सीजन के लिए सरकारी या सामाजिक संस्थाओं की मदद से मिलने वाले ऑक्सीजन सिलेण्डरों के स्थान पर हमें प्रकृति के सामने अपनी भूल स्वीकार करते हुए पूरी तरह सरेण्डर करना पड़ेगा और एक संकल्प करना पड़ेगा कि हम तत्काल अधिक से अधिक वृक्ष लगाने के अभियान को किस प्रकार सम्पन्न कर सकते हैं।

प्रत्येक राजनेता हर छोटे-बड़े अवसर पर सभाओं और सम्मेलनों आदि में अधिक से अधिक वृक्षारोपण करवाने का प्रयास करें। सरकारी या गैर-सरकारी सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में पीपल-नीम-बड़ नामक त्रिवेणी आरोपण प्रथा बननी चाहिए। देश की सभी पंचायतों को यह प्रेरणा दी जानी चाहिए कि अपने-अपने गांव के अन्दर या बाहर न्यूनतम दस स्थान ऐसे नियत करने चाहिए जहां यह त्रिवेणी वृक्ष आरोपित हों। मन्दिरों और गुरुद्वारों एवं सभी धार्मिक स्थलों पर वृक्षों के छोटे-छोटे पौधे प्रसाद रूप में दिये जाने चाहिए। इस पौधा प्रसाद के साथ धर्माधिकारी लोगों को यह संकल्प दिलवायें कि इस पौधे को कहीं अच्छी जगह लगाने के बाद कम से कम दो-तीन वर्ष इसकी सुरक्षा का ध्यान भी रखना है, इसे नियमित पानी देना है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्मदिन पर एक वृक्ष लगायें। जन्मदिन का उल्लेख करते ही मुझे भारत के एक सुप्रसिद्ध संत स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के उस संकल्प का स्मरण हो आया, जो उन्होंने अभी हाल ही में अपने 69वें जन्मदिन पर आयोजित ऑनलाईन बैठक में अपनी उस घोषणा के साथ व्यक्त किया, जिसमें उन्होंने अपने जीवन के 70वें वर्ष के प्रवेश पर सत्तर हजार वृक्षों को लगाने का विचार व्यक्त किया। पूज्य स्वामी जी ने ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम के अध्यक्ष होने के नाते यह घोषणा की है कि वे अगले वर्ष में सरकारों और सामाजिक संस्थाओं तथा कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह वृक्षारोपण अभियानपूर्ण करेंगे।

वृक्षों के लगाने से हम देश में अनेकों प्राकृतिक ऑक्सीजन केन्द्र स्थापित करने में सफल हो पायेंगे। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में वृक्षों की महिमा बड़े ही मार्मिक शब्दों में कही गयी है। एक वृक्ष को पालने का अर्थ दस पुत्रों के पालन के समान माना गया है। पीपल, नीम और बरगद नामक वृक्षों को संयुक्त रूप से त्रिवेणी कहा जाता है। ये तीनों वृक्ष ऑक्सीजन के भण्डार माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त आंवला, आम, रुद्राक्ष आदि वृक्षों से तो अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं। अमलतास जैसे वृक्ष अनेक रूपों में औषधियां प्रदान करते हैं। अशोक वृक्ष लगाने के फलस्वरूप जीवन में शोक का प्रभाव कम हो जाता है। वैसे तो आयुर्वेद के अनुसार दुनिया में ऐसा कोई वृक्ष या वनस्पति नहीं, जिसका स्वास्थ्यवर्धक लाभ न हो। ऋग्वेद में कहा गया है ‘पृथ्वी: पू: च उर्वीभव’ अर्थात् समग्र पृथ्वी सारी प्रकृति शुद्ध रहे और विकासशील रहे। अनेकों संतों की पवित्र वाणियां यह कहती हैं कि ‘वायु हमारा गुरू है, जल पिता एवं भूमि माता है।’ वायु का महत्व मनुष्य के साथ-साथ सभी जीव जंतुओं के लिए बराबर है। वायु पर प्रत्येक जीव का हर क्षण ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन निर्भर करता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को वृक्षारोपण अपना धार्मिक आध्यात्मिक दायित्व भी समझना चाहिए। यही सबसे बड़ी समाज सेवा भी है। वास्तव में यह अपना कल्याण भी है।

 

अविनाश राय खन्ना

(लेखक राष्ट्रीय उपसभापति, भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी, हैं)

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