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बेईमानी और भ्रष्टाचार बस एक तेरा ही सहारा

बेईमानी और भ्रष्टाचार बस एक तेरा ही सहारा

बेटा : पिताजी।

पिता : हां, बेटा।

बेटा : यह करप्शन, भ्रष्टाचार क्या होता है?

पिता : बेटा, जब कोई किसी व्यक्ति से कोई गलत काम करवाता है तो वह उस व्यक्ति को रुपये-पैसे या कोई बढ़िया कीमती चीज दे देता है, तो भ्रष्टाचार होता है।

बेटा : तो यह दिया किसे जाता है?

पिता : उसे जो किसी के कहने पर कानून को ताक पर रख उसका सही-गलत काम कर देता है।

बेटा : तो वह व्यक्ति होता कौन है?

पिता : वह कोई भी हो सकता है जो किसी को लाभ पहुंचाने के लिए गलत काम कर देता है। सरकारी कर्मचारी, अधिकारी या पालीटिशियन आदि।

बेटा : गैर-सरकारी भी?

पिता : क्यों नहीं? आजकल तो जनता को गैर-सरकारी संगठनों से भी वास्ता पड़ता रहता है। आम जनता को बहुत से गैर-सरकारी संगठनों व कर्मचारियों के पास भी जाना पड़ता है क्योंकि सरकार ने बहुत से कामों को सरकारी अधिकार से निकाल कर गैर-सरकारी संगठनों को सौंप दिया है। वहां के कर्मचारी भी किसी का गलत काम कर पैसे ऐंठ सकते हैं। यह सब करप्शन है। गलत काम तो कहीं भी हो सकता है।

बेटा : बैंकों में भी?

पिता : बिलकुल वहां भी। मेरे को लगता है कि तू आजकल न अखबार पढता है और न टीवी पर खबरें सुनता है। लगता है तू सोशल मीडिया के साथ ही चिपका रहता है।

बेटा : ऐसा आपको क्यों शक हो गया?

पिता : इसलिए कि आजकल चोकसी के प्रत्यार्पण के समाचार तो रेडियो और टीवी छाये पड़े हैं और तुझे कुछ पता ही नहीं।।

बेटा : क्यों? उसने क्या किया था?

पिता : वह पंजाब नैशनल बैंक से धोखे से 15 हजार करोड़ रुपये उधार लेकर देश से भाग गया था। पिछले दो-तीन साल से वह भगौड़ा ही है। उसने निकारगुआ देश की नागरिकता भी प्राप्त कर ली है ताकि वह कानून के लम्बे हाथों से बच जाए।

बेटा : तो वह अपना उधार वापस नहीं लौटाना चाहता है बैंक को?

पिता : यदि उसने उधार लौटाना ही होता तो वह देश छोड़ कर भागता ही क्यों?

बेटा : बहुत अच्छा। पैसा भारत का और मौज विदेश में।

पिता : अब तो वह भारत वापस आना ही नहीं चाहता। वह तो कहता है कि भारत में उसे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। यही नहीं वह तो कह रहा है कि भारत में उसकी जान को भी खतरा है।

बेटा : बहुत खूब। जब उसे गलत बयानी दे कर भारत ने इतना बड़ा उधार दे दिया, तब तो उसे अपने देश में न्याय मिला। तब तक तो उसकी जान को भी कोई खतरा नहीं था। जब भारत आकर उसे ऋण लौटाने की बात आई तो उसकी जान को खतरा हो गया। अब उसे न्याय मिलने की भी उम्मीद नहीं रही।

पिता : बेटा, यही तो ऐसे लोगों का पाखण्ड होता है। करोड़ों-अरबों का भारत में उधार लेलो तो न्याय है और उसे लौटने के लिए कहो तो भारत में उनकी जान को खतरा पैदा हो जाता है। तब इसी देश में उन्हें न्याय मिलने की आशा नहीं रहती।

बेटा : यह भी बता रहें हैं कि चौकसी और नीरव पांडे आपस में मामा-भांजा ही हैं।

पिता : नीरव मोदी ने भी तो यही काम किया है। वह भी पंजाब नैशनल बैंक को चूना लगा कर भाग गया है। वह भी भारत से भाग कर लन्दन में मौज कर रहा है। लन्दन की जेल में भी रह आया है। सरकार उसके प्रत्यार्पण के लिए भी पूरे जोर से लगी हुई है।

बेटा : कमाल है! भारत में अपने घर लौट आने में उन्हें खतरा लगता है पर लंदन की जेल में रहना उन्हें बड़ा गौरव महसूस हो रहा है। क्या लंदन की जेल भारत में उनके अपने घर से ज्यादा आरामदेह है?

पिता : यह तो वह ही जानें।

बेटा : पिताजी, इसपर मुझे अपने दोस्त की माताजी द्वारा सुनाई एक घटना याद आ गई।

पिता : क्या?

बेटा : मेरे दोस्त के पिताजी की एक नए स्थान पर बदली हो गई। एक दिन सारा परिवार उस शहर में घूमने निकला। वह वहां की जेल के पास पहुंचे तो पिताजी ने बताया कि यह यहां की जेल है। बच्चों ने कहा कि आप तो इसे बाहर से ही दिखा रहे हैं।

हम अंदर नहीं जा सकते? पिताजी ने मुस्कराते हुए कहा: बेटा, हम तो इसे बाहर से ही देख सकते हैं। अंदर से तो किस्मत वाले ही देख सकते हैं।

पिता : तुम्हारे दोस्त के पिताजी ने बात तो ठीक ही कही। जेल जाना सब की किस्मत में तो लिखा नहीं होता।

बेटा : बिलकुल ठीक। जेल के अन्दर तो चौकसी और नीरव मोदी जैसे भाग्यशाली महानुभाव ही जा और रह सकते हैं। फिर लंदन की जेल में रहने का सौभाग्य तो नीरव जैसे महान महानुभाव को ही मिल सकता है।

पिता : बेटा, ऐसे कई लोग और भी हैं। प्रख्यात व्यवसाई विजय माल्या की भी यही बात है। वह भी कई बार लन्दन की जेल हो आये हैं।

बेटा : पिताजी, कहते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और कुछ समय बाद भी जो लोग किसी कार्य के लिए या पढ़ाई के लिए लन्दन हो आते थे वह अपने नाम के साथ पैड या घर की पट्टिका पर लिख देते थे- ‘London Returned’. क्या यह ठीक है?

पिता : बिलकुल ठीक।

बेटा : तो क्या ऐसे आधुनिक बड़े-बड़े महानुभाव अपने नाम के साथ ‘London Jail Returned‘ नहीं लिख सकते?

पिता : क्यों नहीं? आजकल लन्दन हो आना तो आम बात हो गई है। पर वहां की जेल में रह आने का सौभाग्य तो बिरले लोगों को ही मिलता है।

बेटा : लेकिन मेरे को एक बात समझ नहीं आती कि यह बड़े लोग लन्दन आदि स्थानों में अपने जीवनयापन और मौज-मस्ती के साधन कहां से मुहय्या करते हैं? ललित मोदी को तो वहां कई वर्ष हो गए।

पिता : बेटा, लन्दन में ललित मोदी, विजय माल्या जैसे बड़े लोगों ने तो वहां आलिशान कोठियां भी ले रखी हैं। वहां वह ठाठबाट से रहते हैं।

बेटा : पर पिताजी, भारत के नागरिक होते हुए वह इतना धन कहां से ले आते हैं?

पिता : भारत में किये गड़बड़ घोटालों से। भारत के बैंकों को लूट कर।

बेटा : इसका तो मतलब यह निकला कि भारत में गडबड़ घोटाला करना, बैंकों से करोड़ों-अरबों के उधार लेकर भागना और अन्य घोटाले ही व्यक्ति के लिए वैभव, समृधि और ऐशो-आराम के स्वर्ग-द्वार खोल देते हैं ।

पिता : इतना तो सत्य है। पर यह भी सत्य है कि अपनी कमाई से नहीं, कोई घोटाले कर ही व्यक्ति अपने भोग-विलास के साधन इकट्ठे कर सकता है।

बेटा : मुझे तो एक बात में भारत और पाकिस्तान में एक समानता स्पष्ट दीखती है।

पिता : क्या?

बेटा : पाकिस्तान में भी तो अनेक राज नेता अपने देश से भाग कर बर्तानिया, अबू धावि जैसे स्थानों में मौज कर रहे हैं।

पिता : हां, यह तो है। वहां राजनीती की उठक-पठक चलती ही रहती है। कभी विदेश में इस पार्टी के नेता तो कभी दूसरी के भागे ही रहते हैं।

बेटा : पिताजी, कहते है कि स्वर्गीय प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो, उनकी बेटी स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो, उनके पति आसिफ जरदारी, पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ आदि समय-समय पर तत्कालीन सरकारों के जुल्म से बचने के लिए विदोशों में रहकर मौज-मस्ती करते रहे हैं ।

पिता : हां, कईयों ने तो वहां आलीशान भवन भी बना रखे है। पाकिस्तान में जब सत्ता पलटती है, वह विदेशों में अपने आशियाने में सुरक्षित हो जाते हैं।

बेटा : आजकल भी कोई है?

पिता : पाकिस्तान में तो धूप-छांव वाली लुकाछिपी सदा चलती रहती है। आजकल पूर्व सेना के तानाशाह और राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ अबू धावी में मस्त हैं।

बेटा : वह क्यों भागे?

पिता : उनपर पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या में उनका हाथ होने पर मुकदमा चल रहा था।

बेटा : तो फिर वह भागे कैसे?

पिता : उन्होंने अपनी बीमारी का बहाना लेकर विदेश में उपचार के लिए इजाजत मांग ली। अदालत ने कुछ शर्तों के साथ विदेश जाने की अनुमति दे दी।

बेटा : तो वह लौटे नहीं?

पिता : नहीं। बीमारी तो बस पाकिस्तान से निकलने का बहाना था। अब तो अदालत ने उन्हें भगौड़ा भी घोषित कर दिया है।

बेटा : तब तो वह परेशानी में पड़ गए होंगे?

पिता : परेशान तो होंगे पाकिस्तान में उनके राजनितिक दुश्मन। वह तो मजे में हैं।

बेटा : तो क्या वह अपने प्यारे वतन नहीं लौटेंगे जिसने उन्हें इतने बड़े पद पर पहुंचा कर देश की सेवा का मौका दिया?

पिता : लौटेंगे। लौटेंगे जरूर पर तब जब पाकिस्तान में राजनितिक माहौल उनके स्वदेश लौटने के लिए अनुकूल होगा।

बेटा : तो क्या हो गया? लौटने कर मुकद्दमा तो चलेगा ही और सजा की तलवार उनके सिर पर बराबर लटकती ही रहेगी न?

पिता : नहीं। तब सब ठीक हो जायेगा। अगर वह एक बार फिर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भी बन जाएं तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।

बेटा : तब तो बहुत बढिय़ा है। पर उनका खर्चा-पानी कैसे चलता होगा?

पिता : वह इतने बड़े पदों पर रहे हैं और इतना लम्बा समय उन्होंने देश की सेवा की है तो तू क्या समझता कि अपने बुरे दिनों के लिए उन्होंने अपना इतना भी ध्यान न रखा होगा?

बेटा : तब तो यह बेईमानी और भ्रष्टाचार है।

पिता : बेटा, पालिटिक्स में कोई बेईमानी और भ्रष्टाचार नहीं होता। सब चलता है। जो कोई ऐसा नहीं करता, वह सत्ता खो देने के बाद या तो भीख मांगता है या सड़क किनारे लोगों के जूते पालिश करता है।

बेटा : तो पिताजी आपने मुझे पहले क्यों नहीं समझाया? अब तक मैं भी पालिटिक्स में कोई खेल खेल लेता या बैंक से करोड़ों के उधार ऐंठ कर कहीं किसी बढिय़ा देश में ऐश करता।

पिता : यह ठीक है बेटा कि मैंने तुम्हें यह पहले नहीं बताया या समझाया, पर ऐसा कर बैठना तेरे-मेरे जैसों के बस की बात भी नहीं है।

बेटा : पर पिताजी इतना तो जरूर है कि बड़े-बड़ों के लिए बेईमानी और भ्रष्टाचार ही एक सहारा है।

पिता : बिलकुल ठीक।

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