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आज के समय में योग साधनाओं का महत्व

आज के समय में योग साधनाओं का महत्व

बी स वर्ष पूर्व प्रोफेसर चमन लाल कपूर, योग साधना आश्रम, होशियारपुर, पंजाब, ने हिंदुत्व चेतना पर एक पुस्तक लिखी थी जिसमे से कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं

भारतवासी अब भाग कर कहां जाओगे?

मिटे अरब, ईरान और तुर्कस्तान से,

फिर मिटे उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और अफगानिस्तान से।

बलोचिस्तान और सिंध में भी नहीं रहे, भागे हो पंजाब से।

बंगाल में नहीं रह सके, चम्पत भये काश्मीर से।

अब भाग कर जाओगे कहां।

आगे तो है समुन्दर?

भारतविरोधी शक्तियां

आज का समय हम भारतवासियों के लिए बड़ा ही विचारणीय है क्योंकि इस वक्त हमारे राष्ट्र को कमजोर करने के लिए कई विरोधी शक्तियां काम कर रहीं है। एक तरफ चीन है जो अपने विस्तारवाद के लिए आये दिन हमारी सीमा का उल्लंघन करता रहता है, और जैविक बायो वार कर रहा है। दूसरी तरफ राजनैतिक गुंडागर्दी है, हमारे भारतीय लोगो की आये दिन हत्याएं हो रहीं है (जैसे केरल/तमिलनाडु/बंगाल)।

तीसरी तरफ हमारे समाज में जयचंद भरे हैं, जो भारतीय होने के बावजूद हमारे राष्ट्र को विकसित होने में बाधा पहुंचा रहें है और पड़ोसी शत्रु देशों का साथ दे रहे हैं।

इन शक्तियों को हम योग शास्त्र की विद्या से कैसे मुकाबला कर सकते हैं, यही जागरूकता पैदा करने के लिए अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर विचार करने की आवश्यकता है।

त्रेतायुग में राम अवतार द्वारा ईश्वर ने धनुष और तीर से रावण जैसे शत्रु को परास्त किया, और द्वापर युग में कृष्ण अवतार में सुदर्शन चक्र और सात्विक कर्मों से समाज में से बुराई हटाने का मार्ग बतलाया और अब कलयुग में प्रभु राम लाल जी ने अवतार धारण किया और योग की शिक्षा जन-जन तक पहुंचाई और योग को अपनाने का मार्ग दिखाया।

योग साधना से ही शरीर और मन स्वस्थ्य होगा और समाज को बदलने की प्रेरणा जाग्रत होगी। और समाज को विघटित करने वाली शक्तियों से मुकाबला करने की शक्ति मिलेगी।

योग साधना क्या है?

योग है आत्मा का परमात्मा से मिलन। गीता में योग के कई साधन दिए हैं, जैसे ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग आदि। मुख्यत सब का आधार अष्टांग योग है। अष्टांग योग के आठ अंग द्वारा ही ध्यान की सफलता होती है। ध्यान से ही आत्मदर्शन होता है और परमात्मा से जुडऩे का रास्ता मिलता है।

अष्टांग योग का पहला अंग है यम। यम हमे समाज में मिलजुल कर शान्ति से इकट्ठे रहना सिखाता है। – यम के पांच भेद हैं

  • अहिंसा : अहिंसा का मतलब है, मन, वचन, वाणी, और कर्म से किसी की क्षति न हो, किसी का दिल न दुखी हो। तभी तो हम मिलजुल कर शान्ति से रह सकते हैं। योग की शुरआत ही अहिंसा है जिससे सब परिवार के सदस्य, समाज के लोग, देश के लोग शांति के साथ सद्भावना से रह सकें।
  • सत्य : जहां अहिंसा है वहां प्यार भी होगा और जहां प्यार है वहां सच होगा। समाज में रहने के लिए सत्य जरूरी है
  • अस्तेय : यदि समाज में कुछ वर्ग चोरी और दूसरे क्राइम्स करेंगे तो समाज में अशांति होगी, इसलिए हमें ऐसा समाज बनाना है जिसमे ज्यादा से ज्यादा समानता हो, ऊंच-नीच न हो ताकि सब मिलजुल कर एक हो कर रह सकें।
  • ब्रह्मचर्य : ब्रह्मचर्य हमे ब्रह्म/परमात्मा से जुडऩे के लिए प्रेरित करता है। किसी भी धर्म से जुड़े हों हमे 24*7 उस परमात्मा की याद करते हुए कर्म करने है क्योंकि परमात्मा से जुडऩे पर हमें सही ज्ञान मिलता है हमारा चित्त हमे सही राय देता है और हमें सचेत करता है।
  • ब्रह्मचर्य का एक और भी मायने है : वीर्य संरक्षण और नारी सम्मान। मैथुन केवल वंशवृद्धि के लिए है और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए नहीं। वीर्य शक्ति आध्यात्मिक उत्थान के लिए है। यदि समाज में
  • नारियों पर अत्याचार होते हों, नारी को पुरुष के दबाव में रहना पड़े, नारियां असुरक्षित रहें तो समाज कभी खुशहाल हो ही नहीं सकता।
  • अपरिग्रह : समाज में प्रकृति के साधन सब के लिए हैं जैसे हवा सूर्य की रौशनी सब के लिए समान है वैसे ही प्रकृति के साधन सब समाज के लिए हैं। और कोई भी वस्तु संग्रह्य करें जितनी चाहिए।

अष्टांग योग का दूसरा अंग है नियम : नियम स्वयं का आचरण व्यवहार कैसा होना चहिये इसके बारे में बताते हैं।

नियम के भी पांच भेद हैं जो इस प्रकार हैं :

  • शौच यानी मन और शरीर की सफाई। शुद्ध मन अच्छे विचार उत्पन्न करेगा और हम समाज के लिए अच्छा काम कर सकेंगे।
  • संतोष : संतोष में ही सुख है और असंतोष में केवल दु:ख।
  • तप : तप का अर्थ है कि हमें अपना कर्तव्य ईमानदारी से और मन लगा कर करना चाहिए। हमे ज्यादा से ज्यादा सात्विक/समाज कल्याण के हेतु कर्म करने हैं न कि अपने स्वार्थ के लिए।
  • स्वाध्याय : हमे स्वाध्याय के लिए समय निकालना चाहिए क्योंकि अच्छी पुस्तकें, शास्त्र आदि के अध्यन से हमारा दृष्टिकोण साफ होता है, बुद्धि का विकास होता है और जिंदगी की समस्याओं का समाधान मिलता है।
  • ईश्वर प्रणिधान : हमें ईश्वर से 24&7 मिले रहना चाहिए अपने इष्ट देवता का स्मरण लगातार होने से मन में गलत भावनायें नहीं आती और मन प्रसन्न रहता है और साधक ध्यान अवस्था में आसानी से पहुंच जाता है।

अष्टांग योग का तीसरा चरण है आसन

आसन : योग आसनों से हमारा शरीर लचीला बना रहता है, जोड़ो के अंग में विकार नहीं आते, पाचन क्रिया अच्छी रहती है। यदि हम बीमार होंगे तो हमारा ध्यान नहीं लगेगा। यदि हमारे शरीर में लचीलापन नहीं होगा तो हम ध्यान अवस्था में लम्बे समय तक बिना हिल-डुले नहीं बैठ सकेगें। इसलिए नियमित योग करना जरूरी है ताकि शरीर के जोड़ों में कार्टिलेज बना रहे और मांसपेशियां सुडौल रहें।

योग क्रियायें

इसके आलावा योग की कुछ क्रियायें है जैसे की जल नेति व वमन जिसके नियमित करने से शरीर की 80 प्रतिशत बीमारियां दूर रहती हैं। नेति द्वारा नाक की सफाई हो जाती है और दिन भर का सांसो द्वारा जो विषैले पदार्थ प्रदूषण से अंदर चले जाते हैं उनकी सफाई हो जाती है। जल नेति जुकाम, साइनस बलगम, सर दर्द, माइग्रेन, कान की बीमारियां, आंखों की रौशनी व आंखों की बीमारियां आदि को ठीक करता है। कुंजल क्रिया या वमन क्रिया द्वारा पेट के विकार नहीं होते एवं गैस अपचन और एसिडिटी आदि ठीक हो जाते हैं।

चौथा अंग अष्टांग योग का है प्राणायाम

प्राणायाम हमारी श्वास प्रश्वास क्रिया को स्वस्थ्य रखता है। प्राणायाम द्वारा शरीर में रक्त शुद्ध बनता है। सामन्य इंसान में फेफड़ो के छिद्र केवल 33 प्रतिशत प्रभावित होते हैं पर प्राणायाम से सभी छिद्र एक्टिव हो जाते है इससे फेफड़े और हार्ट तन्दुरुस्त रहते है । स्नायु नर्वस सिस्टम भी चुस्त रखता है और इससे सकरात्मक ऊर्जा बनती है, मनुष्य सात्विक कर्म करने के लिए प्रेरित होता है। इस प्रकार हम देखते हैं की प्राणायाम से बहुत फायदे हैं और मन और शरीर दोनों शुद्ध भी होते हैं।

पांचवा अंग है प्रत्याहार

प्रत्याहार अष्टांग योग की पहले चार अंग यम नियम आसन प्राणायाम नियमित रूप से करने से जब परिपक्वता आ जाती है, तब अगली अवस्था प्रत्याहार की स्वयं योगी में आनी शुरू हो जाती है।

प्रत्याहार की अवस्था में साधक की व्यक्तिगत इच्छाएं कम हो जाती हैं, इन्द्रियों पर संयम हो जाता है। साधक में अभूतपूर्व परिवर्तन आ जाता है। साधक का मन शांत और शुद्ध हो जाता है और उसमे सकरात्मक ऊर्जा परवाह करने लगती है।

इसके बाद शेष तीन अंग धारणा, ध्यान और समाधि ध्यान की अंतरंग अवस्थाएं हैं। इस अवस्था पर पहुंच कर साधक को ऊंच नीच का भेद भाव खत्म हो जाता है, वह सब को सम दृष्टि से देखने लगता है सुख दु:ख का उस पर कोई असर नहीं होता हर परिस्थिति में सम रहता है। वह योग की उच्चतम अवस्था में पहुंच जाता है।

ध्यान की सफलता से मनुष्य को आत्म दर्शन होता है, और जीवन में एक बदलाव आता है-

स्पष्टता, विवेक बुद्धि, एकाग्रता और एक नई शक्ति का संचार उतपन्न होता है। मनुष्य जिस भी कार्य में सलंग्न है उसमे दक्षता प्राप्त होती है और मानव कल्याणकारी योजनाओं का उदय होता है। ऐसे साधक जब समाज का नेतृत्व करेंगे तो एक एक भ्रष्टारहित समाज उदय होगा।

संभावना, सद्भावना, समदृष्टि : सब मनुष्य एक हैं – कल्याणकारी योजनाएं उदय होंगी जैसे मौजूदा कानूनों का सख्ती से पालन, गुरुकुल शिक्षा पद्धिति अनुसार शिक्षा, समान नागरिक संहिता, राजद्रोह विरोधी कानून, जनसंख्या नियंत्रण कानून, धर्मानतरण निषेध कानून, लव जिहाद, अवैध जमीन अधिकरण कानून आदि।

योग साधना ही समाज को बेहतर व्यवस्था दे सकती है। इसका उदहारण हमारे सामने है की योगी आदित्यनाथ और नरेन्द्र मोदी ने कितने सुधार विरोधी शक्तियों के होते हुए सुधार किये। समाज को ऐसे ही योगियों की आवश्यकता है। अत: प्रभु राम लाल जी की दी हुई योग शास्त्र की विद्या ही असल में वो हथियार है, जो देश की विरोधी ताकतों का मुकबला कर सकता है। इसलिए हमें गुरुकुल जैसी ही विद्या का प्रारम्भ करना होगा, हमें योग साधक बनाने हैं जो देश की विरोधी शक्तियों का लोकतंत्र की मर्यादा को निभाते हुए मुकाबला कर सकें।

रमेश कुमार

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