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मुखर्जी, मोदी और मुफ्ती

मुखर्जी, मोदी और मुफ्ती

By दीपक कुमार रथ

सुविधाजनक सहयोग कई बार हृदय परिवर्तन का भी कारण बन जाता है। जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और पीपुल्स डेमाक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की गठजोड़ वाली सरकार को इसी नजरिए से देखा जा सकता है, जो राज्य के समग्र विकास के लिए शुभ है। लेकिन, यह भी सही है कि भाजपा अपने विशेष जनाधार के मूल मुद्दों को मुल्तवी रखने की कोशिश की वजह से लगातार प्रश्नों से घिरी रह सकती है। राजनीति में सरकार बनाना बेहद जरूरी है, लेकिन खासकर विचारधारा पर आधारित और खुद को अलग तरह की पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के लिए महान नैतिक मूल्यों के साथ स्वच्छ राजनीति करना भी उतना ही जरूरी होना चाहिए, जो उसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान शख्सियतों से विरासत में मिली है। संयोग से मुखर्जी जम्मू-कश्मीर के मसले पर ही कथित तौर पर हत्या के शिकार हो गए थे। इसलिए भाजपा जैसी पार्टी को अपने मूल्यवान कार्यकर्ताओं के प्रति हमेशा जवाबदेह होना होगा, जो कभी वैचारिक विचलन बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसलिए राज्यधर्म और राष्ट्रधर्म पर अमल करने के साथ आरएसएस की भूमिका भी देखी जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय सहित पूरा देश श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी मृत्यु की जांच की मांग लंबे समय से करता रहा है। अब जबकि केन्द्र और राज्य में भाजपा सत्ता में है तो देशवासियों की उम्मीद है कि इस पर आगे की कार्यवाई की जाएगी।

यह भी सही है कि यह महज सुविधा का ही सवाल नहीं है, बल्कि कोई दूसरा विकल्प कारगर न हो तो यह साथ मिलकर काम करने की समझदारी भी है। लोकतंत्र में गठजोड़ सरकार अपवाद नहीं होती और खासकर जम्मू-कश्मीर के मामले में तो यही सच्चाई है। वहां की भू-राजनैतिक स्थितियों और सीमा पार की दखलंदाजी के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर को लंबे समय तक लोकप्रिय सरकार से वंचित रखना सही नहीं हो सकता। इसलिए, राज्य में गठजोड़ सरकार अनिवार्य है। हालांकि, सरकार गठन के शुरू में ही मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का शांतिपूर्ण विधानसभा चुनावों के लिए पाकिस्तान, कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकवादियों को श्रेय देने वाला बयान सरकार के सुचारू कामकाज में रुकावट पैदा कर सकता है। दरअसल, सच्चाई यही है कि पीडीपी को ही भाजपा की ज्यादा दरकार है। इस चुनाव में जम्मू-कश्मीर साफ-साफ दो अलग-अलग पहचानों में बंट गया है। घाटी में मुस्लिम बहुमत हावी रहा तो जम्मू में हिंदू बहुमत का जोर रहा। इसके अलावा भाजपा केंद्र की सत्ता में है। इन दो वजहों ने पीडीपी को भाजपा के साथ गठजोड़ करने को मजबूर कर दिया। हालांकि उसके पास ‘खानदानशाही’ वाली पार्टी या नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ जाने का आसान विकल्प था, जो राज्य में ज्यादातर वक्त सत्ता में रही हैं। पीडीपी इस हकीकत से निश्चित ही आशंकित होगी कि अगर भाजपा का साथ नहीं लिया तो जम्मू क्षेत्र राज्य से अलग-थलग पड़ जाएगा। फिर, उसे यह भी एहसास होगा कि केंद्र से कोई सहयोग नहीं मिलेगा। इसलिए पीडीपी अगर इस अशांत राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहती है तो उसे गठजोड़ को आगे बढ़ाना ही होगा। भाजपा के दोनों हाथ में लड्डू की स्थिति है।

यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि पीडीपी उस दौर से ही अलगाववादियों के करीब मानी जाती रही है, जब मुफ्ती मोहम्मद सईद केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार में गृह मंत्री थे और उनकी बेटी डॉ. रूबिया सईद के अपहरण के बाद पांच अलगाववादियों को रिहा किया गया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस के भी तार उसी दौर से अलगाववादियों और पाकिस्तानी हुक्मरानों से जुड़े रहे हैं, जब शेख अब्दुल्ला को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घर में ही नजरबंद कर दिया था। दरअसल, 1987 में के्रंद्र में राजीव गांधी सरकार के तहत हुए विधानसभा चुनावों में भारी धांधली ही जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी आंदोलनों के लिए बड़ा मुकाम साबित हुआ। उससे भारत में सच्चा लोकतंत्र दागदार हुआ और जम्मू-कश्मीर के लोगों में अलगाव की भावना अधिक मजबूत हुई। इसके अलावा यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया की एकता और भारत के उदय में रुकावट पैदा करने में फख्र महसूस करता है। फिर, यह भी सही है कि कश्मीर घाटी में जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के हिमायती भी अनेक हैं, जो जम्मू को कश्मीर के करीब आते नहीं देखना चाहते।

इस पृष्ठभूमि में यह गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के 12वें मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के फौरन बाद पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भाजपा के साथ अपनी पार्टी के गठजोड़ को ऐतिहासिक मौका बताया, जिसे वे राज्य की राजनीति में अहम मोड़ साबित करना चाहते हैं। लेकिन, दुर्भाग्य से सईद ने भाजपा के साथ संवेदनशील गठजोड़ के बाद कुछ प्रतिकूल बयान दे डाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने कूटनीतिक कौशल के जरिए जम्मू-कश्मीर को ऐसी राह पर ले जाना चाहिए, ताकि राज्य में विकास की प्रक्रिया में कोई रुकावट न आ पाए। पीडीपी-भाजपा गठजोड़ सरकार को भी केंद्र से संबंधों के मामले में अधिक परिपक्वता दिखानी चाहिए और राज्य में अमन-चैन कायम करने के लिए पाकिस्तान से द्विपक्षीय बातचीत का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए। वजह यह है कि कश्मीर में तब तक अमन-चैन कायम नहीं होगा, जब तक सभी राजनैतिक पार्टियां घातक राजनीति से बाज आकर राज्य की बेहतरी के लिए साझा कोशिश नहीं करतीं।

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