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क्या अफगानिस्तान में हो रहे परिवर्तन की छाया कश्मीर पर पड़ेगी?

क्या अफगानिस्तान में हो रहे परिवर्तन की छाया कश्मीर पर पड़ेगी?

पिछले दिनों कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों के साथ प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई। यह तय हुआ की समय के साथ संघ शासित प्रदेश से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। उसी के तत्काल बाद जम्मू के एयरफोर्स ठिकाने पर आतंकी हमला होता है, उसके उपरांत ड्रोन साजिश भी पकड़ में आती है। ऐसा होना महज एक आतंकी घटना भर नहीं है जो वर्षो से पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा है, बल्कि यह एक सुनयोजित आतंकी हमले की नयी शुरुआत थी। नए तकनीक के साथ आतंकी हमला एक नए समीकरण की ओर इसारा करता है। भारत में कश्मीर को लेकर हुए बुनियादी परिवर्तन, उसके उपरांत भारत की बढ़ती सैनिक शक्ति पुन: गलवान वैली में चीन का अतिक्रमण सबकुछ एक श्रृंखला में जुड़ा  हुए दिखाई देता है। दरअसल अफगानिस्तान में संभावित राजनीतिक परिवर्तन की कड़ी कश्मीर से जुड़ी हुई है। ऐसा होने का पुख्ता सबूत भी है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा 2600 किलोमीटर से भी ज्यादा है। वखान कॉरिडोर एक ट्रीजंक्शन है जहा पर चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा मिलती है। यह सभी को मालूम है कि सारे आतंकी संगठन का ठिकान पाकिस्तान की सीमा के भीतर है जहां से अफगानिस्तान की ओर जाता है। अमेरिकी सेना की विदाई ऐसे समय हो रही है जब विश्व राजनीति एक नए स्वरुप धारण कर रही है। चीन अमेरिका के बीच द्वन्द की स्थिति है। कोरोना महामारी की जद्दोजहद मौजूद है। इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिल रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान की मजबूती पाकिस्तान के नक्शे कदम पर बनकर तैयार हो रहा  है। चीन की मुख्य भिड़ंत भारत के साथ है इसलिए वह पाकिस्तान के द्वारा अस्थिरता के हालात पैदा करना चाहता है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में दुनिया को बता  भी दिया था   कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, उसका विलय कश्मीर में होना तय है। यह बात चीन को आंख में मिर्च की तरह सुलग गयी। चीन को मालूम है कि वर्तमान भारत की सरकार कहती है उसे पूरा करने का दमखम भी रखती है। इसलिए चीन की चाल पाकिस्तान को अपने इसारे पर चलाने की है। चीन का सीपेक प्रोजेक्ट भी उसी रास्ते पर है।

पाकिस्तान की सेना और तालिबान के बीच की साठ-गांठ जगजाहिर है। पाकिस्तान की सेना के नक्शे कदम पर अफगानिस्तान में व्यूह रचना बनकर तैयार होगी। चीन का स्वार्थ बस इतना भर है कि चीन के मुस्लिम बहुल सिंकियांग में इसका कोई असर नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान इस बात का बंदोबस्त पहले से ही कर चुका है। तमाम मुस्लिम विरोध  की नीति होने के बाद भी पाकिस्तान केंद्रित आतंकी संगठन चीन की ओर आंख उठाकर नहीं देख पाते। अफगानिस्तान एक साथ अलग-अलग पहचान के अर्तद्वंद में दशकों से जी रहा है। मूलत: अफगानिस्तान एक कबीलाई राज्य रहा है। कबीलाई समाज की छाप आज भी है। पश्चिम की दुनिया और सोंच ने अफगानिस्तान को राष्ट्र-राज्य के रूप में देखने और स्थापित करने की जिरह की। तीसरा पहचान मुस्लिम देशो ने उसे इस्लामिक बनाने की पहल की। तीनो स्वरुप के बीच में अफगानिस्तान की शांति तिनको में भी कर गयी और वह हिंसा का अखाड़ा बन गया।

2001 से लेकर अभी तक अफगानिस्तान में हजारो जाने जा चुकी है। तकरीबन 2400 से ऊपर अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके है, 32 हजार के करीब अफगानी सैनिक हताहत हुए है। आम जनता हर दिन हमलो के शिकार बनते है। 2001 के बाद तालिबान निश्चित रूप से आज बहुत मजबूत स्तिथि में है। आधे से अधिक हिस्सा उसके कब्जे में है। वार्ता में अफगानिस्तान की सरकार शामिल नहीं है। तालिबान की रणनीति पाकिस्तान के इसारे पर बनती है। पाकिस्तान चीन के निर्देशन में काम करता है। चीन की सोच अफगानिस्तान में अमरीका से अलग है। पाकिस्तान और चीन दोनों पूरी तरह से अमेरिकी सेना की वापसी की बात करते है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इस बात की दलील देते है कि अगर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हट गयी तो अल-कायदा और आईएस सब मिलकर एक हो जाएंगे। फिर इसका नुकसान पूरी दुनिया को होगा लेकिन सबसे बड़ा भुक्तभोगी भारत होगा।

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका

भारत की हमेशा  से ही एक ऐसे वार्ता की रही है जिसमे अफगानिस्तान का सुनयोजित विकास हो और बातें चुनी हुई लोकतान्त्रिक व्यवस्था के द्वारा अपनया जाये। अमेरिकी नीति रोलर कॉस्टर की तरह घूम रही है। इतिहास इस बात की ताकीद करता है कि जब 1989 में रूस ने अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाया था, तो पाकिस्तान की जमीन पर आतंकियों का प्रसार शुरू हुआ था, जिसका खामियाजा भारत को भी झेलना पड़ा था, अगर अमेरिकी सेना वापस जाती है, और ब्यूह रचना की जिम्मेवारी पाकिस्तान के हाथो में होती है तो पुन: वही होगा जो 1989 में हुआ था। भारत की सोच को आघात लगेगा। हमारे समीकर कमजोर होंगे। इसकी आग कश्मीर की वादियों में भी होगा। मध्य पूर्व के देशो में भारत की पहुंच और ढीली पद जाएगी। स्थिति 1989 से भी बदतर है। अब तो आई एस के आतंकी भी अफगानिस्तान में जगह बना चुके है, तालिबान से उनका घनिष्ठ रिस्ता है। इसलिए कमान एक ऐसे देश को सौपा जाना भारत और दक्षिण एशिया के लिए बेहद खौपनाक और खतरनाक है। अमेरिका को इस बात की चिंता होनी चाहिए। चीन पाकिस्तान के हर मसले पर चुप रहेगा क्योंकि पाकिस्तान द्वारा निर्देशित आतंकी चीन की सीमा को लांघने की कोशिश कभी नहीं करेंगे।

अमेरिका ने तो भारत को आशा भी दिखाई थी वह अफगानिस्तान में ऐसा कुछ भी नहीं होने देगा, जिससे भारत को कष्ट हो। राष्ट्रपति अशरफ घनी के बिना अफगानिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था को बनाया जाना भारत के लिए हर तरीके से चिंता का विषय बना हुआ है। भारत के लिए चिंता का विषय यह भी है कि मध्य एशिया के 5 देशो में से 3 देशो कि सीमाएं अफगानिस्तान से मिलती है, इन तीन देशो में आतंकी उफान अफगान कि सीमाओं से निकलता है, जिसका उद्गम आफ-पाक छेत्र है। इसकी दूरी भारत के कश्मीर राज्य से ज्यादा दूर नहीं है। इसलिए समस्या गंभीर है। चीन और पाकिस्तान की सोच भारत के सामरिक समीकरण को कमजोर करने की है। प्रधानमंत्री मोदी को इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा, हिन्द महासागर में चीन ने अपनी गति बढ़ा दी है। यह सब कुछ एक सुनयोजित नीति के तहत चीन और पाकिस्तान की तरफ से हो रहा है।

अफगानिस्तान का भावी तालिबानी शासन व्यवस्था पूरे दक्षिण एशिया के लिए घातक होगा। चंूकि निर्णय अमेरिका ने ले लिया है इसलिए बात अपने स्तर पर भारत को संभालनी होगी। चुनौती केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को बचना होगा। नहीं तो आग बांग्लादेश को भी अपने चंगुल में लेने की कोशिश करेगा।

 

 


प्रो.
सतीश कुमार

(लेखक राजनीति विज्ञानं संकाय, इग्नू, नयी दिल्ली, से जुड़े हैं)

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