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क्या जम्मू-कश्मीर का बेड़ा पार होगा?

क्या जम्मू-कश्मीर का बेड़ा पार होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में जम्मू-कश्मीर के 14 नेताओं की बैठक के क्या-क्या मायने हो सकते हैं? इस पर राजनीतिक विश्लेषकों के कयास थमते नजर नहीं आ रहे हैं। कितनी ही सकारात्मकता से सोचने पर एक प्रश्न उपस्थित होता ही है कि हुर्रियत, शरिया, इस्लाम, जिहाद और आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले इन परिवारवादी (अब्दुल्ला-मुफ्ती) नेताओं के साथ बैठक से ही जम्मू-कश्मीर का बेड़ा पार होने वाला है? क्या इसी दिन के लिए धारा 370 हटायी गयी थी?

जबसे हम युवावस्था में आये और सोचने-समझने लगे हैं, यही सुनते रहे हैं कि कश्मीर का मुद्दा अत्यंत ‘संवेदनशील’ (नाजुक) है। उस संबंध में बात करने के लिए अत्यंत ‘संवेदनशील’(सचेतन एवं सुग्राही) होने की आवश्यकता है। हम जानते हैं कि भारत की स्वतंत्रता, सत्ता हस्तांतरण और कश्मीर का मुद्दा एक-दूसरे में आबद्ध-संबद्ध है। ज्ञातव्य हो कि 17 अक्टूबर, 1949 को भारतीय संविधान में धारा 370 को जोड़ा गया था। उसी धारा की ओट में कश्मीर के मुद्दे को अत्यधिक ‘नाजुक’ बनाये रखने का प्रयास होता रहा है। भारतीय जन संघ (अब भाजपा) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी आरंभ से ही इस ‘नाजुक’ मामले को ‘नासुर’ बनने से पहले सुलझाना चाहते थे। परंतु पाकिस्तानपरस्त एवं कथित धर्मनिरपेक्ष (छद्म?) नेताओं ने उसे नासुर बनाने और सड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिणामत: 1984-1990 के दौरान उस मजहबी ‘सडांध’ ने घाटी में अपनी दुर्गंध बुरी तरह एवं पूरी तरह फैला दी। कश्मीरी पंडितों की बहू-बेटियां, जमीन-जायदाद, संपत्ति-असबाब सबकुछ रालिव, चालिव, गालिव (रालिव – हमारे साथ मिल जाओ अर्थात् धर्म परिवर्तन कर लो, चालिव – भाग जाओ अर्थात् ‘सबकुछ’ छोड़ कर चले जाओ, गालिव -मौत को अपना लो) के नारों में स्वाहा हो गया। तब से लेकर धारा 370 हटाने तक घाटी जिहादी इस्लाम के रक्त-पिपासु रक्षक-प्रसारकों की ‘बंधक’ बनी रही।

भारत विभाजन के उपरांत कश्मीर मुद्दे पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का दृढ़मत था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। उन्हीं का नारा था -‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे’। स्मरणीय है कि अंतत: लगभग 70 साल बाद मोदी शासित भाजपा ने 5 अगस्त, 2019 कोधारा 370 हटाकर कश्मीर के ‘नाजुक’ मुद्दे को अत्यंत ‘सूझबूझ’ एवं ‘संवेदनशीलता’ के साथ ना केवल सुलझाया, अपितु ‘नियंत्रित’ भी किया। इस प्रकार कश्मीर अंततोगत्वा भारत का ‘आधिकारिक रूप से अभिन्न अंग’ हो गया। मुझे स्मरण है, हर सच्चे भारतीय की तरह हमारे लिए भी वह उत्सव का दिन था। अत: उस दिन हमने विश्वविद्यालय परिसर में (आपस में) मिठाइयां बांट कर उत्सव मनाया। उस रात कुछ षडयंत्रकारियों (राष्ट्र-विरोधियों) ने मेरे विभाग में #StandWithKashmir के कई पोस्टर चिपका कर सरकार के देश-हितोन्मुख निर्णय का विरोध किया। चूंकि यह विश्वविद्यालय भारत के सुदूर दक्षिणी कोने में स्थित है, यह राष्ट्र-विरोधी हरकत उस तरह प्रकाश में नहीं आयी। मुद्दे की बात यह कि मोदी सरकार ने उस नासुर और दुर्गंध को हटाने में कोई चूक नहीं की। इस घटना की सूचना ना जाने इंटेलिजेंस ब्यूरो को कैसे हुई और स्थानीय पुलिस हरकत में आयी। इस प्रकार राष्ट्र-द्रोहियों के उपद्रवी मनसूबों पर पानी फिर गया।

जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के बाद 24 जून, 2021 को प्रधानमंत्री की अगुआई में जम्मू-कश्मीर के 14 नेताओं के साथ बैठक का समाचार आते ही चारों ओर खलबली मच गयी। पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (गुपकार गठजोड़) और जम्मू-कश्मीर के अन्य नेताओं के साथ आयोजित इस बैठक से पूर्व और बाद में राष्ट्र-हितापेक्षी लोगों में गुस्सा दिखाई दिया। डोगरा फ्रंट, एकजुट जम्मू, युवा ऑल इंडिया कश्मीरी समाज (YAIKS) के साथ-साथ कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ सुशील पंडित भी इस बैठक से नाखुश दिखाई दिये। सोशल मीडिया में भी मोदी-शाह (भाजपा) में विश्वास करने वालों (भक्त?) का आग्रही स्वर उभर कर आया कि ‘इन संपोलों को दूध ना पिलाएं। आपको इनके फन कुचलने के लिए चुना गया है। सेक्यूलर बनने के लिए नहीं।’ ऐसा ही रोष पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन करने पर दिखायी दिया था। दो राय नहीं कि भाजपा ने अपनी विचारधारा से बाहर आतंकवादी-जिहादियों को समर्थन-संरक्षण देने वाले दल के साथ गठबंधन किया था, जिसके कारण मोदी-शाह (भाजपा) की घनघोर आलोचना भी हुई। परंतु, धारा 370 हटाने के बाद पुन: मोदी समर्थकों में अपार ऊर्जा का संचार हुआ था।

बहरहाल, इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के 8 राजनीतिक दलों के 14 नेता सम्मिलित हुए – फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस), महबूबा मुफ्ती (पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी), सज्जाद गनी लोन, मुजफ्फर हुसैन बेग (पीपल्स कॉन्फ्रेंस), गुलाम नबी आजाद, गुलाम अहमद मीर, ताराचंद (कांग्रेस), अल्ताफ बुखारी (अपनी पार्टी), रवींद्र रैना, निर्मल सिंह, कवींद्र गुप्ता (भाजपा), यूसुफ तारीगामी (भाकपा-माक्र्सवादी), भीम सिंह (नेशनल पैंथर्स पार्टी)। साथ-साथ जम्मू-कश्मीर से सांसद एवं मोदी सरकार में मंत्री जितेंद्र सिंह भी बैठक में सम्मिलित थे। और बैठक का मुद्दा था -जम्मू-कश्मीर का विकास (लोकतांत्रिक)।

स्मरणीय है कि कश्मीर में ‘नाजुक’ (संवेदनशील?) हालात बनाने में उपरोक्त नेता, विशेषकर ‘गुपकार गठजोड़’ के नेता, उनमें भी विशेषत: अब्दुल्ला-मुफ्ती खानदान की अहम भूमिका रही है। घाटी में ‘इस्लाम खतरे में है’ के नाम पर आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी)की नेता और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपनी धारा से विपरीत जाकर 6 मई, 2017 को कहा था -‘मैं आज अधिकार के साथ कहती हूं और इसके लिए मेरी आलोचना भी की जाएगी। अगर कोई जम्मू-कश्मीर समस्या का समाधान ढूंढ़ सकता है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। उनके पास विशाल जनादेश है। वे जो भी फैसला लेंगे, देश उनका समर्थन करेगा।’ वहीं, गठबंधन टूटने के बाद दिसंबर 2018 में कहा था -‘भाजपा के साथ गठजोड़ से यह आशा थी कि प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के लोगों की ओर मित्रता का हाथ बढ़ायेंगे और अटल बिहारी वाजपेयी ने जहां छोड़ा था, वे वहां से आगे बढ़ेंगे।’ जबकि प्रधानमंत्री की अगुआई में हुई बैठक के बाद मीडिया से मुखातिब होकर धारा 370 को हटाने वाले निर्णय को ‘असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी’ बताते हुए पुन: ‘पाकिस्तान से बात’ करने का सुझाव दिया और धारा 370 की बहाली को लेकर संघर्षरत रहने की बात की। इसे कहते हैं – रस्सी जल गई, ऐंठन नहीं गई। ध्यातव्य है कि अलगाववादियों की समर्थक-संरक्षक मुफ्ती ने कहा था -‘जम्मू-कश्मीर के झंडे के अलावा नहीं उठाऊंगी कोई दूसरा झंडा।’ धारा 370 खत्म होते ही, वह स्वप्न नेस्तनाबूत हो चुका है। मुफ्ती की स्थिति उस बिल्ली जैसी हो गई है, जो खिसिया कर खंभा नोचने लग जाती है।

जबकि जम्मू-कश्मीर के अन्य नेताओं ने परिसीमन के उपरांत जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने पर जोर दिया। वैसे उनकी चाह विधानसभा से पूर्व जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा पाने की थी, जो कि मोदी के निर्णयानुसार परिसीमन और विधानसभा चुनाव से पहले कतई संभव नहीं है।

ध्यातव्य है कि इस बैठक की अगुआई में क्या कुछ ऐसा भी है, जो हमें दिखाई नहीं दे रहा है? क्या मोदी-शाह की जोड़ी जम्मू-कश्मीर के संबंध में हमेशा की तरह दो कदम आगे चल रही है? धारा 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर में रुकी हुई लोकतांत्रिक प्रक्रिया त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने के साथ आरंभ हो चुकी है। स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। यह भी कि विकास का कोई भी मॉडल लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकल सकता है। दो राय नहीं कि भाजपा लोकतंत्र और विकास के मामले में अन्य किसी भी दल की तुलना में अत्यधिक स्पष्ट एवं अडिग है।

प्रधानमंत्री की अगुआई में संपन्न बैठक के संबंध में मित्रों के साथ हुई चर्चा-परिचर्चा के दौरान यह विचार उपस्थित हुआ कि धारा 370 को हटाने के बाद पश्चिमी कश्मीर की सीमा पर स्थित गूजर-बकरवालों के चार जिलों- कुपवाड़ा, उड़ी (आंशिक बारामूला), पुंछ और राजौरी के क्षेत्रों को सम्मिलित करते हुए कश्मीर से अलग एवं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (क्कश्य) के समानांतर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाना चाहिए। गोजरी, पहाड़ी एवं डोगरी भाषा बोलने वालों का यह क्षेत्र आरंभ से ही कश्मीर की राजनीति में हाशिये पर रहा है। यदि केन्द्र सरकार ऐसा करती है,तो इस पर्वतीय क्षेत्र में विकास की गति तीव्र होगी और निवासी प्रसन्नता में गुजर-बसर करेंगे। यह भी विचारणीय है कि यह क्षेत्र पाकिस्तानपरस्त नहीं है और 1947 के युद्ध से पहले उड़ी-पुंछ मार्ग से जम्मू से सीधा जुड़ा भी रहा है। इससे जम्मू राजनीति की मुख्यधारा में आ सकेगा। गौरतलब है कि बैठक के विरोध में डोगरा फ्रंट, एकजुट जम्मू और युवा ऑल इंडिया कश्मीरी समाज (ङ्घ्रढ्ढ्यस्) की जो आवाजें उठीं, उनके मूल में जम्मू की उपेक्षा ही है। इस दृष्टि से अलग राज्य बनाने से यह क्षेत्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर एवं कश्मीर घाटी के बीच एक ‘इंसुलेटर’ अर्थात् प्रतिरोधक का कार्य करेगा। इस प्रकार उनके पाकिस्तान में मिल जाने का स्वप्न भी ध्वस्त हो जायेगा। साथ ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की पुन:प्राप्ति के बाद उपरोक्त जनपद मुक्त किये गये उन क्षेत्रों के प्रारंभिक जिले सिद्ध होंगे। अर्थात् इस पश्चिमी सीमांत राज्य की घोषणा मात्र से ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की पुन:प्राप्ति का हमारा लक्ष्य स्वत: स्पष्ट हो जाएगा। कश्मीर घाटी की पाकिस्तानपरस्ती को अर्थहीन कर ध्वस्त करने में निस्संदेह यह प्रभावी माध्यम (पहल) बन सकता है।

एक और विचार यह भी आया कि जम्मू के साथ पंजाब का सीमावर्ती क्षेत्र मिला कर राज्य बनाने से जम्मू के विकास की गति तीव्र होगी। ऐसे ही लद्दाख के साथ हिमाचल प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र मिला कर राज्य बनाने से लद्दाख का तीव्र गति से विकास होगा। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में लद्दाख की घनघोर उपेक्षा होती रही है। धारा 370 हटाने से पूर्व यह क्षेत्र भारत की प्रगति में हिस्सेदार नहीं हो पाया था। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि कश्मीर के चार जिलों यथा – श्रीनगर, पुलवामा, कुपवाड़ा और बारामूला में आतंकी गतिविधियों को दृष्टिगत रखते हुए कश्मीर को राज्य का दर्जा ना देकर उसे पूरी तरह केंद्र शासित प्रदेश ही कर देना चाहिए। कालांतर में यदि पाक अधिकृत कश्मीर पुन: प्राप्त करनें में सफलता मिलती है, तो बाद में उसे भी राज्य का दर्जा दिया जा सकता है।

इस दृष्टि से एक ओर मुफ्ती का इस्लाम और शरिया वाले कश्मीर का स्वप्न ध्वस्त होगा, वहीं दूसरी ओर अब्दुल्ला का स्वप्न और अहंकार चूर-चूर हो जायेगा। फारूख अब्दुल्ला ने कहा था – ‘पाकिस्तान एक हिस्सेदार है। खुद ये कहते हैं, पार्लियामेंट में। इनका रिजोल्यूशन है कि वो हिस्सा जो पाकिस्तान में है, वो हमारा है। अरे, तुम्हारे बाप का है क्या? तुम्हारे पास वो ताकत नहीं है कि तुम वो हिस्सा ले सको।’ यदि केन्द्र सरकार उपरोक्त उपाय करती है, तो इससे ऊंट पहाड़ के नीचे भी आयेगा और पूरी घाटी पर भारत (सर्वधर्म समभाव) का अधिपत्य हो जायेगा। स्पष्ट है कि दशकों से जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र के नाम पर दो ही परिवार (अब्दुल्ला-मुफ्ती) अपना एजेंडा चलाते रहे हैं। केन्द्र सरकार को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ये लोग डायन से भी खतरनाक हैं। एक घर तो डायन भी छोड़ती है। इन्होंने तो कश्मीरी पंडितों का चुन-चुन कर सफाया किया है। कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देना देशहित-लोकहित में नहीं होगा। शेष, यदि चूक ही गये तो फिर अपना वही ढर्रा है -‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा!’

 

 

डॉ. आनंद पाटील

(लेखक, हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, से जुड़े हैं।)

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