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बदलाव की कगार पर धरती का स्वर्ग

बदलाव की कगार पर धरती का स्वर्ग

करीब चार साल पहले की बात है। कोलकाता से शाम की फ्लाइट से दिल्ली लौट रहा था। बादलों से भरे आसमान के बीच से हमारा विमान देश के पूर्वी छोर से राजधानी की ओर बढ़ रहा था। आमतौर पर हवाई यात्रियों का चरित्र रेल यात्रियों से अलग होता है। रेल के ऊंचे से ऊंचे दर्जे के यात्री भी यात्रा की शुरूआत के बाद आपस में बेतकल्लुफ हो जाते हैं, जबकि हवाई यात्रा में बेतकल्लुफी शायद सामान्य व्यवहार के खिलाफ मानी जाती है। लेकिन उस दिन हमारा सहयात्री ऐसा नहीं था। वह एक सजीला कश्मीरी नौजवान था, जो एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान में नौकरी कर रहा था। उसके कश्मीरी होने की जानकारी मिलते ही बातचीत कश्मीर की समस्या की ओर मुड़ गई। उससे एक सवाल पूछा गया कि कश्मीर में आखिर शांति क्यों नहीं आ पा रही है और क्या कश्मीर कभी शांत हो पाएगा? कश्मीर के रहवासी के नाते उसके जवाब को लेकर व्यग्रता बढऩी ही थी। कश्मीर विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में परास्नातक उस छात्र से उम्मीद थी कि वह भारत और कश्मीर के रिश्तों के संदर्भ में ऐसी जानकारी जरूर देगा, जो उम्मीद से भर देगी। लेकिन उसने जो कहा, उसका लब्बोलुआब भारत विरोधी था। उसका कहना था कि कश्मीरी मानते हैं कि उनसे भारत जबरदस्ती कर रहा है। आम कश्मीरियों को भारत से आजादी चाहिए। चूंकि कश्मीर आजाद नहीं हो रहा, इसलिए कश्मीरी भारत को लेकर मोहब्बतभरा रूख नहीं अपना सकते और यही वजह है कि कभी कश्मीर दिल से भारत का अंग नहीं हो सकता।

कश्मीर घाटी में आए दिन होने वाली घटनाएं उस कश्मीरी सजीले नौजवान के विचारों को ही आगे बढ़ा रही थीं। लेकिन पिछले बाइस महीनों में जिस तरह कश्मीरी अवाम ने अपनी सोच को अभिव्यक्ति दी है, उसके संदेश साफ हैं। अब कश्मीरी लोग भी चाहते हैं कि वहां अमन-चैन हो। जब अमन-चैन होगा तो जाहिर है कि भारत से लेकर दुनियाभर के सैलानी वहां आएंगे। इससे पर्यटक केंद्रित राज्य की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकेगी। आम आदमी को क्या चाहिए होता है? सुकून भरी जिंदगी, दो वक्त की दाल-रोटी, उसके बच्चों की खुशहाली और सिर पर सुकून की छत। कश्मीर की सोच में आए इस बदलाव का ही नतीजा है कि गुपकार गठबंधन के आठों दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर 24 जून को हुई बैठक में ना सिर्फ शामिल हुए, बल्कि उन्होंने आजादी के बाद से ही जारी पाकिस्तान के राग को कम से कम बैठक के दौरान नहीं अलापा। हालांकि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर से दिल्ली को रवाना होने से पहले यह जरूर कहा था कि कश्मीर को लेकर होने वाली बातचीत में पाकिस्तान को भी शामिल किया जाना चाहिए। दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया कि भारत कश्मीरियों से धोखा करता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर में जनमत संग्रह का वादा किया था, लेकिन वे मुकर गए।

पीडीपी हो या फिर उमर अब्दुल्ला, सबको पता है कि जब तक वे श्रीनगर या कश्मीर की सीमाओं में रहते हैं, उन्हें पाकिस्तान की याद खूब आती है। लगता है कि पाकिस्तान ही उनको अब तक खिलाता-पिलाता रहता है। यह बात और है कि जब दिल्ली की ओर वे रूख करते हैं तो उनका रवैया बदला सा नजर आता है। दरअसल कश्मीरी नेताओं खासकर यहां के अब्दुल्ला और बाद के दिनों में मुफ्ती परिवार के लिए पाकिस्तान एक ऐसी ग्रंथि रहा है, जिसके बहाने उनकी घाटी में यथास्थितिवादी राजनीति चलती रही है। इसके जरिए वे असंतुलित जनसंख्या अनुपात वाली विधानसभा में कम जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हुए भी जम्मू-कश्मीर राज्य के भाग्यविधाता बनते रहे हैं। दरअसल जनसंख्या जम्मू इलाके में ज्यादा है और विधानसभा की सीटें कश्मीर इलाके में ज्यादा। फिर जम्मू इलाके में लोग भारी मतदान करते रहे हैं, इसकी वजह यह है कि यहां आतंकवादी गतिविधियां उतनी सक्रिय नहीं हैं, जितनी घाटी में हैं। जबकि जनसंख्या के लिहाज से छोटी जनसंख्या वाले कश्मीरी क्षेत्र की विधानसभा सीटों पर बहुत कम संख्या में मतदान होता रहा है। साफ शब्दों में कहें तो जम्मू-कश्मीर में अगस्त 2019 से पहले तक अत्यल्प समर्थन वाली राजनीति ही राज्य का मसीहा होती रही है। जम्मू-कश्मीर राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 और धारा 35ए के तहत विशेष दर्जा हासिल रहा है। जहां छह साल की विधानसभा होती रही है, जहां के सरकारी खर्च की निगरानी और ऑडिट का अधिकार भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक तक को नहीं रही। यही वजह है कि 05 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने संसद के अधिनियम के जरिए राज्य को दो हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया, अनुच्छेद 370 के साथ ही केंद्रीय कैबिनेट के फैसले से जम्मू-कश्मीर की विशेष हैसियत बहाल करने वाली धारा 35 ए को हटा दिया तो कश्मीरी घाटी के मूल निवासी जम्मू-कश्मीर की राजनीति के पुरोधा चाहें फारूक अब्दुल्ला हों य उनके बेटे उमर अब्दुल्ला या फिर पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, सबको लगा कि अब तो राज्य पर उनकी पकड़ ढीली पड़ जाएगी और कश्मीर के विकास के नाम पर आने वाली बेहिसाब रकम का हिसाब देना पड़ेगा तो उन्होंने विशेष राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तेज कर दी। कश्मीर के दलों को लगा कि भारत सरकार नहीं झुकेगी तो उन्होंने चार अगस्त 2019 को श्रीनगर स्थित फारूक अब्दुल्ला के बंगले एक गुपकार रोड पर बैठक की। इसमें शामिल दलों को ही गुपकार गठबंधन कहा गया। जिसमें नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी समेत छह और दल शामिल हैं। इसी बैठक के बाद महबूबा ने कहा था कि जब तक जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा बहाल नहीं हो जाता, तब तक वे चुनाव नहीं लड़ेंगी।

यूं तो राजनीति अपनी हर बात को भुलाने या समय के अनुसार प्रतिकूल बातों को अलग ढंग से व्याख्या करने की आदी होती है। उसे अपनी ही बात से पलटने से शर्म भी नहीं होती। यह तय है कि मोदी की सरकार अब कश्मीर की पुरानी स्थिति बहाल करने से रही। यह तथ्य पीडीपी प्रमुख महबूबा बखूबी जानती हैं। इसलिए माना जा रहा था कि वे 24 जून की बैठक में शामिल नहीं होंगी। लेकिन वे शामिल हुईं और तब से लेकर कश्मीर को लेकर होने वाली बातचीत में पाकिस्तान को शामिल करने की मांग पर चुप्पी साध रखी हैं।

यह तय है कि कश्मीर घाटी के दोनों प्रमुख राजनीतिक परिवारों को सत्ता का ऐसा चस्का लगा है कि लंबे समय तक सत्ता से दूरी उन्हें पचेगी। यही वजह है कि अब वे भी चाहते हैं कि कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया बहाल हो। बदले हालात में कांग्रेस और गुपकार गठबंधन के अलावा छह और दलों के नेताओं को लगा कि उनके पास प्रधानमंत्री की बैठक में शामिल होने के अलावा दूसरा चारा नहीं है। 24 जून की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह ने राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली का ना सिर्फ इशारा किया, बल्कि यहां तक कह दिया कि वे इस क्षेत्र यानी जम्मू-कश्मीर से दिल और दिल्ली की दूरी को जल्द से जल्द हटाना चाहते हैं।

लगे हाथों उन्होंने यह भी इशारा कर दिया कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों का जल्द से जल्द परिसीमन होना चाहिए, ताकि राज्य में विधानसभा चुनाव सफलतापूर्वक कराए जा सकें। देश में अब तक तमाम लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन चार बार 1952,1963, 1973 और 2002 में हो चुका है। 73 तक हर दस साल पर सीटों का परिसीमन होता था। उसके बाद इसके लिए 25 साल की अवधि तय की गई। लेकिन बाद में इसे और बढ़ा दिया गया। लेकिन जम्मू-कश्मीर इससे अलग रहा। इसका असर यह हुआ कि राज्य की विधानसभा सीटों में जनसंख्या के लिहाज से बदलाव नहीं हुआ। यही वजह है कि कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू संभाग में ज्यादा जनसंख्या होने के बावजूद वहां घाटी की तुलना में कम यानी 36 सीटें ही थीं। जब तक राज्य एक था, तब तक जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 111 सीटें थीं। इसमें कश्मीर के खाते में 46 सीटें, जम्मू के खाते में 37 और लद्दाख की चार सीटें थी। वहीं पाक अधिकृत कश्मीर की 24 सीटों को भी इसी में गिना जाता था और उन्हें खाली रखा जाता था। अब बदली हुई परिस्थिति में लद्दाख की चार सीटें नहीं रहीं। लिहाजा जम्मू-कश्मीर में सिर्फ 107 सीटें ही रह गई हैं। जाहिर है कि परिसीमन के बाद स्थितियां बदलेंगी। जम्मू इलाके में सीटें बढ़ेंगी। वैसे यह असंतुलन ही रहा है कि आजादी के बाद से अब तक ज्यादा जनसंख्या होने के बावजूद जम्मू संभाग से कोई मुख्यमंत्री नहीं बन पाया। अब लगता है कि परिसीमन से स्थितियां बदलेंगी तो कश्मीर के दोनों कथित प्रथम परिवारों अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की बादशाहत को जम्मू संभाग चुनौती दे सकता है। इसीलिए भले ही ये दल प्रधानमंत्री की बैठक में शामिल हुए, लेकिन परिसीमन का विरोध कर रहे हैं।

वैसे इन दलों का यह भी रूख रहा है कि जब तक जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा बहाल नहीं हो जाता, तब तक वे भारत सरकार से बात नहीं करेंगे। लेकिन उन्हें अब लगने लगा है कि बदलना और वक्त के साथ चलना उनकी मजबूरी है।

इस पूरी प्रक्रिया में केंद्र सरकार और भाजपा पर दो मुद्दों को लेकर सवाल उठे हैं। पहला यह कि गुपकार गठबंधन के दलों को वह भारत विरोधी और संविधानविरोधी मानती रही है, फिर उन्हें बातचीत के लिए क्यों बुलाया गया। दूसरा सवाल कश्मीरी पंडितों की उपेक्षा को लेकर उठा है। इसे आवाज दी है पनुन कश्मीर के नेता अग्निशेखर ने। उनका कहना है कि 1990 में शुरू हुई हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार कश्मीरी पंडित हुए। भाजपा उनके नाम पर ही कश्मीर की राजनीति करती रही। फिर इस बैठक में पंडितों को क्यों नहीं बुलाया गया? बैठक में यूं तो कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद शामिल हुए, लेकिन बैठक से पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर कहते रहे कि उनकी पार्टी विशेष राज्य के दर्जे की वापसी से कम स्वीकार नहीं करेगी। हालांकि कश्मीरी दल बैठक में इस मसले पर सख्त नहीं रह पाए।

इस पूरी कवायद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कश्मीरी पंडित भले ही निराश हैं, लेकिन यह भी साफ है कि गुपकार गठबंधन उनके सामने झुकता नजर आ रहा है। उसे अपने घोषित रूख से यू-टर्न लेना पड़ा है। उसे अब भारत सरकार की शर्तों पर बात करने में समझदारी नजर आने लगी है। परिसीमन आयोग की रिपोर्ट अगस्त तक आने की उम्मीद है। अगर सबकुछ केंद्र सरकार की सोच के मुताबिक आगे बढ़ता रहा तो तय है कि इसके बाद राज्य में विधानसभा बहाल हो सकती है और फिर राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। वैसे जम्मू-कश्मीर विधानसभा की वैधानिक स्थिति पहले जैसी होगी या वह भी दिल्ली-पुद्दुचेरी जैसा राज्य होगा, इस पर अभी कुहासा बरकरार है। वैसे जम्मू-कश्मीर के विकास के साथ ही राष्ट्रवादी सोच रखने वाली ताकतें नहीं चाहतीं कि इस सीमावर्ती और संजीदा राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

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