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अपनों पर सितम, गैरों पर काम

अपनों पर सितम, गैरों पर काम

कबीर दास का एक मशहूर दोहा है :

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

जिसका भावार्थ है कि निंदक को हमेशा अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही आपके चरित्र को निर्मल बनाए रखता है। चाल, चरित्र और चेहरे पर जोर देने वाली पार्टी भारतीय जनता पार्टी कबीर की इन वाणियों पर भरोसा करने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो उसके मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को अपने उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ता, जिन्होंने अच्छा वक्त हो या बुरा, हर वक्त पार्टी का साथ दिया है। चाहें वे अपना खुद का कारोबार करते रहे हों या किसी तरह जीवन-यापन करते रहे हों, आज अगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में हैं या देश की नंबर वन पार्टी बनी हुई है तो इसमें कार्यकर्ताओं का खून-पसीना खूब लगा है, जिन्होंने कभी अनाम रह कर तो कभी प्रताडऩा सहकर तो कभी कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम की गालियां और तंज सुनने के बावजूद पार्टी और संगठन के साथ खड़े रहे।

लेकिन सत्ता में आते ही पार्टी और संगठन को जब कुछ देने या व्यवस्था बदलने की बात आई तो उसकी निगाह अपने इन कार्यकर्ताओं की बजाय उन लोगों पर ज्यादा संजीदा नजर आई, जो या तो कल तक पार्टी और संगठन को गाली देते रहे या कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम के कोरसगान में शामिल रहे। अपने प्रतिबद्ध और निष्ठावान सत् विचार वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं की बजाय भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों ने हाल के दिनों में ऐसे लोगों पर ज्यादा भरोसा जताया, जो कुछ ही महीने पहले तक भाजपा, उसके नेताओं और उसकी कार्यसंस्कृति की आलोचना करते रहे। हाल के दिनों में इसका पहला उदाहरण दिखा उत्तराखंड में। उत्तराखंड की तीरथ सिंह रावत सरकार ने 17 मई को उन दिनेश मानसेरा को अपना मीडिया सलाहकार बनाया, जो खुलकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे। दिनेश मानसेरा को जो लोग जानते हैं, उन्हें पता है कि वे घोर मोदी और भाजपा विरोधी एवं कांग्रेस-वामपंथ समर्थक चैनल एनडीटीवी के नैनीताल संवाददाता रहे हैं। इसके पहले वे उस बीएजी फिल्म्स में काम करते रहे, जिसके संपादकीय प्रमुख अजीत अंजुम रहे। वही अजीत अंजुम जो इन दिनों अपना हरावल दस्ता लेकर हर जगह मोदी सरकार को बदनाम करने या उसे नीचा दिखाने के लिए दौड़ते रहते हैं। नवंबर 2020 में शुरू हुआ किसान आंदोलन हो या मार्च 2020 में महाबंदी के चलते मजदूरों का अपने गांवों की ओर पलायन हो, अजीत अंजुम ने अपने यूट्यूब चैनल के जरिए मोदी सरकार के खिलाफ जो एजेंडावादी पत्रकारिता शुरू की, वह पश्चिम बंगाल के चुनावों तक जारी रहा और अब भी उनका रूख वैसा ही है। और तो और, दिनेश मानसेरा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाने के भाजपा के फैसले का उपहास उड़ाया था। (ट्वीट संलग्न) इसके बावजूद उन्हीं तीरथ रावत ने उन्हें अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त कर दिया, बाकायदा इसकी अधिसूचना भी जारी हो गई। तीरथ सिंह रावत की उदारता जारी रहती, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के साथ राष्ट्रवादी विचार परिवार को भी यह नियुक्ति चुभी और इसकी तीखी आलोचना हुई। भला हो तीरथ सिंह रावत सरकार का कि उसे सोशल मीडिया पर विचार परिवार के सदस्यों द्वारा किया जा रहा विरोध नजर आया और उन्नीस मई को दिनेश मानसेरा कि नियुक्ति को रद्द कर दिया।

लेकिन हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ऐसा फैसला नहीं ले पाई। उसने अपने कट्टर आलोचक पंजाबी समुदाय के सिरसा निवासी विनोद मेहता को जो मीडिया सलाहकार बनाया तो ऐसा ही विरोध शुरू हुआ। ज्यादा दिन नहीं हुए, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्तरहीन टिप्पणियां की थीं। लेकिन वे अब भी मनोहर लाल खट्टर सरकार के आंख के तारे बने हुए हैं। विनोद मेहता के कुछ ट्वीट भी इसी स्टोरी के साथ प्रस्तुत हैं। विनोद मेहता कभी बहुत बेहतरीन पत्रकार नहीं रहे। सिरसा से छोटा अखबार निकालते हैं। उन्होंने साल 2001 में ओमप्रकाश चौटाला की एक सतही सी जीवनी लिखी थी। जिसके एवज में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने उन्हें दिल्ली में अपना मीडिया सलाहकार बनाया था। इसके बाद उनका आर्थिक साम्राज्य जो बढऩा शुरू हुआ तो बढ़ता ही गया। वे कभी भाजपायी नहीं रहे। उन्होंने हमेशा संघ और भारतीय जनता पार्टी की तीखी आलोचना की। लेकिन अब वे उसी भाजपा के मुख्यमंत्री के आंख के तारे हैं। ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया पर इनके अतीत की टिप्पणियों का प्रदर्शन नहीं हुआ। लेकिन खट्टर सरकार उन पर लगातार मेहरबान है।

तीसरा उदाहरण शिवराज सिंह चौहान का रहा। भारतीय जनता पार्टी के सबसे पुराने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार ने भी सात जून को मुंबई के एक पीआर एजेंसी के मालिक तुषार पांचाल को अपना ओएसडी बनाया। इसकी बाकायदा अधिसूचना तक जारी हो गई थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। तुषार पांचाल अतीत में गोमूत्र और मोदी पर स्तरहीन तंज कसते रहे हैं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा था कि बाबा रामदेव ने कहा है कि सरकार उन्हें पेट्रोल पंप लगाने की अनुमति दे और वह तेल 35-40 में बेचेंगे। इसके जवाब में तुषार ने कहा था, ‘गौमूत्र से बनाएंगे? मुझे विश्वास है कि बाबा उस बात को लेकर बहुत उत्साहित हैं, जिसे उदय चोपड़ा कानूनी रूप में चाहते हैं।’

इसके अलावा तुषार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था और उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर कटाक्ष किया था। 2014 में मोदी सरकार के पदारोहण के बाद से तो तुषार वामपंथी इकोसिस्टम की तरह की भाषा बोलते रहे हैं। बहरहाल सोशल मीडिया पर हंगामा मचने के बाद दो दिन बाद शिवराज सरकार ने उनकी नियुक्ति को खारिज कर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थक विचारक मकरंद परांजपे इन दिनों शिमला स्थित भारत सरकार के उच्च अध्ययन संस्थान के प्रमुख हैं। वहां से एक अर्धवार्षिक पत्रिका निकलती है। उस पत्रिका के संपादक के तौर पर हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता रहे आशुतोष भारद्वाज की नियुक्ति हुई। आशुतोष भारद्वाज नक्सली विचारधारा से प्रभावित माने जाते रहे हैं और उन्होंने भाजपा पर हमेशा सवाल उठाए हैं। आशुतोष राममंदिर की भी तीखी आलोचना कर चुके हैं। जब उनकी नियुक्ति का सवाल उठा तो उन्हें पद छोडऩा पड़ा। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार रहीस सिंह के विवादित ट्वीटज भी संलग्न हैं।

केंद्रीय सूचना आयोग के सदस्य उदय माहूरकर ने 2015 में एक सेमिनार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सुझाव दिया था कि संघ को अपनी विचारधारा वाली प्रतिभाओं के चयन के लिए प्रतिभा खोज करना चाहिए। तब वे इंडिया टुडे के डिप्टी एडिटर थे। लेकिन ना तो संघ और ना ही भाजपा में प्रतिभाओं की खोज को लेकर कोई ठोस रणनीति बनी। ऐसा नहीं कि संघ की विचारधारा का सम्मान करने वाली प्रतिभाएं नहीं हैं। सोशल मीडिया पर अगर आज वामपंथी नैरेटिव को हर वक्त जवाब मिल रहा है तो इसके पीछे ये प्रतिभाएं ही हैं, जो अपनी रोटी खाकर अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में रहकर राष्ट्रहित के इस विचार यज्ञ में आहुति दे रही हैं। लेकिन जब जिम्मेदारी देने की बात आती है तो दुर्भाग्यवश इन प्रतिभाओं पर ना तो राष्ट्रीय विचार परिवार का ध्यान जाता है, न उनके कर्णधारों का और ना ही भारतीय जनता पार्टी का। वैसे भी राष्ट्रीय विचार परिवार के प्रतिष्ठित और सत्तासीन होने के बाद से निष्ठावान लोगों की बजाय बाहरी लोगों पर ध्यान ज्यादा दिया गया है।

पता नहीं, राष्ट्रीय विचार परिवार ने अरविंद केजरीवाल पर ध्यान दिया कि नहीं, उनकी सफलता का राज अपनी प्रतिभाओं को अपनी सीमा में ही सही जिम्मेदारी देना है। मजाल है कि उनके राज में गैर आम आदमी पार्टी कार्यकर्ता चाहे दिल्ली की नागरिक सुरक्षा हो या मोहल्ला क्लिनिक हो या फिर दूसरी समितियां हो, में घुस सके। एक अनुमान के मुताबिक अकेले दिल्ली में करीब अपने दस हजार कार्यकर्ताओं को सीधे और करीब एक लाख कार्यकर्ताओं को परोक्ष रूप से केजरीवाल सरकार ने जिम्मेदारी दे रखी है। इसीलिए केजरीवाल लगातार उल्टे-सीधे काम और बयानबाजी के बावजूद दिल्ली की जनता के बीच लोकप्रिय बने रहते हैं। क्योंकि जिम्मेदारी और रोजगार हासिल प्राप्त उनके कार्यकर्ता लगातार उनके प्रति सक्रिय रहते हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी में ऐसा नहीं है। वहां या तो गणेश परिक्रमा करने वालों की पहचान है और ताकत है या फिर उनकी जो बाहरी हैं और किसी तरह सत्ता के नजदीक पहुंच जाते हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह तृणमूल के आक्रमण के सामने भाजपा कार्यकर्ता निरूपाय नजर आ रहा है, उसकी भाजपा कोई सहयोग करती नजर नहीं आ रही है, इस वजह से अब भाजपा के कार्यकर्ता मायूस हैं। उनकी भी चाहत है कि पार्टी या सरकार या विचार परिवार उन्हें भ्रष्टाचार न करने दे, लेकिन उन बुनियादी भूमिकाओं में शामित तो जरूर करे, जो बदलाव का वाहक होंगी। अगर भारतीय जनता पार्टी ने कार्यकर्ताओं के इस रोष को नहीं समझा तो अतीत दुहराया जा सकता है, ठीक 2004 की तरह, जब सब चाहते थे कि भाजपा की सरकार बने, अटल जी प्रधानमंत्री बनें, लेकिन निराश कार्यकर्ता घरों से निकला ही नहीं, वोटरों को बूथों तक नहीं लाया।

 

विशेष प्रतिनिधि

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