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आयुर्वेद में पूरे विश्व को आगे ले जाने की क्षमता

आयुर्वेद में पूरे विश्व को आगे ले जाने की क्षमता

मैं टेक्नॉलॉजी का विद्यार्थी हूं और मैंने यह देखा है कि पोलिटिक्स और टेक्नॉलॉजी में यह संबंध है कि आप टेक्नॉलॉजी का पैराडिगम बदल दीजिए, पावर का पैराडिगम बदल जाता है। सेकंड वल्र्ड वॉर के बाद जैसे ही अमेरिका के पास एटम बम आया, पावर पैराडिगम यूरोप के शिफ्ट होकर अमेरिका चला गया। आज यदि हम फार्मास्यूटिकल्स और मेडिसिंस के क्षेत्र में देखें, तो पश्चिमी देशों ने इतनी प्रगति कर रखी है कि यदि हम उसी ब्रांच ऑफ नॉलेज में उनके फॉलोअर बनना चाहेंगे, तो जैसे अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने – तो हमें उनके आसपास पहुंचने में दशक लग जाएंगे। परन्तु यदि हम पैराडिगम शिफ्ट कर दें, तो वह पैराडिगम अल्टरनेटिव सोर्सेज ऑफ मेडिसीन है, जिसमें होम्योपैथी और आयुर्वेद आते हैं, जिनके पास यह आधार है, जिनका मूल आधार ही उन चिकित्सा पद्धतियों से अलग है। यदि हमने इसमें अपने को सही ढंग से स्थापित कर लिया, तो हमें 80 से 90 प्रतिशत मामलों में उन चीजों की आवश्यकता नहीं पढ़ेगी जो वे हमें बड़े ऊंचे मूल्यों पर देते हैं।

मैं सिर्फ एक बिन्दु की तरफ ध्यान आकृष्ट कराना चाहूंगा कि किस मामले में हमारे इंडियन सिस्टम और उनके सिस्टम की मूल प्रकृति अलग है। देखिए, जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां हैं, वे सब चिकित्सा  विज्ञान हैं। आप उनसे पूछिए कि व्यक्ति स्वस्थ है, तो इसका अर्थ क्या हुआ? अगर उसको कोई रोग नहीं है तो वह स्वस्थ है। अगर उसे कोई रोग हो जाएगा, तो उसे उस रोग की दवा दे देंगे। परन्तु, बात यह है कि बॉय नेम इटसेलफ, आयुर्वेद आयु का विज्ञान है। यहां पर ऐसी भी औषधियां उपलब्ध हैं, जो आयु के सरंक्षण और संवर्धन के लिए उपयुक्त हैं और प्रभावी है। इसीलिए आप देखें कि बाकी जो वेस्टर्न मेडिसीनल थॉटस हैं, वे यह क्लेम ही नहीं करते कि जेनरल इम्यूनिटी को बढ़ाने के लिए उनके पास सिवाय मल्टी-विटामिन्स एंड मल्टी-मिनरल्स देने के बहुत कुछ है। हम देख भी रहे हैं कि जिस प्रकार वायरस एंड इम्यूनॉलोजी रिलेटेड खतरे बढ़ रहे हैं, अगर हम इसे प्रभावी ढंग से रख पाएं, तो समझिए यह आयु का विज्ञान, आयु के संरक्षण और संवर्धन में एक प्रभावी रोल प्ले कर सकता है।

अब मैं एक और बात कहना चाहूंगा कि बहुत से लोग यह कहते थे कि हमें उसके हिसाब से साइंटिफिक ढंग से इन चीजों को आगे रखना चाहिए। अब किसे साइंटिफिक कहें? केवल 40-50 साल पहले की ही तो बात है जब यह कहा जाता था कि यह फल-पत्ती खाकर क्या कोई इलाज होता है? क्रोसीन, टेरामाइसिन, मेटासिन खाओ, आधुनिक बनो, नई-नई मेडिसिंस खाओ। आज 50 साल के अंदर हम फिर यह कहने की स्थिति में आ गए हैं कि गो बैक टू हर्बल मेडिसीन भाई, साइंस तब सही थी या अब सही है? हम तो तब भी वही थे, आज भी वही हैं, आप बदल गए हैं। इस बदलाव को अब हमें विश्व को स्वीकार करवाने की आवश्यकता है बजाय इसके कि हम उनके हिसाब से अपनी व्याख्या करने का प्रयास करें।

अब मैं एक अन्य उदाहरण आपके ध्यान में लाना चाहूंगा। जैसे कि हमारे कई सम्मानित वक्ताओं ने औषधियों के बारे में बताया। चरक से लेकर धन्वन्तरि जी तक ऐसे बहुत से उदाहरण उपलब्ध हैं, परन्तु जिसको वेस्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, वह है सर्जरी। सर्जरी की जितनी डिटेल्ड जानकारी आयुर्वेद में उपलब्ध है, उतनी कहीं और नहीं है। सुश्रुत संहिता में 180 चैप्टर्स हैं, 1,100 डिजिजेज हैं, 121 इंस्टूमेंट्स हैं, 650 मेडिसिंस हैं, जिनमें ऐनिमल, प्लांट एंड मेटल्स ये सभी सोर्सेस से हैं और 300 से ऊपर प्रोसीजर्स हैं। इतना ही नहीं, शायद कुछ लोगों को सुनने में अटपटा लगे, परन्तु हड़प्पा सिविलाइजेशन, जिसे आज हम सिन्धु-सारस्वत सभ्यता कहते हैं, उसके एक्सकैवेशन करने वाले सर जॉन मार्शल, जो ब्रिटिश टाइम में आरकेलोजिकल सर्वे के चीफ थे, उन्होंने अपनी बुक, जिसमें उन्होंने तक्षशिला के एक्सकैवेशन का जिक्र किया है, उसके पेज नम्बर 210 पर लिखा है कि सर्जिकल इंस्ट्रूमेंटस ऑफ इंडिया सिविलाईजेशन सेकेंड सेंचुरी से एवेलेबल हैं। आज भी अगर आप पाकिस्तान के पंजाब प्रोविंस के म्यूजियम में जाइए, तो पाएंगे कि वहां दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के सर्जिकल इंस्ट्रूमेंटस रखे हैं।

लोग प्लास्टिक सर्जरी के बार में बात करते हैं। लंदन से निकलने वाली एक बड़ी फेमस मैगजीन जिसका नाम द जेंटकमैन था, उसमें वर्ष 1794 में दो डॉक्टर्स, डॉ टॉम्स क्रूसो और जेम्स फेंडिल ने बाकायदा एक आर्टिकल लिखा। यह लंदन में छपी हुई मैंगजीन है और 1794 में व लिख रहे हैं कि भारत के पुणे में 1793 में एक व्यक्ति की नाक कट गई थी। उस नाक को जोडऩे की प्रक्रिया आयुर्वेदिक सिस्टम में उन्होंने देखी  और सफलतापूर्वक की गई। यह उन्होंने रिसर्च पेपर पब्लिश किया। मजेदार बात यह है कि उन्होंने यह लिखा कि पुणे में जो नाक जोडऩे वाले थे, वे कौन लोग थे, वे कोई बहुत पढ़े-लिखे, हाई क्लास के नहीं थे। उन्होंने लिखा कि वे कुम्हार जाति के व्यक्ति थे, जो आज की तारीख में ओबीसी में आते है। यह दर्शाता है कि जो हमारा एडवांस सोर्स ऑफ नॉलेज था, हम कहीं न कहीं, किसी न किसी कारण से उसे पीछे छोड़ते चले गए।

मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आयुर्वेद कोई सेपरेट सब्जेक्ट नहीं था, जिसको वे मेडिसिन साइंस से रिलेट करते हैं। जैसे हमारे यहां जूलोजी, बॉटनी, केमिस्ट्री एक सिक्वेंस है, फिजिक्स, कैमिस्ट्री मैथ्स, एक सब्जेक्ट का ग्रुप है, वैसे ही तीन सब्जेक्ट्स के ग्रुप में से एक आयुर्वेद था, जो बड़ा व्यवस्थित ब्रांच ऑफ नॉलेज था, वह था कृषि पाक-शास्त्र और आयुर्वेद। कृषि मिन्स हाऊ टू ग्रो, पाक-शास्त्र मिन्स हाऊ टू कुक एंड आयुर्वेद मिन्स हाऊ टू गेट द मेडिसीनल वैल्यू उन सारी वैल्यूज को हम अच्छी तरीके से समझें और यदि हम उन चीजों को समझ पाएं तो आज हमें एक और चीज में बहुत लाभ मिलेगा, यह जो स्ट्रक्चरड मेकानिज्म सरकार लायी है। आज इंटिलैक्चुअल प्रॉपर्टी को लेकर बहुत सारे विवाद हैं, यदि आयुर्वेद के ग्रन्थ हमारे प्रभावी स्थिति में थे, उन्होंने हमें नीम के पेटेन्ट से, हल्दी के पेटेन्ट से, तुलसी के पेटेंट से मदद की, किन्तु आज तक भारत सिर्फ प्रतिक्रियात्मक रहा कि जब दूसरे ने पेटेंट कराया, तब हम जाकर खड़े हुए और कहा कि यह हमारा है। यदि यह जो प्रभावी मेकानिज्म सरकार ने बनाया है, इसके द्वारा हम अब प्रो-एक्टिव होकर कह सकते हैं कि ये सारे पेटेन्ट्स हमारे हैं तो ट्रेड-रिलेटेड इंटिलैक्चुअल प्रॉपर्टी में भी आप समझ लीजिए कि इसका एक हमें बहुत अच्छा लाभ फ्यूचर में मिलने वाला है।

अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि बहुत सी देसी दवाएं हैं, जिनकी तरफ यदि हम ध्यान दें, यदि हम केवल उनका साइंटिफिक नाम पढ़ लें तो हमें बहुत कुछ आसानी से समझ में आ जाता है, जैसे हृदय के लिए अर्जुन का पेड़ होता है। आपने अर्जुनारिष्ट और अर्जुनासव सुना होगा। यदि आपने केवल उसकी बोतल देखी हो तो उसकी बोतल पर उसका साइंटिफिक नाम टरमिनालिया अर्जुन लिखा है। वह हर्ट के लिए प्रूवन है और इसका नाम है टरमिनाकिया अर्जुन। यह अपने आप में इस बात को दर्शाता है कि जो हम कह रहे थे, अब छोटी सी बात यह कि कॉमन भाषा में तुलसी के लिए हॉली बेसिल शब्द प्रयोग होता है, हॉली शब्द तो अग्रेंजी ने दिया है, हमने नहीं दिया है, फिर भी कहीं न कहीं यह स्वीकारोक्ति है कि इसके अंदर कुछ महत्वपूर्ण चीज है। उदाहरण के लिए जिन-जिन वनस्पतियों को हमारे यहां स्वास्थ्य की दृष्टि से और पूजा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया, जैसे पीपल का वृक्ष है। पीपल के वृक्ष को हॉली फिग कहते हैं, मगर उसका साइंटिफिक नाम फिकस रिलिगिवोसा है।

उसमें रिलीजन है। वह उसमें फिक्स रिलिगिओसा बता रहा है यानी ये मान रहे हैं कि यह धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाने वाला जो पेड़ है, इसके अंदर बहुत सारे मेडिसीनल गुण हैं। अंत में मैं सिर्फ यह कहना चाहूंगा कि देखिए इसमें गर्व करने की आवश्यकता है, सिर्फ इसीलिए नहीं कि यह आयु का विज्ञान है, आयुर्वेद अथर्ववेद का हिस्सा है, आयुर्वेद धार्मिक टेक्सट है। आप दुनिया में कहीं भी  आर्युविज्ञान को धार्मिक टेक्सट के रूप में नहीं पाएंगे। आप दुनिया में कहीं भी गणित को धार्मिक टेक्सट के रूप में नहीं पाएंगे। मैं कहना चाहूंगा कि यह जो हमारा ज्ञान है, यह सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, गरीबों के लिए ही नहीं, बल्कि सबसे एडवांस्ड लेवल पर जो लोग बैठे हैं, उनके लिए भी उतना ही प्रभावी है और यह पूरे विश्व को आगे ले जाने की क्षमता रखता है। जो ऑस्ट्रेलियन कॉलेज ऑफ सर्जन्स हैं, उन्होंने सुश्रुत को सर्जरी का जनक माना है मेलबॉर्न में, अमेरिका में क्या माना जा रहा है, वह सबको पता है। मैं यह पंक्ति कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा, जो अटल जी ने कहा था,

‘मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।

मानव के मन का अंधकार, क्या कमी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर नम में घहर-घहर, सागर के जल में छहर-छहर।

इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय।’

 


सुधांशु
त्रिवेदी

(लेखक राजनीति विज्ञानं संकाय, इग्नू, नयी दिल्ली, से जुड़े हैं)

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