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कोविड महामारी से सबक : मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली, उन्नत भारत का आधार

कोविड महामारी से सबक : मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली, उन्नत भारत का आधार

देश में केविड-19 महामारी ने हमें बहुत कुछ सिखा दिया है। लोगों को जहां संयुक्त परिवार की अच्छाइयों और आवश्यकता से रूबरू कराया वहीं शासन और प्रशासन को चिकित्सा सेवाओं की दूरगामी आवश्यकताओं को लेकर भी सजग किया है। इससे प्रशासन को आगामी समय में चिकित्सा उपकरणों और इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ जीवनरक्षक दवाइयों की आपूर्ति सहित अन्य आवश्यकताओं के मुताबिक तैयारियां करने का मौका मिलेगा। सुधारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो मैं 11 बिन्दुओं पर बात करूंगा।

  • मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा शिक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ मेडिकल शिक्षकों की प्राईवेट प्रेक्टिस पर सीमित रोक लगनी चाहिये, जिससे छात्रों को क्लीनिकली सीखने का सर्वाधिक मौका मिल सके। ऐसा सिर्फ भारत में ही नही है, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों से यह बात उभरकर आई है।
  • प्राथमिक चिकित्सा देखभाल को सुदृढ बनाना। इस संदर्भ में आमतौर पर मूल बातें गौण कर दी जाती है जैसे कि कैसे रोगी की बात सुनें, निदान करें, पूछें, बात करें, जांच करें आदि। प्राथमिक देखभाल डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों को कम भुगतान किया जाता है और रोगियों की देखभाल एवं ट्रीटमेंट में उनकी बहुत कम हिस्सेदारी होती है। प्राथमिक देखभाल के एक मजबूत नेटवर्क के बिना, हम भविष्य में गुणवता की चिकित्सा प्रदान करने, लागत कम करने और इस तरह की महामारियों के खिलाफ एक मजबूत कवच बनाने में सक्षम नही होंगे यानी हेल्थ केयर डिलीवरी सिस्टम को मजबूत नही बना सकते।
  • ग्रामीण देखभाल में वृद्धि: हमारे देश में फिलहाल ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा आवश्यकतानुरूप मजबूत नहीं है, इसे और सुदृढ किए जाने की आवश्यकता है। डॉक्टरों को गांवों में रहना पसंद नहीं है, क्योंकि वहां बुनियादी सेवाएं उपलब्ध नहीं है। एम्बुलेंस और ट्रॉमा सेवाएं न्यूनतम हैं। सेकेंडरी या टेरटीअरी ट्रीटमेंट के लिए रेफरल प्रक्रिया का कोई सिस्टम बना हुआ नही हैं। इसके लिए ग्रामीण स्वास्थ्य निगम गठित किया जा सकता है। डॉक्टरों को गावों में रहने व प्रैक्टिस के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। वहां स्वास्थ्यकर्मी स्वयं समूह को निवेश के लिये विभिन्न योजनाएं लायी जा सकती हैं।
  • आयुष का समर्थन करते हुए स्वास्थ्य देखभाल की स्वदेशी प्रणालियों को नहीं छोडना चाहिए। उन्हें छोटे कस्बों व गांवो में, नगरपालिका क्षेत्रों में स्वास्थ्य देखभाल चिकित्सकों के विशाल नेटवर्क के साथ प्रोत्साहित और एकीकृत करने पर फोकस करना चाहिए।

  • सरकारी अस्पतालों में सुधार और विस्तार।
  • मेक इन इंडिया की तरह, हमारे पास ‘ट्रीट इन इंडिया’ होना चाहिए। राजनेताओं, वरिष्ठ नौकरशाहों और नेताओं को भारत में इलाज कराने की जरूरत है। यह एकमात्र तरीका है जिससे वे स्वास्थ्य देखभाल को गंभीरता से लेंगे और इसे सुधारने की दिशा में काम करेंगे। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र का हो उसे प्रथम तौर पर उसी क्षेत्र में चिकित्सा कराना अनिवार्य किया जाना चाहिए, उच्च स्तरीय चिकित्सा के लिए रेफरल व्यवस्था होनी चाहिये।
  • स्वास्थ्य देखभाल से राजनीतिक और व्यावसायिक हितों को हटा देने की जरूरत है। केवल ट्रीटमेंट की ही नही, ट्रीटमेंट खर्च में कितना शेयर किसका है, ऑडिट होनी चाहिए। चिकित्सा सेवाओं को अफोर्डेबल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
  • शहरी और ग्रामीण चिकित्सा ढांचे को मजबूत करने के लिए आपातकालीन और ट्रॉमा सेवाये ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की प्राथमिक उपचार में शामिल करके वेल डिफाइंड रेफरल सिस्टम डेवलप करना चाहिए।
  • अनुसंधान के लिए सभी निजी चिकित्सकीय संस्थओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और उसके लिए हयूमन रिसोर्सेज तैयार करना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिये बायो मेडिकल उपकरणों की शिक्षा, ग्रेजुएशन/ पोस्ट ग्रेजुएशन/ सुपर स्पेशलाइजेशन स्तर पर आवश्यक रूप से पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए।
  • बीमा प्रणाली एवं सरकारों द्वारा पारित स्कीम्स को फिर से परिभाषित और भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार वर्गीकृत करने की भी आवश्यकता है।

 

डॉ. एस एस अग्रवाल

(लेखक चेयरमैन, राजस्थान हॉस्पीटल, एवं आईएमए के भूतपूर्व अध्यक्ष हैं)