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मन के गहरे अंधरे कोनों की पड़ताल करता उपन्यास

मन के गहरे अंधरे कोनों की पड़ताल करता उपन्यास

हिन्दी कथा संसार का दायरा वैसे तो दिनों-दिन विस्तृत होता जा रहा है, फिर भी अभी कई विषय ऐसे हैं, जिन पर बहुत ज्यादा काम अभी तक सामने नहीं आया है। जबकि, इन्हीं विषयों पर विदेशों में बहुत काम हुआ है और अभी भी हो रहा है। नई सदी में हिन्दी कथा साहित्य ने कई नए विषयों की जमीनें तोड़ कर वहां कहानियों और उपन्यासों की फसल उगाई है। कई ऐसे विषय जिन पर पहले बहुत कम बात की जाती थीं, गिने-चुने उदाहरण जिनके मिलते थे, अब उन विषयों पर बहुत काम हो रहा है और लगभग अछूत समझे जाने वाले उन विषयों को नई सदी में सामने आए लेखक ख़ूब उठा रहे हैं। नई सदी का साहित्य एकदम नए नजरिये का साहित्य है, जिसमें कहीं किसी भी विषय से परहेज करने वाली बात दिखाई नहीं देती है। शोध करके लिखने की प्रवृत्ति भी इधर काफी दिखाई देती है। क्योंकि; इंटरनेट के कारण शोध कार्य में कुछ आसानी हो गई है। इन दिनों जो उपन्यास सामने आ रहे हैं, वह बहुत अध्ययन और शोध से उपजे हुए होते हैं, उनके पीछे किया गया परिश्रम साफ दिखाई देता है।

सुधा ओम ढींगरा का अधिकांश महत्वपूर्ण लेखन नई सदी में ही सामने आया है तथा उनकी महत्त्वपूर्ण तथा चर्चित किताबें भी नई सदी में ही सामने आई हैं। इसीलिए उनको नई सदी में सामने आई कथा-पीढ़ी के साथ ही रेखांकित करना होगा। हिन्दी में कथा-समय से ज्यादा वरिष्ठ-कनिष्ठ के दायरों में काम होता है, जो ठीक नहीं है। असल में एक कथा-समय को ही रेखांकित किया जाना चाहिए। उस कथा-समय में सक्रिय कौन था, कौन अपने समय के परिवर्तनों पर नजर रखे हुए था, तथा उसकी रचनाओं में उस परिवर्तन की आहट महसूस हो रही थी या नहीं; यह सब देखा जाना बहुत जरूरी है। कई सारे वरिष्ठ लेखक ऐसे हैं, जिनकी शैली, शिल्प तथा विषयों में नवीनता दिखाई दे रही है, जबकि कई युवा लेखक ऐसे हैं, जो पारंपरिक ढर्रे पर ही चल रहे हैं, ऐसे में आप नए कथा-समय की बात करते समय किसको उसमें शामिल करोगे। उस लेखक को जो नया है या उस लेखक को जिसका लेखन नया है?

‘दृश्य से अदृश्य का सफर’ की कहानी प्रारंभ तो होती है कोरोना की उस पहली लहर के साथ, जो 2020 में पूरे विश्व में एक साथ आई थी, लेकिन कहानी चूंकि कोरोना की नहीं है कुछ और है, इसलिए बहुत जल्द कहानी कोरोना को छोड़कर अपने मूल विषय पर आ जाती है। सुधा ओम ढींगरा ने अपने पिछले उपन्यास की तरह इसमें भी प्रतीक के रूप में कोरोना का उपयोग किया है, किन्तु उस प्रतीक के माध्यम से बिलकुल अलग कहानी कही है। पिछले उपन्यास में तूफान था इसमें कोरोना है। वह उपन्यास तूफान की कहानी नहीं था, यह भी कोरोना की कहानी नहीं है। लेखक ने केवल टेकऑफ के लिए तूफान या कोरोना का केवल रनवे की तरह उपयोग किया है, एक बार जब कहानी रनवे को छोड़ देती है, तो फिर वह दूसरी दुनिया में पहुंच जाती है। फिर उस रनवे की कोई कहानी नहीं, अब उस आसमान की कहानी है, जिसमें कहानी उड़ रही है। रनवे अंत में आता है जब कहानी वापस आकर लैंड करती है। यह बहुत ही दिलचस्प शैली है कहानी कहने की। किसी प्रतीक को इतनी खूबसूरती के साथ उपयोग करना कि कहानी के मूल विषय के साथ उसका तेल-पानी वाला रिश्ता बना रहे, साथ भी रहें और अलग भी रहें। कहानी असल में घटना नहीं होती है, कहानी का विषय जरूर घटना से आ सकता है। लेकिन; उस विषय का ट्रीटमेंट लेखक किस प्रकार कर रहा है, वह किसी प्रकार उस विषय का उपयोग कर रहा है कि पढ़ते समय पाठक को वही कहानी लगे घटना नहीं लगे। यह उपन्यास इस शैली को समझने का एक अच्छा उदाहरण है कि; किस प्रकार किसी घटना का उपयोग कहानी में किया जाता है।

प्रवासी भारतीयों के लेखन ने हिन्दी में एक नई दुनिया के झरोखे खोलने का काम किया है। यह लेखन भारतीय की दृष्टि से उस देश को देखता है, इसीलिए यह लेखन भारतीय पाठकों के अंदर पैठने में सफल रहता है। ‘दृश्य से अदृश्य का सफर’ का सफर भी एक ऐसा ही उपन्यास है। यह उपन्यास कहानी तो अमेरिका की कहता है, किन्तु नजरिया भारत का ही रहता है। कहानी का मुख्य पात्र अमेरिका में बसा हुआ भारतीय है। उस पर विषय ऐसा है, जो दुनिया के हर हिस्से में एक सा ही है। मनोवैज्ञानिक समस्याएं जिनको हम अज्ञानतावश बीमारी भी कहते हैं। यह उपन्यास उन लोगों को अवश्य पढऩा चाहिए जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं को बीमारी कहते हैं, समझते हैं। यह उपन्यास मनोवैज्ञानिक समस्याओं को देखने के नज़रिये में आमूलचूल परिवर्तन ला देता है। इस उपन्यास को पढऩे के बाद किसी ऐसे व्यक्ति को देखने का पूरा दृष्टिकोण बदल जाता है। लेखक की एक और सफलता यह है कि यह उपन्यास बहुत अच्छे से समझाता है कि मनोवैज्ञानिक समस्याएं असल में जीवन में आ रही कुछ बड़ी मुश्किलों, असाधारण घटनाक्रमों तथा इन सबसे उपजे भय का ही परिणाम होती हैं। जब यह भय समाप्त हो जाता है तो समस्याएं भी समाप्त हो जाती हैं। यह इस उपन्यास का सबसे महत्त्वपूर्ण तथा जरूरी बिन्दु हैं। लेखक ने मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के अंदर बैठे भय को परत दर परत खोला है। और न केवल खोला है बल्कि समाधान प्रद तरीके से खोला है। साहित्य का कार्य भी तो यही होता है कि वह समस्या तक न रुके बल्कि आगे बढ़े वहां तक, जहां समस्या का समाधान है।

कहानी भारतीय मूल की डॉ. लता भार्गव के अनुभवों का सहारा लेकर आगे बढ़ती है। डॉ. लता भार्गव जो एक साइकॉलॉजिस्ट हैं तथा फैमिली काउंसलिंग का काम करती हैं। उनके स्मृति कोश में कुछ ऐसे जटिल केस सुरक्षित हैं, जो सबसे चुनौतीपूर्ण केस थे उनके लिए।

उपन्यास की एक विशेषता यह है कि भले ही तीन कहानियों के माध्यम से मनोविज्ञान की दुनिया की बात कही गई है, लेकिन यह तीनों कहानियां बिलकुल अलग-अलग कहानियां हैं। तीनों कहानियों में समस्या के मूल में अलग-अलग कारण हैं और इसी वजह से तीनों कहानियों में समस्या अलग-अलग रूप में सामने आती है। परिवार के ही सदस्यों द्वारा सामूहिक बलात्कार, एसिड अटैक तथा क्रूर एवं अत्याचारी पति यह तीन कारण तीन अलग-अलग कहानियों में हैं। तीनों का संत्रास इतना गहरा और भयावह है कि इसकी शिकार तीनों महिलाएं मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझने लगती हैं। और सामान्य स्तर पर नहीं बल्कि बहुत गंभीर स्तर पर। तीन अलग-अलग कहानियों में तीन बड़े कारणों को लेखक ने उठाया है। तीन कारण जो महिलाओं को पूरा जीवन किसी तूफान की तरह झकझोर कर रख देते हैं, और उसके बाद सामने आती हैं मनोवैज्ञानिक समस्याएं। असल में यही वह बिन्दु है, जिस पर आकर कोरोना की कथा इन तीन महिलाओं की कहानी से एकाकार हो जाती है।

उपन्यास की शैली सुधा ओम ढींगरा ने बहुत सहज और सरल रखी है। जब कहानी वर्तमान में होती है तो संवाद शैली से आगे बढ़ती है और जब फ्लैशबैक में होती है तो किस्सागोई की शैली में। लेखक दोनों ही शैलियों में सिद्धहस्त है इसलिए उपन्यास की पठनीयता इस आवाजाही में बरकरार रहती है। विशेषकर किस्सागोई में तो सुधा ओम ढींगरा बहुत कुशल हैं, इसलिए जब उपन्यास तीन बार फ्लैशबैक में जाता है, तो किस्सागोई शैली के चलते उपन्यास की रोचकता और बढ़ जाती है। तीनों फ्लैशबैक पाठक की आंखों के सामने चलचित्र की तरह गुजरते हैं। दृश्य दर दृश्य उपस्थित होते हुए। डॉली, सायरा और दक्षिण भारतीय महिला के स्कैच पाठक की आंखों के सामने बन जाते हैं। तीनों कहानियों को बहुत मेहनत से लेखक ने विजुअल माध्यम की तरह गढ़ा है। उपन्यास की भाषा को भी लेखक ने शैली की ही तरह बिलकुल सहज और सरल रखा है। आम बोलचाल की भाषा में संवाद गढ़े हैं, इस प्रकार की पढ़ते हुए पाठक को अपने ही लगते हैं। जो चिकित्सकीय ब्यौरे हैं वह भी इस प्रकार हैं कि पाठक को आसानी से समझ आ जाते हैं। इस प्रकार का जटिल विषय उठाते समय इतनी सहज और सरल भाषा तथा शैली लेना बहुत आवश्यक है, जिससे कृति जटिलता का शिकार न होने पाए।

कुल मिलाकर यह उपन्यास ‘दृश्य से अदृश्य का सफर’ मानव मन के गहरे अंधेरे कोनों की पड़ताल की कहानी है। सुधा ओम ढींगरा ने कुछ नए पन्नों को हिन्दी पाठक के सामने खोलने का कार्य इस उपन्यास के माध्यम से किया है। यह भी संयोग है कि कोरोना की पहली लहर के बाद लिखा गया यह उपन्यास जब सामने आया, तब भारत दूसरी लहर की भयावहता से जूझ रहा था। हिन्दी में इस तरह के प्रयोग और होते रहें इसके लिए आवश्यक है कि इस तरह के प्रयोगों का स्वागत किया जाए। इस तरह की कृतियां जो एकरसता को तोड़ती हैं और कुछ नई दिशाओं की खिड़कियां खोलती हैं, इनके स्वागत करने से आने वाले समय में इस प्रकार के और प्रयोग सामने आएंगे। यह उपन्यास एक यात्रा है, उस अज्ञात की यात्रा, जो कुहासे में छिपा हुआ अज्ञात है। लेखक ने अपनी भाषा और शैली से इस यात्रा को दिलचस्प और रोचक बना दिया है।

 

दृश्य से अदृश्य का सफर

लेखिका                 : सुधा ओम ढींगरा

प्रकाशक                : शिवना प्रकाशन

मूल्य                      : 150 रु.

पृष्ठ                        : 152 रु.

 

      –  पंकज सुबीर

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