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देवस्वरूप शंख

देवस्वरूप शंख

भारतीय संस्कृति में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख सूर्य और चन्द्रमा के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। इस मंगलचिह्न को पूजा स्थल में रखने से अरिष्टों और अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। सर्वलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख भी एक निधि है। शंख का हमारी पूजा में निकट का संबंध है। कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल, गंगाजल के सदृश्य पवित्र हो जाता है। जिस घर में नियमित शंख ध्वनि होती है वहां कई तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है। इसके पूजन से श्री समृद्धि आती है, साथ ही शंख को लक्ष्मी का भी प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा महालक्ष्मी को प्रसन्न करने वाली होती है। जो व्यक्ति नियमित रूप से शंख की पूजा करते हैं उसके घर में कभी धन अभाव नहीं रहता। शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण का स्वरूप कहे जाने वाले मार्गशीर्ष माह में उन्हीं के पाञ्चजन्य शंख की पूजा का विशेष महत्व है। अगहन मास में शंख पूजा से सभी मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। शंख को देवता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है इसके माध्यम से अभीष्ट की प्राप्ति की जाती है। पाञ्चजन्य की पूजा भी भगवान श्री हरि की आराधना के समान ही पुण्य देने वाली मानी गई है।

शंख की उत्पत्ति

आध्यात्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार देवता और दानवों ने अमृत की खोज के लिए मंदराचल पर्वत की मथानी से क्षीरसागर मंथन किया, उससे 14 प्रकार के रत्न प्राप्त हुए। आठवें रत्न के रूप में शंख का जन्म हुआ। माता लक्ष्मी के समान ही शंख भी सागर से उत्पन्न हुआ है, इसलिए इसे माता लक्ष्मी का सहोदर भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में शंख को बहुत ही शुभ माना गया है। इसका कारण यह है कि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु दोनों ही अपने हाथ में शंख धारण किए हुए हैं। शंख में पंच तत्वों का संतुलन बनाए रखने की प्रचुर क्षमता है।

शंख के प्रकार
शंख मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं -दक्षिणावर्ती, मध्यवर्ती, वामावर्ती। इनमें दक्षिणावर्ती शंख दाईं तरफ से खुलता है, मध्यवर्ती बीच से और वामावर्ती बाईं ओर से। मध्यवर्ती शंख बहुत ही कम मिलते हैं। शास्त्रों में इसे अति चमत्कारिक बताया गया है। इन तीन प्रकार के शंखों के अलावा भी अनेक प्रकार के शंख पाये जाते हैं। जैसे लक्ष्मी शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, गोमति शंख, देव शंख, राक्षस शंख, विष्णु शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, शनि शंख, राहु एवं केतु शंख आदि।

शंख के चमत्कार
दक्षिणावर्ती शंख – इस शंख को देवस्वरुप माना गया है। इसके भी दो प्रकार होते हैं – नर और मादा। जिसकी परत मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली और हल्की हो वह मादा शंख होती है। दक्षिणावती शंख की स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। दक्षिणावर्ती शंख की प्रथम पहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। दूसरे पहर में पूजन करने से धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय पहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ पहर में पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है

श्री गणेश शंख – इस शंख की आकृति भगवान गणेश की तरह होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।

अन्नपूर्णा शंख – अन्नपूर्णा शंख घर में सुख, श्री समृद्धि और शांति के लिए अत्यंत उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।

कामधेनु शंख – कामधेनु शंख का उपयोग तर्कशक्ति को प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

मोती शंख – इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें। इसकी प्रतिदिन पूजा करने से लाभ मिलता है।

ऐरावत शंख – ऐरावत शंख का उपयोग मनचाही साधना को पूर्ण करने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डालकर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24-28 घंटे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें तो चेहरा कांतिमय बनता है।

विष्णु शंख – इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोग मुक्त हो जाता है।

पौण्ड्र शंख – पौण्ड्र शंख का उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे कक्ष में पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए।

मणिपुष्पक शंक – मणिपुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश, कीर्ति, मान, सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।

देवदत्त शंख – इसका उपयोग दुर्भाग्यनाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक मान गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

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