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केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल के निहितार्थ

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल के निहितार्थ

भारतीय राजनीति में जब भी कभी कोई फेरबदल, कोई नया बदलाव, चुनावी टिकटों का बंटवारा या फिर किसी की ताजपोशी होती है, तब दो शब्दों ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का प्रयोग होता है। कहना न होगा कि सात जुलाई को हुए मोदी सरकार के फेरबदल और विस्तार के संदर्भ में भी इन दोनों शब्दों का खूब प्रयोग हो रहा है। दिलचस्प यह है कि दलीय सीमाओं को लांघ चुके इन शब्दों का राजनीति के संदर्भ में प्रयोग भारतीय जनता पार्टी के संगठन महासचिव रहते वक्त गोविंदाचार्य ने किया था। पिछड़े और दलित वर्ग में भाजपा का आधार बढ़ाने की कोशिश को तब सोशल इंजीनियरिंग कहा गया था। जाहिर है कि मोदी सरकार के इस फेरबदल के बारे में भी राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि यह कोशिश सोशल इंजीनियरिंग की प्रक्रिया का भी अंग रहा।

मंत्रिपरिषद में शामिल लोगों के जातीय और धार्मिक आधार को देखें तो स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ख्याल रखा है। मौजूदा मंत्रिपरिषद में सबसे ज्यादा अन्य पिछड़ी जातियों के 27 मंत्री शामिल किए गए हैं। कभी जिस अन्य पिछड़े वर्ग के मतों पर जनता परिवार और सामाजिक पृष्ठभूमि वाले दल अपना हक मानते थे, उस आधार में भारतीय जनता पार्टी ने जबरदस्त सेंध लगाई है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में यादव समुदाय को छोड़ दें तो तकरीबन समूचे अन्य पिछड़े वर्ग पर भाजपा का जादू चल रहा है। अगले चुनावों में यह जादू बरकरार रह सके, इसलिए इस वर्ग को तवज्जो देना भारतीय जनता पार्टी की मजबूरी ही नहीं, जरूरत भी है। इसीलिए इस वर्ग के पांच लोगों को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दो चुनावों में साबित किया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में भी अपना आधार मजबूत किया है। हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव में भी यह दिखा। शायद यही वजह है कि अनुसूचित जनजाति के आठ सांसदों को इस मंत्रिपरिषद में जगह मिली है, जिनमें से तीन कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति समुदाय से शामिल किए गए 12 मंत्रियों में दो को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला है। आजादी के बाद संभवत: यह पहला मंत्रिमंडल है, जिसमें रिकॉर्ड 11 महिलाओं को जगह मिली है। जिनमें से दो कैबिनेट मंत्री हैं।

मंत्रिमंडल का जातीय और धार्मिक संतुलन साधने के साथ ही इनमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व देने के लिहाज से भी मौजूदा फेरबदल में अच्छी कोशिश हुई है। मौजूदा मंत्रिपरिषद में अल्पसंख्यक समुदाय के पांच मंत्री शामिल किए गए हैं, जिनमें से दो बौद्ध, एक मुसलमान, एक ईसाई और एक सिख समुदाय से से हैं।

आजादी के सात दशक बीतने के बावजूद व्यवस्था और सोच को यहां तक बढ़ जाना चाहिए था कि मंत्रियों के चयन का आधार उनकी प्रशासनिक कुशलता और योग्यता होनी चाहिए थी, लेकिन राजनीति जिस कदर धर्म और जाति के खांचे में अब भी बंटी है कि चाहे कोई भी दल या नेता हो, उसे जातीय और धार्मिक समुदायों के बीच संतुलन साधने के लिए ऐसी कोशिश करनी ही होगी।

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन की अवधारणा पेश की थी। इसी वजह से उन्होंने अपना पहली मंत्रिपरिषद में महज 46 मंत्रियों को ही शामिल किया था। लेकिन बदलते वक्त के साथ उन्हें अपना यह विचार बदलना पड़ा है। इसकी वजह यह है कि छोटी मंत्रिपरिषद के चलते कई मंत्रियों पर काम और कई-कई विभागों का दबाव इतना था कि उनके लिए कुशलतापूर्वक काम निबटा पाना आसान नहीं था।

मौजूदा मंत्रिपरिषद को पिछले की तुलना में अपेक्षाकृत युवा कहा जा सकता है। क्योंकि मौजूदा मंत्रिपरिषद में शामिल 14 मंत्रियों की आयु पचास साल से भी कम है। इस नई टीम की औसत उम्र 58 साल है। इस कैबिनेट को पढ़े-लिखे और अनुभवी लोगों की भी परिषद कहा जा सकता है। मौजूदा मंत्रियों की शैक्षिक योग्यता की बात करें तो 13 वकील हैं, जबकि छह डॉक्टर हैं। इसी तरह पांच इंजीनियर हैं। जबकि सात लोगों ने पीएचडी कर रखी है, जबकि तीन लोग एमबीए पास हैं। युवा आधार के साथ ही इस मंत्रिपरिषद के बारे में कहा जा सकता है कि यह अनुभवी लोगों की टीम है। इसमें शामिल मंत्रियों में 18 ऐसे हैं, जो अतीत में राज्य मंत्री रह चुके हैं। इसी तरह 23 सांसद ऐसे हैं, जो तीसरी बार चुनकर आए हैं। जबकि 46 लोगों को केंद्र के साथ काम करने का अनुभव है।

इस फेरबदल में उन राज्यों पर जोर दिया गया है, जिनमें अगले साल चुनाव होने हैं। इनमें सबसे ज्यादा जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को दिया गया है। जिसके सात मंत्री शामिल किए गए। पंकज चौधरी, अनुप्रिया पटेल, एसपी बघेल, भानुप्रताप सिंह वर्मा, कौशल किशोर, बनवारी लाल वर्मा और अजय कुमार मिश्रा को उत्तर प्रदेश से मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है। सभी को राज्यमंत्री बनाया गया। उत्तर प्रदेश से मंत्रिपरिषद में पहले से ही राजनाथ सिंह, महेंद्र पांडेय और शिवप्रताप शुक्ल शामिल हैं। अगले साल गुजरात में भी चुनाव होना है। इसलिए वहां के पांच मंत्री शामिल किए। हालांकि चुनाव वाला राज्य होने के बावजूद उत्तराखंड को इसका फायदा नहीं मिला। वहां से एक मंत्री को हटाकर एक ही को ही शामिल किया गया। इसी तरह महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल से चार-चार मंत्री लिए गए हैं।

विपक्षी खेमे में मौजूदा मंत्रिपरिषद विस्तार की आलोचना उसमें शामिल किए गए प्रशासनिक सेवा की पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों के शामिल किए जाने को लेकर की जा रही है। बिहार कैडर के आईएएस रहे राजकुमार सिंह, पूर्व विदेश सचिव हरदीप पुरी और एस जयशंकर के साथ ही पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह पहले से ही मंत्रिमंडल में शामिल थे। अब इस सूची में नया नाम अश्विनी वैष्णव का भी जुड़ गया है। दिलचस्प यह है कि हरदीप पुरी और राजकुमार सिंह पहले राज्यमंत्री थे। लेकिन अब उन्हें कैबिनेट बना दिया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निजी सचिव रहे अश्विनी वैष्णव को रेल, संचार और सूचना तकनीक जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी देकर प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि तकनीक आधारित इन मंत्रालयों में तेजी से काम होगा। वैसे जनता दल यू कोटे से शामिल रामचंद्र प्रसाद सिंह भी पूर्व नौकरशाह हैं और कई मंत्रालयों में सचिव का दायित्व संभाल चुके हैं।

मौजूदा मंत्रिपरिषद विस्तार का एक संदेश और भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने गठबंधन के दलों को साधने की भी कोशिश की है। अब तक गठबंधन से सिर्फ रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) के नेता रामदास आठवले ही मंत्रिपरिषद में शामिल थे। लेकिन अब उत्तर प्रदेश से अनुप्रिया पटेल और बिहार से आरसीपी सिंह को शामिल किया गया है। अनुप्रिया पटेल की मंत्रिपरिषद में वापसी को उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है।

इस फेरबदल में सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक रहा सूचना और प्रसारण के साथ वन और पर्यावरण मंत्रालय संभाल रहे प्रकाश जावड़ेकर के साथ ही कानून, संचार और सूचना तकनीक मंत्री रविशंकर प्रसाद की विदाई। इसी तरह रमेश पोखरियाल निशंक और स्वास्थ्य मंत्रालय संभाल रहे हर्षवर्धन के इस्तीफों पर भी लोगों को हैरत हो रही है। जावड़ेकर के बारे में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सूचना और प्रसारण जैसे कोर मंत्रालय को वे संभाल नहीं पा रहे थे। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सरकार की किरकिरी को वे संभाल नहीं पाए। फिर मंत्रालय पर उनका नियंत्रण कम था। यही स्थिति रमेश पोखरियाल निशंक के बारे में भी कहा जा रहा है। वे शिक्षा मंत्रालय में वैसी चुस्ती नहीं ला पाए, जैसी जरूरत महसूस की जा रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों मंत्रियों के कामकाज से खुश नहीं था। इसलिए उन्हें जाना पड़ा। अब सूचना और प्रसारण का जिम्मा अपेक्षाकृत युवा और उत्साही अनुराग ठाकुर को दिया गया है, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से राजनीति में आए धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय की कमान दी गई है। दोनों पर अब संघ के कोर मुद्दों की बुनियाद पर आगे बढऩे का दबाव रहेगा। रविशंकर प्रसाद लगातार सरकार का चेहरा रहे। ऐसा माना जा रहा है कि कानून मंत्री के नाते वे न्यायपालिका को नहीं साध सके तो संचार और आईटी मंत्री रहते वे सोशल मीडिया कंपनियों को नहीं संभाल पाए। वहीं हर्षवर्धन के बारे में कहा जा रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर के वक्त वे बेहतर इंतजाम नहीं कर पाए।

भारत जैसे देश में सभी वर्गों और क्षेत्रों को साध पाना और उन्हें खुश रख पाना आसान नहीं होगा। बहरहाल 78 सदस्यीय मंत्रिपरिषद बनाकर मोदी ने यह संदेश जरूर देने की कोशिश की है कि भाजपा का लक्ष्य उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को जीतना तो है ही, जमीनी स्तर पर काम होना भी जरूरी है।

 


उमेश
चतुर्वेदी

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