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इस्लामिक देशों में बदलाव की बयार

इस्लामिक देशों में बदलाव की बयार

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। युगीन आवश्यकता एवं वर्तमान परिस्थिति-परिवेश के अनुकूल परिवर्तन सतत चलते रहना चाहिए। इसी में अखिल मानवता और जगती का कल्याण निहित है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया चारों दिशाओं और सभी पंथों-मजहबों में देखने को मिलती रही है। इतना अवश्य है कि कहीं यह प्रक्रिया तीव्र है तो कहीं थोड़ी मद्धिम, पर यदि हम जीवित हैं तो परिवर्तन निश्चित एवं अपरिहार्य है।

इस्लाम में यह प्रक्रिया धीमी अवश्य है, पर सतह के नीचे वहां भी परिवर्तन की तीव्र कामना और बेचैन कसमसाहट पल रही है। एक ग्रंथ, एक पंथ, एक प्रतीक, एक पैगंबर को लेकर उसका आग्रह न केवल प्रबल रहा है, बल्कि वह अन्य मतावलंबियों एवं धर्मों के प्रति अत्यंत असहिष्णु एवं आक्रामक भी रहा है। वह ताकत या तलवार के बल पर अपना प्रसार करता रहा है। उसकी यह आक्रामकता एवं असहिष्णुता वर्तमान से लेकर इतिहास तक देखने को मिलती है। स्वाभाविक है कि तमाम इस्लामिक देशों और उनके अनुयायियों के दिल और दिमाग में जमी सदियों पुरानी धुंध आज कुछ-कुछ छंटने लगी है, उनके जेहन के बंद-अंधेरे कोने में सुधार, बदलाव और उदारता की उजली किरणें दस्तक देने लगी हैं। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों में पिछले कुछ वर्षों में आए बदलाव की बयार इसकी पुष्टि करते हैं।

यह सुखद है कि हाल ही में कई इस्लामिक देशों में कुछ ऐसे बदलाव हुए जो सुधार एवं परिवर्तन, उदारता एवं सहिष्णुता, सहयोग एवं समन्वय की उम्मीद जगाते हैं। 2015 में  सऊदी अरब में महिलाओं को मत देने का अधिकार सौंपा गया तो पूरी दुनिया में उसकी प्रशंसा हुई। सऊदी अरब सबसे अंत में महिलाओं को मताधिकार सौंपने वाला देश बना। वर्ष 2018 में जब उसने महिलाओं को कार चलाने की इजाजत दी तो उसकी भी चारों ओर प्रशंसा हुई। ऐसे अनेक सुधार पिछले कुछ महीनों-वर्षों से वहां देखने को मिल रहे हैं। चाहे महिलाओं के अकेले यात्रा करने का मुद्दा हो या अपनी रुचि एवं मर्जी के परिधान पहनने का, ये सभी बदलाव इस्लाम के युग विशेष से आगे बढऩे की ओर संकेत करते हैं। कबीलाई एवं मध्य युगीन मानसिकता से बाहर आना इस्लाम की सबसे बड़ी चुनौती है। सुखद है कि इस्लामिक देशों में सुधार और बदलाव की मंद-मद्धिम बयार बहने लगी है। इसमें जो सबसे ताजा एवं उल्लेखनीय बदलाव है- वह है कुछ दिनों पूर्व सऊदी अरब के विभिन्न मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों पर नमाज के वक्त ऊंची आवाज में दिए जाने वाले अजान पर कुछ शर्तों और पाबंदियों का लगना। एक वहाबी विचारधारा वाले देश में ऐसी पाबन्दियां एवं शर्तें एक युगांतकारी निर्णय एवं घटना है। इसमें भविष्य के उजले संकेत निहित हैं।

आश्चर्य है कि जो इस्लाम विज्ञान एवं तकनीक को लगभग अस्पृश्य-सा समझता है, साहित्य, संगीत, कला और अभिव्यक्ति पर तमाम प्रकार के पहरे लगाता है, वह नमाज एवं अजान के लिए वैज्ञानिक उपकरणों एवं अविष्कारों के प्रयोग से परहेज नहीं करता! असली तार्किकता एवं वैज्ञानिकता समय के साथ चलने में है। यह सऊदी अरब की सरकार का बिलकुल उचित एवं समयानुकूल फैसला है कि एक निश्चित समय के बाद एवं निश्चित ध्वनि से ऊंची आवाज में मस्जिदों पर लाउडस्पीकर न बजाया जाय। कितने बुजूर्ग-बीमार, बूढ़े-बच्चे, स्त्री-पुरुष मस्जिदों में बजने वाले लाउडस्पीकरों की ऊंची आवाज से अनिद्रा एवं अवसाद के शिकार हो जाते हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई में अत्यधिक बाधा पहुंचती है। अलग-अलग शिफ्ट में काम करने वाले लोग दो पल चैन की नींद नहीं ले पाते। भारत जैसे देश, जहां रोज नई-नई मस्जिदों की कतारें खड़ी होती जा रही हैं, वहां की स्थितियां तो और भयावह एवं कष्टप्रद हैं।

यदि इस्लामिक देश सऊदी अरब वर्तमान की आवश्यकता, सभ्य एवं उदार समाज की रचना-स्थापना और अपने नागरिकों के सुविधा-सुरक्षा-स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मस्जिदों में ऊंची आवाज में बजने वाले लाउडस्पीकरों पर शर्तें और पाबन्दियां लगा सकता है तो धर्मनिरपेक्ष देश भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? कुकरमुत्ते की तरह हर गली-चौक-चौराहे-सड़क-बाजार-प्लेटफॉर्म-स्टेशनों-बस अड्डों-सरकारी जमीनों पर उग आए मस्जिदों और घनी आबादी के कारण यहां तो इसकी और अधिक आवश्यकता है।

सऊदी प्रशासन ने अपने आदेश में तर्क दिया है कि ‘इमाम नमाज शुरू करने वाले हैं, इसका पता मस्जिद में मौजूद लोगों को चलना चाहिए, ना कि पड़ोस के घरों में रहने वाले लोगों को। बल्कि यह कुरान शरीफ का अपमान है कि आप उसे लाउडस्पीकर पर चलाएं और कोई उसे सुने ना या सुनना ना चाहे।’

क्या यह अच्छा नहीं होगा कि भारत के उदार, सहिष्णु, जागरूक एवं प्रबुद्ध मुसलमान बड़ी संख्या में आगे आकर ऐसी मांग रखें, इस्लाम के भीतर ऐसा सुधारवादी आंदोलन चलाएं  जो उसके उदार एवं सहिष्णु पक्ष को उजागर करे! वे इमामों-मौलानाओं-स्कॉलरों को मनाएं ताकि उनके मजहबी एवं दकियानूसी रिवाजों के कारण बीमारों-वृद्धों-बच्चों-लाचारों को अकारण कोई कष्ट न हो!  और न मानने की स्थिति में वे सरकार से हस्तक्षेप कर कानून बनाने की सार्वजनिक अपील करें।

 


प्रणय
कुमार

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