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कब तक दहेज की आग में जलती रहेंगी बेटियां?

कब तक दहेज की आग में जलती रहेंगी बेटियां?

केरल में दहेज को लेकर प्रताडि़त किए जाने से परेशान होकर 24 वर्षीय एस विस्मया नायर ने अपनी जान दे दी। आयुर्वेद की पढ़ाई कर रही एस विस्मया की शादी एक सरकारी कर्मचारी एस किरन कुमार से हुई थी। दहेज कम मिलने को लेकर किरन अपनी पत्नी विस्मया को ताने सुनाता था। इतना ही नहीं वो पत्नी से मारपीट भी करता था। रोज-रोज के तानों और मारपीट से तंग आकर एस विस्मया को लगा कि इस तरह की जिंदगी जीने से तो मर जाना ही बेहतर है और उसने मौत को गले लगा लिया। बीते दिनों दहेज के लिए प्रताडि़त किये जाने के कारण अहमदाबाद की रहने वाली आयशा ने सुसाइड कर लिया।

इस तरह रांची से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मेसरा पंचायत के कल्याणी बस्ती में रहने वाली 22 वर्षीय पूजा ने अपने ही घर में आत्महत्या कर ली। पूजा के ससुराल के लोग दहेज को लेकर लगातार उसके पिता को परेशान कर रहे थे। अपने पिता को दहेज के कारण हो रही परेशानी को पूजा बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने अपने ही घर में फांसी के फंदे से झूलकर अपनी जान दे दी। वहीं राजस्थान के बाड़मेर जिले में दहेज के कारण पंकज कंवर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। पंकज कंवर की शादी छ: वर्ष पूर्व परमवीर सिंह से हुई थी, जिसके बाद से ही पति परमवीर सिंह, ससुर, जेठ और सास उसे दहेज के लिए प्रताडि़त कर मारपीट करते रहते थे। इधर, मध्य प्रदेश के चंद्रकुआ में नवविवाहिता ज्योति सोनवाने, 25 वर्ष, ने पति, सास, ससुर द्वारा दहेज की मांग को लेकर दी जा रही प्रताडऩा से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या की। वहीं केरल के कोल्लम जिले में दहेज के कारण 21 मार्च, 2020 को एक 27 साल की महिला थूशरा की मौत हो गई। दरअसल, थूशरा की शादी के वक्त दो लाख रुपए दहेज की मांग रखी गई थी जो उसके माता-पिता नहीं दे पाए। दहेज की मांग पूरी न होने के कारण उसका पति और सास उसका शोषण करते थे।

ये तो चंद उदाहरण है, जबकि हकीकत कुछ और ही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, साल 1995 में दहेज के कारण लगभग 4668 मौतें हुई थीं। साल 2005 में यह आंकड़ा बढ़कर 6787 हो गया था और साल 2015 में लगभग 7634 महिलाओं की मौत दहेज हत्या के कारण हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरूरी शर्त बना देता है वो अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है और साथ ही पूरी महिला जाति का अपमान भी करता है। महात्मा गांधी ने ये बात भारत की आजादी से भी पहले कही थी लेकिन विडंबना देखिए कि हमारे देश के लोग आज भी दहेज मांगते हैं और दहेज के रूप में जो नोट उन्हें मिलते हैं उन पर भी महात्मा गांधी की ही तस्वीर होती है। यानी दहेज लेने और देने के मामले में हमारा समाज बेशर्मी की सारी हदें पार कर जाता है। मुंशी प्रेमचंद की ‘निर्मला’ दहेज प्रथा का सच्चा उपन्यास है। इस उपन्यास की नायिका ‘निर्मला’ दहेज के अभाव में बूढ़े तोताराम के साथ ब्याह दी गई। दुष्परिणाम यह हुआ कि उपन्यास का नायक तोताराम की हरी-भरी जिंदगी श्मशान में बदल गई। स्वयं निर्मला भी तनावग्रस्त होकर चल बसी।

प्राचीन भारतीय समाज में दहेज प्रथा के पीछे लालच और सौदेबाजी की भावना नहीं थी, जैसी आधुनिक समाज में प्रकट हो रही है। प्राचीन काल में भारत सब तरह से संपन्न था। आर्यों की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह के बाद पति के परिवार में जाने वाली कन्या का पिता की संपत्ति से संबंध टूट जाता था और पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार पुत्रों का ही होता था। इस कारण से विवाह के अवसर पर कन्यापक्ष यथाशक्ति अपनी संपत्ति का एक भाग वरपक्ष को देता था, जिससे कि कन्या सुखी रह सके। यह सब पुण्य का कार्य समझकर किया जाता था। कन्या की विदाई के अवसर पर उसे स्वर्णाभूषणों से सजाकर मंगल कामना प्रकट करना अनुचित माना भी नहीं जा सकता था। वर और कन्यापक्ष का वह सौहार्द मध्ययुगीन समाज में भ्रष्ट हो गया। आधुनिक समाज में दहेज की वीभत्स प्रथा सुशील तथा सुशिक्षित कन्याओं की हत्या अथवा आत्महत्या का कारण बन गई है। सामाजिक प्रतिष्ठा का रंग चढऩे पर इस प्रथा का रूप अधिक बिगड़ गया है। निर्धन माता-पिता के लिए तो यह अभिशाप की तरह है। जहां स्त्री का आदर होता है वहां देवता निवास करते हैं। भारतीय संस्कृति का उक्त सूक्त वाक्य मिथ्या बना दिया गया है। अब भारतीय परिवार कन्या के जन्म से ही भय खाने लगे हैं। दहेज प्रथा की बुराइयां असंख्य हैं। बाल विवाह, अनमेल विवाह, वृद्ध विवाह आदि दूषणों की यह जड़ है। इस कुप्रथा ने समाज में अनाचार और वेश्यावृत्ति को जन्म दिया है। बहुत से लोग अपनी कन्याओं को उत्तम शिक्षा इसलिए नहीं दिलाते हैं कि पढ़ी-लिखी कन्या के लिए दहेज अधिक देना पड़ता है।

भारत में दहेज हत्या और दहेज के मामलों के खिलाफ सशक्त कानून मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि दहेज दोषियों को इन कानूनों की गिरफ्त मे लाया जाये। इन कानूनों को जो लोग अमल में लाते हैं पुलिस, प्रशासन व न्यायलय के कर्मचारी व अधिकारी, उन्हें दहेज समस्या और दहेज पीडि़तों के प्रति संवेदनशील बनाया जाये। अगर वे दहेज पीडि़त महिला की फरियाद को आम प्रकरण के रूप मे लेते हैं और काम-टालू तरीके से उस पर कार्यवाही करते हैं या कार्यवाही करते समय अपना हित सामने रखते हैं और पीडि़त महिला व समाज के हित की उपेक्षा करते हैं तो कानून निष्प्रभावी सिद्ध होगें ही। जिससे मुजरिम या तो बरी हो जायेगा या उसे कम से कम सजा मिलेगी। दूसरा कारण यह है कि भारत में न्यायपालिका पर काम का बोझ होने के कारण न्याय मिलने में सालों-साल लग जाते हैं। पीडि़ता का पूरा जीवन कानूनी लड़ाई लडऩे में बीत जाता है। इस दिशा में कानूनविदों और एक्टिविस्ट को ध्यान देने की जरूरत है। अकडेमिया में सुधार करते हुए बुनियादी शिक्षा इस तरह से दी जानी चाहिए जिससे बच्चा शुरूआत में ही समाज की इन रूढ़ीवादी प्रथाओं से मुक्त हो पाए।

देवेन्द्रराज सुथार

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