ब्रेकिंग न्यूज़ 

कोविड काल के पश्चात खाद्य प्रसंस्करण में सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यमों के लिए अवसर

कोविड काल के पश्चात खाद्य प्रसंस्करण में सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यमों के लिए अवसर

भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। यहां की जनसंख्या का 60प्रतिशत से भी ज्यादा भाग कृषि क्षेत्र में कार्यरत है। यह क्षेत्र भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 17प्रतिशत का योगदान करता है। यह आंकड़ा अपने आप में ही रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात के बीच के असंतुलन को उजागर करता है।

इस समस्यात्मक अनुपात के प्रबंधन के बारे में बात करने से पहले, इस क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों की बेहतर समझ बनाने के लिए मैं कुछ आंकड़े सामने लाना चाहूंगा।

केंद्रीय सरकार कृषि और कृषि संबद्ध अन्य क्षेत्रों को अनुदान के तौर पर अलग-अलग रूपों में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक मदद प्रदान कर रही है। साथ ही केंद्रीय सरकार द्वारा किसान ऋण के लिए 15 लाख करोड़ रुपए, कृषि और कृषि संबद्ध कार्यों के लिए अवसंरचना कोष के तौर पर 1.25 लाख करोड़ रुपए की रकम भी प्रदान की जा रही है। भारत लगभग 300 मिलियन टन का खाद्यान्न का उत्पादन करता है, जबकि यहां के खाद्यान्न भंडारण क्षमता केवल 85 मिलियन टन है। यहां लगभग 350 मिलियन टन जल्दी खराब होने वाले फलों और सब्जियों का उत्पादन होता है, जबकि इनके भंडारण की क्षमता 70 मिलियन टन से भी कम है। संगठित क्षेत्रों में केवल 7 से 10 प्रतिशत भोजन ही प्रसंस्कृत किया जाता है।

इन कमियों को दूर करने के लिए केंद्र सरकार कई योजनाएं लेकर आई है

  • क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी (पीएम एफएमई योजना) के जरिए सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों का उन्नयन
  • उद्यमिता विकास, विपणन, उद्योग आधार, जीएसटी पंजीकरण इत्यादि के माध्यम से क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण सहायता।
  • सामान्य अवसंरचना सहायता।
  • स्वयं सहायता समूहों।
  • बिक्री और निवेश पर विभिन्न प्रलोभन।
  • खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन से जुड़ा प्रोत्साहन योजनाकारि वैश्विक खाद्य उत्पादकों और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारतीय खाद्य उत्पादक ब्रांडों के निर्माण के समर्थन किया जा सके।
  • खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पर ध्यान केंद्रित करने वाली संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना।
  • खाद्य प्रसंस्करण में संबद्ध विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए कुशल कार्यबल के निर्माण के लिए कौशल विकास।
  • समूह आधारित मेगा फूड पार्क की अवधारणा के तहत पार्क में प्रदान किए गए इंडस्ट्रियल प्लाट में आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण यूनिट की स्थापना। जिसमें सुस्थापित आपूर्ति श्रृंखला की अवसंरचना सहित संग्रहण केन्द्र, प्राथमिक प्रसंस्करण क्षेत्र, कोल्ड चेन/शीत श्रृंखला आदि भी होंगे।

सरकार द्वारा इन सभी पहलों के बावजूद, यह बात साफ है कि इस क्षेत्र की पूर्ण क्षमता प्राप्त करने के लिए भारतीय कंपनियों को अपने प्रतिस्पर्धी गुणों की तुलना में उत्पादकता, उत्पादन के पैमानों, मूल्यवर्धन और वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ जुड़ाव के संबंध में अपने वैश्विक प्रतिरूप को सुधारने की आवश्यकता है।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि कोविड युग के बाद के बाजारों और उद्योगों का दृश्य काफी अलग दिखता है। बदलते परिदृश्य के साथ, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने वाली कार्य योजना की एक नई कूटनीति बनाने की आवश्यकता है।

सरकार द्वारा यह पहल इस क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए की गई है। फिर चाहे वह कौशल विकास की आवश्यकता हो या उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए बेहतर तकनीक का समावेश। यह वे क्षेत्र हैं जहां हमारे सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) ने हमेशा उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है – कुशल श्रमशक्ति और बेहतर उन्नत प्रौद्योगिकी। सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र के पास विनिर्माण और विपणन की ताकत है, जो कृषि क्षेत्र के लिए ठीक नहीं हैं।

एक विशिष्ट परिदृश्य ले लीजिए, जिसमें एक परिवार में 7-8 लोग हैं और सभी जमीन के एक टुकड़े पर खेती करने में लगे हैं। इस परिदृश्य में एक सीमित उत्पादन के लिए श्रम की लागत काफी ज्यादा है।

अब उसी परिवार का एक दूसरा परिदृश्य लें, जिसमें उन्नत तकनीकें भी शामिल हैं। अगर कृषि संबंधी कार्य उन्नत तकनीकों से किया जाए तो परिवार के केवल 1-2 लोग कृषि संबंधी कार्य करेंगे। और अन्य सदस्यों को जमीन के उसी टुकड़े से उत्पादित वस्तुओं का खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।

दूसरे परिदृश्य में मानव श्रम के रूप में निवेश की गई लागत कम हो जाती है। साथ ही खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय से हो रहे लाभ से, उसी जमीन के टुकड़े से होने वाले सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भी वृद्धि होती है।

इन दोनों क्षेत्रों का अभिसरण, करोड़ों लोगों को लाभ पहुंचा सकता है।

भारत का सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र वैश्विक महामारी कोविड के कारण परेशानी में है। इस क्षेत्र पर आधारित लगभग 11 करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएंगे। जिनमें से कुछ पिछले साल अपनी नौकरी गंवा चुके हैं और कुछ पर उसका प्रभाव इस साल पड़ेगा। सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र का प्रशिक्षित श्रमिक वर्ग बेरोजगारी से जूझ रहा है। यह लोग नौकरी के अवसर तलाश रहे हैं।

दूसरी ओर किसान अपनी एक अलग समस्या से जूझ रहे हैं, जहां उन्हें फसलों का सही दाम नहीं मिल रहा।

अब समय है सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) और कृषि क्षेत्रों को मिलाकर खाद्य संस्करण क्षेत्र को मजबूत बनाने का। इनके साथ काम करना देश के लिए लाभदायी होगा।

कृषि क्षेत्र में मूल्यवर्धन होगा, किसानों को उनके उत्पादन का सही दाम मिलेगा। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में प्रगति से उच्च गुणवत्ता और आर्थिक तौर पर साध्य/वाह्य उत्पादों का उत्पादन करने में मदद मिलेगी। सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) के कुशल श्रमिक-बल द्वारा विपणन, खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता आश्वासन अवसंरचना भी प्रदान की जाएगी।

इससे स्थानीय बाजारों में प्रसंस्कृत वस्तुओं की पहुंच को और इंसुलेटेड/प्रशीतलन की सुविधा वाले वाहन के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उच्च निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, जो की सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) की प्रमुख ताकतें हैं।

यह तीनों क्षेत्रों – खाद्य प्रसंस्करण, कृषि और सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) के बड़े सफलता अनुमानों के साथ एक अपार क्षमता है।

 

 


दीपक
जैन

(लेखक, महानिदेशक, भारतीय उद्योग परिसंघ हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published.