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गिलगित-बल्तीस्तान में पाकिस्तान की चुनावी चाल

गिलगित-बल्तीस्तान में पाकिस्तान की चुनावी चाल

जम्मू-कश्मीर प्रदेश का जो इलाका पाकिस्तान के कब्जे में है, उसमें से सबसे बड़ा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाका गिलगित-बल्तीस्तान का ही है। गिलगित तो पूरे का पूरा ही पाकिस्तान ने कब्जे में किया हुआ है। बल्तीस्तान की एक तहसील कारगिल को छोड़ कर बाकी सारा इलाका उसने दबा रखा है। यह क्षेत्र अफगानिस्तान, चीन और रुस की सीमा के साथ लगने के कारण सामरिक लिहाज से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के कब्जा किए गये हिस्से को दो भागों में बांट रखा है। एक हिस्से को वह आजाद कश्मीर कहता है, जिसमें जम्मू संभाग के पंजाबी बोलने वाले इलाके और पंजाबी बोलने वाला मुज्जफराबाद है। इस इलाके में मुसलमानों का पूर्ण बहुमत है। गिलगित-बल्तीस्तान को पाकिस्तान सरकार तथाकथित आजाद कश्मीर में शामिल नहीं करती।

गिलगित-बल्तीस्तान में शिया समाज का बहुमत है और बह पिछले कुछ अरसे से पाकिस्तान के मुसलमानों के निशाने पर है। शिया समाज के अनेक लोगों की हत्या आतंकवादी मुसलमानों द्वारा होती रहती है। गिलगित-बल्तीस्तान का नाम, कुछ साल पहले, पाकिस्तान सरकार ने उत्तरी क्षेत्र कर दिया था। लेकिन यहां के शिया समाज द्वारा इसका जबरदस्त विरोध करने के कारण, सरकार को एक बार फिर पुराना नाम ही बहाल करना पड़ा। पाकिस्तान के संविधान में देश के जिन इलाकों का नाम शामिल किया हुआ है, उसमें गिलगित-बल्तीस्तान शामिल नहीं है। पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय ने भी निर्णय किया है कि गिलगित और बल्तीस्तान पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है।

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान अपने देश के मुसलमानों को लाकर गिलगित-बल्तीस्तान में बसा रहा है। शिया समाज को खतरा है कि पाकिस्तान की इस साजिश के कारण, वे अपने इलाके में ही अल्पसंख्यक होकर रह जायेंगे। जिसके कारण शिया समाज और पाकिस्तानी मुसलमानों में झगड़े होते रहते हैं। लेकिन पाकिस्तान सरकार पर शिया समाज के इस विरोध का शायद कोई असर नहीं हुआ। पाकिस्तान ने निर्माण कार्य के नाम पर इस पूरे क्षेत्र में चीनी सेना को ही बुला लिया है। चीन ने पूर्वी तुर्किमेनिस्तान के कशागार से लेकर इस्लामाबाद को जोडऩे बाली सड़क बना ली है। यह सड़क गिलगित से होकर जाती है और कराकोरम मार्ग या सिल्क रूट रोड कहलाती है। अब अनेक स्थानों पर चीनी सैनिकों और यहां के स्थानीय शिया समाज से भी झगड़े होते रहते हैं।

सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन मिल कर हिन्दुतान की घेराबंदी कर रहे हैं, जिसके लिये हिन्दुस्तान के ही इलाके गिलगित-बल्तीस्तान का दुरुपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसके कारण इस पूरे इलाके में शिया समाज की पहचान और महत्व संकट में पड़ गया है। पाकिस्तान ने अब इसी गिलगित-बल्तीस्तान में 8 जून 2015 को स्थानीय विधानसभा के लिये चुनाव करवाए। इससे वहां के स्थानीय शिया समाज में गुस्से की लहर है। उसका कारण यह है कि पूरे चुनाव में स्थानीय लोगों या फिर उनकी समस्याओं का कोई स्थान नहीं है। चुनाव व्यावहारिक रुप से सेना की देखरेख में ही करवाये जा रहे हैं। दरअसल कानून कायदे से यहां का शिया समाज भारतीय नागरिक है। परन्तु पाकिस्तान ने यहां इतने पाकिस्तानी मुसलमान बसा दिये हैं कि अब अनेक स्थानों पर उन्हीं का बर्चस्व हो गया है। विधानसभा की जिन चौबीस सीटों का चुनाव हो रहा है, उनमें पाकिस्तानी नागरिकों के चुनें जाने की भी संभावना है। वैसे भी ये चुनाव कहने के लिए सिविल चुनाव कहे जाते हैं, अन्यथा इन का पूरा नियंत्रण पाकिस्तानी सेना का रहता है। सेना जैसा चुनाव परिणाम चाहेगी, परिणाम वैसा ही निकल आयेग। स्थानीय लोगों का इस चुनाव से इतना ही ताल्लुक़ है कि उसे इन चुनावों में, यदि वोट डालने का अवसर दिया जाये तो वह सेना के जवानों की देखरेख में मतदान केन्द्र पर जा सकते हैं। दूसरे, चुनाव करवाने का समय भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान भारतीय सीमा का लगातार उल्लंघन कर रहा है। इस समय जम्मू-कश्मीर के भीतर कुछ लोग पाकिस्तान के समर्थन में सभाएं आयोजित कर रहे हैं। चाहे इन सभाओं में आम जनता की भागीदारी सीमित ही होती है और गुप्तचर एजेंसियों का ऐसा भी मानना है कि कुछ लोग सभी सभाओं में जाकर संख्या बढ़ाने का काम कर रहे हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर की सीमा पर हो रही पाकिस्तानी सेना की गतिविधियां, प्रदेश के भीतर पाकिस्तान समर्थकों की गतिविधियां और मीडिया के एक हिस्से द्वारा इन दोनों को प्रसारित करने की संधियां, इन सभी को एक साथ देखने पर एक पूरी योजना को आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे समय में पाकिस्तान गिलगित-बल्तीस्तान में विधानसभा के चुनाव करवा रहा है। एक ऐसे इलाके में चुनाव करवाना जिसे पाकिस्तान का संविधान भी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता, निश्चय ही एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा कहा जा सकता है।

भारत सरकार ने पाकिस्तान के कदम का सख्त विरोध ही वहीं किया बल्कि, उसके राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुला कर अपना विरोध दर्ज करवाया। यह पहली बार है कि दिल्ली ने पाकिस्तान की गिलगित-बल्तीस्तान में असंवैधानिक गतिविधियों पर अपना विरोध दर्ज करवाया है। यह पहली बार है कि भारत सरकार ने गिलगित-बल्तीस्तान को लेकर अपनी चिन्ता जाहिर की है। अन्यथा आज तक यह क्षेत्र जम्मू कश्मीर का हिस्सा होने के बाबजूद भारत सरकार की सक्रिय कूटनीति का हिस्सा नहीं रहा। जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, जिन्होंने इस रियासत को भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधानों के तहत भारत की संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा बनाया था, 1947 में ही गिलगित-बल्तीस्तान को लेकर दिल्ली की इस निष्क्रिय नीति पर सख्त ऐतराज करते हुये उस समय के प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था। लेकिन शायद साउथ ब्लॉक गिलगित-बल्तीस्तान को लेकर सोया ही रहा। 2009 में जब पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को स्वायत्त क्षेत्र कहना शुरु कर दिया था, भारत सरकार को तभी विरोध करना चाहिये था। पाकिस्तान की यह चाल इस क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर से अलग दिखाने और मनवाने की थी। लेकिन, उस समय दिल्ली सोई रही दरअसल गिलगित-बल्तीस्तान को लेकर भारत सरकार की नीति 1947 से ही इसी प्रकार की ढुलमुल वाली रही है। 1947 में ब्रिटिश सरकार को आशा थी कि जम्मू कश्मीर रियासत को महाराजा हरि सिंह पाकिस्तान में शामिल करेंगे। इसके लिये स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लार्ड माऊंटबेटन ने उन पर काफी दबाव भी डाला। लेकिन, जब ब्रिटिश सरकार को लगा कि महाराजा जम्मू-कश्मीर रियासत को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनायेंगे बल्कि उसे हिन्दुस्तान की संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा ही रखेंगे, तो उसने रियासत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्से गिलगित को रियासत में से निकालने का षड्यंत्र रचा। गिलगित के राज्यपाल घनसारा सिंह को मेजर ब्राऊन की अध्यक्षता में गिलगित स्काऊटस के सिपाहियों ने नजरबन्द कर लिया। छावनी में ब्राउन ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया। तभी से गिलगित-बल्तीस्तान पाकिस्तान के कब्जे में है, लेकिन आश्चर्य की बात है कि भारत सरकार ने इस इलाके का प्रश्न कभी पाकिस्तान के साथ नहीं उठाया।

इतना ही नहीं एक अरसा पहले पाकिस्तान ने इसी इलाके का एक हिस्सा चीन के हवाले कर दिया। अब भारत में चीन-पाक लॉबी ने कहना शुरु कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर चीन भी स्टॉकहोल्डर है इसलिये उसे भी बातचीत में शामिल किया जाना चाहिये। चीन के सैनिकों को गिलगित में पाकिस्तान ने बुला ही रखा है। ऐसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान इस इलाके में चुनाव करवा कर विवाद को बढ़ाना चाहता है। दरअसल पाकिस्तान स्वयं भी अच्छी तरह जानता है कि इस क्षेत्र में ये चुनाव अंतर्राष्ट्रीय कानून के हिसाब से भी गलत है। जिस संयुक्त राष्ट्र संघ की पाकिस्तान बार-बार दुहाई देता रहता है, उसने भी साफ-साफ कहा है कि कानूनी रुप से पूरा जम्मू -कश्मीर प्रदेश भारत का हिस्सा है। लेकिन इस प्रदेश का जो हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है, उसमें इस्लामाबाद दो अलग- अलग संवैधानिक व्यवस्थाएं लाद रहा है।

भारत सरकार को इस बात की बधाई देनी होगी कि उसने गिलगित-बल्तीस्तान को भी गंभीरता से अपने सक्रिय एजेंडे में शामिल किया है। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि गिलगित-बल्तीस्तान को लेकर भारत की यह कूटनीति लम्बे समय तक चलनी चाहिए, तभी इसका लाभ होगा।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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