ब्रेकिंग न्यूज़ 

योग भारत की सांस्कृतिक पहचान

योग भारत की सांस्कृतिक पहचान

संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लेकर भारत के सांस्कृतिक महत्व को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की है। यह वर्तमान सरकार के लिए गर्व की बात है और इससे प्रत्येक भारतीय अपने को गौरवान्ति अनुभव कर रहा है।

भारतीय संस्कृति का लक्ष्य है – मनुष्य की अध्यात्मिक उन्नति अर्थात मोक्ष की प्राप्ति। भारत के ऋषियों ने शारीरिक-मानसिक तथा आत्मोन्नति के लिए ऐसे नियम बनाए थे जिससे मनुष्य को परमानन्द प्राप्त हो, अनन्त और अक्षय सुख की प्राप्ति हो, शाश्वत सुख की प्राप्ति हो और इसके लिए अपरिहार्य है – योग। संस्कार के द्वारा परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त साधन को योग कहा गया है। मानवीय जीवन में प्रभु से संबंध स्थापित करना धर्म है और जीवन को भगवत्ता से संयुक्त कर देना योग है। योग व्यावहारिक सजीव धर्म है, योग एवं धर्म का एक ही अर्थ है और वह है मानव का प्रभु से संबंध स्थापित करना। योगजीवन है और जीवन योग है क्योंकि अन्तरात्मा बिना जीवन संभव नहीं जो कार्य हम मन और इन्द्रियों के द्वारा करते हैं उसे अन्तरात्मा ही अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कारणों से सम्पादित करती है उस दिव्य अन्तरात्मा के साथ सामंजस्य स्थापित करना ही योग है। शरीर, मन और इन्द्रियों के साथ योग का आरंभ होता है, योग वह जीवन है जो सदा आनंदमय आत्मा के साथ जुड़ा रहता है। योग तपस्या से भी बढ़कर है, धर्म तथा दर्शन से भी बढ़ कर है। योग तत्वसंख्यान, सृष्टि विज्ञान, हेतुवाद, मनोविज्ञान आदि सब से परे है, इस तरह मानव अन्तरतम के साथ जुड़ जाता है। एक-न-एक दिन ससीम को असीम से, जड़ को चेतन से और मनुष्य को अपने अंदर ईश्वर का संधान करना पड़ेगा और यह सब योग के द्वारा ही संभव है। योग जीवन की प्रेक्टीकल फिलोसिफी आचार संहिता है चाहे वह अष्टांगयोग हो या षडांग योग या सांख्य योग हो। यम, नियम, संपन्न सदाचार आत्म संस्कार का सुगम उपाय है इसके द्वारा शरीर, मन, आत्मा की शुद्धि होती है फिर योग द्वारा चित्त को समाधि में स्थिर कर अपने अन्त:करण को शुद्ध कर मोक्षपद में रमण संभव हो जाता है। महर्षि गौतम का सूत्र है

तदर्थ यमनियमाम्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाघ्यात्म विघ्युपाये:।

(न्यायदर्शन 4/2/46)

चित्त के विनाश के लिए शास्त्रों में दो उपाय बताए गए है- एक योग तथा दूसरा ज्ञान। चित्तवृत्ति का निरोध योग है और परमात्मा का अपरोक्ष साक्षात्कार ज्ञान है। चित्त के विनाश के लिए अन्त:करण को बदलना पड़ेगा और उसके लिए अपरिहार्य है- योग। योग एक आत्मविद्या है जो विश्व में समन्वय स्थापित करता है। सभ्यता के प्रारंभ से ही आज तक योग के उपदेष्टा यथा हनुमानजी, वेद व्यास, श्रीकृष्णा, हिरण्यगर्भ, कपिल, गौतम, वशिष्ठ, दधिचि, पतंजलि, गोरखनाथ, आदि शंकराचार्य, रामानुज, माधव, वल्लभ, निम्बारक, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ तथा महर्षि अरविंद मानवता को एक करने के लिए मानवता का हित करने के लिए इस धरा धाम पर आते रहे हैं। वैदिक ऋषियों ने ये घोषणा की थी- ‘एक सद विप्रा बहुधा वदन्ति’ अर्थात् सत्य एक ही है यद्यपि मनीषी जन उसे अनेक रूपों में अनुभव करते है। योगी लोग मानवता का नेतृत्व करते हैं। वे उनके लिए नियम बनाते हैं उन्होंने हमारा मार्ग प्रशस्त किया है, इसमें सबसे अधिक योगदान महर्षि पतंजलि का है। उन्होंने चरकसंहिता का आरम्भ करके हमारे स्थूल शरीर के दोषों का निवारण किया और उसमें सांख्योक्त प्रक्रिया का वर्णन करके हमें योग की ओर आकर्षित किया। व्याकरण के सूत्रों के विशद विवेचन के द्वारा हमें पद-पदार्थ का ज्ञान करा कर हमारी वाणी को शुद्ध तथा परिमार्जित किया तथा योग के द्वारा संपूर्ण चित्ति मलों को धोकर हमें अद्वैत तत्वज्ञान का उपदेश दिया जो संपूर्ण जीवों की साधनाओं का लक्ष्य है। उनकी कृतज्ञता में किसी चिंतक ने निम्न श्लोक से उनका स्तवन किया-PAGE 16- 21_Page_1_Page_1_Page_2

योगेन चितस्यत पदेन वाचां

मूल शरीरस्य तु वैद्यकेन।

योड पाकरोत तं प्रवरं मुनीनां

पतंजलि प्रात्र्जलिरानतोडस्मि।।

(विज्ञान भिक्षुकृत योगवर्तिक)

आचार्य पतंजलि ने नि:श्रेयस की सिद्धि की जो साधना पुरस्कृत की वह योग शास्त्र के रूप में हमें उपलब्ध है। उन्होंने हिरण्यगर्भ से परंपमरा प्राप्त योग के आठ मुख्य अंग निर्दिष्ट किए जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है – यथा

अहिंसा सत्यासत्ये ब्रह्मचर्यपरिग्रहा

यमा: शौच सन्तोषतप: स्वाध्येश्वर प्राणिधानानि नियमा:।

  • यम:- अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह (संग्रह का अभाव) ये पांच यम हैं।
  • नियम:- शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर शरणागति ये पांच नियम हैं।
  • आसन:- आसन चौरासी लाख हैं। जिनमें चौरासी आसन प्रसिद्ध हैं। जैसे – पद्मासन, सिद्धासन, भद्रसान, शीर्षासान, स्वास्तिकासन, शवासन, भुजंगासन।
  • प्राणायाम:- आसन सिद्ध हो जाने के बाद श्वास और प्रश्वास गति का रुक जाना प्राणायाम है। तात्पर्य यह है कि प्राणवायु का शरीर में प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है, इन दोनों की गति का रुक जाना, प्राणवायु गमनागमन रूपक्रिया का बंद हो जाना प्राणायाम है। प्राणायाम तीन प्रकार के हैं – रेचक, पूरक तथा कुम्भक जिनका वर्णन महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में इस प्रकार किया है:- तस्मिुन सति श्वास प्रश्वास योर्गतिविच्छेद: प्राणायाम (योगसाधन-49)

उक्त प्राणायाम बाह्यवृत्ति आभ्यान्तर वृत्ति तथा स्तम्भवृत्ति – ऐसे तीन प्रकार से होता है वह देश काल संख्या द्वारा देखा जाता है। जो हल्का तथा लम्बा होता जाता है।

PAGE 16- 21_Page_2

बाह्याभ्यान्ततरस्तम्भवृत्ति देशकाल संख्यामि: परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्म     (योगसाधन-50)

प्राणवायु शरीर से बाहर निकल कर बाहर ही जितने काल तक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना तथा साथ ही इस बात की भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहां ठहरा कितने समय तक ठहरा और उतने समय में स्वाभाविक प्राण की गति की संख्या कितनी होती है यह बाह्यवृत्ति प्राणायाम है इसे रेचक भी कहते हैं, क्योंकि इसमें रेचकपूर्वक प्राणायाम को रोका जाता है, अभ्यास करते-करते वह बहुत काल तक रुके रहने वाला और सूक्ष्म अनायास साध्य हो जाता है।

प्राणवायु को भीतर ले जा कर भीतर ही भीतर जितने काल तक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रखना तथा साथ-साथ यह देखते रहना कि आभ्यान्तर देश में कहां तक जाकर प्राण रुकते हैं वहां कितने काल तक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समय में प्राणवायु की स्वाभाविक गति की संख्या कितनी होती है -यह आभयान्तर वृत्ति प्राणायाम है। इस प्राणायाम को पूरक प्राणायाम भी कहते हैं क्योंकि इसमें शरीर के अन्दर ले जा कर प्राण को रोका जाता है, अभ्यास बल से यह भी दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है।

PAGE 16- 21_Page_1_Page_2

शरीर के भीतर और बाहर निकलने वाली प्राणों की जो स्वाभाविक गति है उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर लाने का अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभाव से बाहर निकला हो या भीतर गया हो जहां भी हो उसकी गति को स्तंभित कर देना और यह देखते रहना कि प्राण किस देश में रुके हैं कितने समय तक रुके रहते हैं इस समय में स्वाभाविक गति की संख्या कितनी होती है यह स्तंभवृत्ति प्राणायाम है। इसे कुम्भक प्राणायाम भी कहते हैं, अभ्यास बल से यह भी दीर्घ एवं सूक्ष्म होता रहता है।

  • प्रत्याहार:- शब्द, रूप, रस, गंध तथा स्पर्श – इन पांच विषयों से मन का वापस लौटना प्रत्याहार कहलाता है।
  • धारणा:- बहिरर्गत से अंतर्मुख में स्थिर हो जाना धारणा कहलाता है। योग मन को निर्मल एवं बुद्धि को कुशाग्र कर सकने का सामथ्र्य रखता है वह प्रतिमा को प्रदिप्त कर देता है और सुप्त शक्तियों को जागृत कर देता है जिससे योगी आत्मचेतना में भौतिक शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है। योगी अन्तर्जगत में स्वकराजय
  • तथा बहिर्जगत में साम्राज्य स्थापित कर सकता है। अन्तर्यामी परमात्मा के साथ योग युक्त होकर सभी पवित्रता, शांति, आनन्द का जीवन व्यतीत कर सकता है।
  • ध्यान:- ध्यान से उस परमात्मा का चिन्तन किया जाता है जो सम्पूंर्ण जगत के कत्र्ता, सबको अपने-अपने संकल्प के अनुसार समस्त पदार्थ प्रदान करने वाले सभी प्राणियों के अन्त:करण में स्थ्ति हैं। अनयास प्राप्त होने योग्य शान्तिमय, अविनाशी अमृतस्वरूप एकमात्र परमपिता परमात्मा का चिन्तन किया जाता है जो यह हृदयप्रदेश में स्थित शुद्ध सच्चिदानन्द, परमात्मा का निरन्तर अनुभव है वही ध्यान कहलाता है। विषयों से जो दृढ वैराग्य है वही ध्यान कहलाता है। परमात्मा के लिए शुद्ध ज्ञानरूप ध्यान ही उसके लिए अघ्र्य पाद्य पुष्प और उसको सबसे प्रिय उपहार है। ध्यान पवित्र करने वालों को भी पवित्र करने वाला तथा सम्पूर्ण अज्ञान का नाशक है। यही उत्तम कर्म है यही परम योग है। इसके सिवा ध्यान का एक दूसरा रूप यह भी है, कि मैं जीवात्मा ही परिछेच्द शून्य आकार वाला अनंतस्वरूप सम्पूर्ण पदार्थों से परिपूर्ण हूं- इस प्रकार स्वच्छ भावना से परिपूर्ण यह जीवात्मा परमात्मा बन जाती है। वह परमात्मा हो प्राप्त पुरुष सबमें सम रहता है उसका ज्ञान भी उसके प्रति सम होता है उसका भाव भी सम होता है। वह शरीरान्त तक अखण्ड तत्वज्ञान से युक्त होता हुआ चिरकाल तक निरन्तर परमात्मा का ध्यान रूप पूजन करता रहता है।
  • समाधि- ध्याता का ध्यान में तथा दोनों का ध्येय में लय हो जाना समाधि कहलाता है विषयों से जो विरक्ति है वही समाधि कहलाती है। भोगों से वैराग्य का अंकुरित होने पर परम उत्पत्ति होना ध्यान कहलाता है और दृढ़ होने पर उसी को समाधि कहा जाता है। जो द्रव्य प्रपंच के स्वाद से मुक्त हो गया और जिसे यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति हो गई जिसे भोग अच्छे नहीं लगते वह ऋषि समाधिस्थ कहा जाता है। जिसने उसका संपादन कर लिया वह निश्चय ही मनुष्य रूप में परमब्रह्म है जिसकी विषयों से विरक्ति इतनी सुदृढ़ हो गई नि:सन्देह उसके ध्यान को उसकी समाधि को इन्द्र सहित देवता भी भंग नहीं कर सकते महर्षि च्यवन की समाधि सर्वविदित है जिसके समाधिस्थ सारे शरीर में दीमक लग गई थी। जब यह मनोमृग जन्मान्तवराजिक पुण्य से कभी समाधि साधन से युक्त होकर समाधिस्थ हो जाता है तब वह वैसे ही विश्रामसुख का अनुभव करता है जैसे रात के अंधकार और शीत से पीडि़त प्राणी को सूर्योदय होने पर आनंद प्राप्त होता है।

PAGE 16- 21_Page_1_Page_1_Page_1_Page_3

इस प्रकार भारत के मनीषियों अर्वाचीन योगियों ने मानवता को दिव्य चेतना में समष्टिथ सत्ता की पवित्रता एकता एवं दिव्यता की ओर अग्रसर किया है। जो योग के इन आठो अंगों की साधना करता है वह योगी प्रथम सोपान से अंतिम सोपान को पार कर परमानंदरत हो कर ब्रह्मलीन हो जाते है। यम नियमों का दृढ़तापूर्वक अनुसरण एवं अनुगमन सदाचार विशुद्ध एवं दृढ़ नींव है। अहिंसा से अपरिग्रह तक तथा शौच से ईश्वरप्राणिधन तक पहुंचाने की शक्ति योग में है इन अष्टांग योग से समाधि सिद्धावस्था प्राप्त होती है। पूरक अभ्यास से शरीर को कुण्डिलिनी इस प्रकार उठा ले जाती है जिस प्रकार वन में जलगत घास मनुष्य को जल के ऊपर उठा ले जाती है। यही योगियों का आकाशगमन है। (हनुमान जी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है) इसका वर्णन योगदर्शन में इस प्रकार आया है:-

कायाकाशयो: संबंधहसंयमाल् लाधुतलसमापतश्चाआकागमनम’

                (योगविभूति 42)

अर्थात शरीर और आकाश के संबंध में संयम करने से अथवा हल्की वस्तु में संयम करने से आकाश में चलने की शक्ति आ जाती है। योग दर्शन में बतलाया गया है:- ‘मूर्धज्योतिषि सिद्ध दर्शनम्’ (योगविभूति) अर्थात सिर के कपाल में एक छिद्र होता है इसी को ब्रह्मरंध्र कहते हैं वहां जो प्रकाशमयी ज्योति है उसके संयम करने वाले को पृथ्वी और स्वर्ग के बीच में विचरण करने वाले सिद्धों के दर्शन होते है और वह हजारों योजन दूर तक की वस्तुओं को देख सकता है। रेचक प्राणायाम के अभ्यास से अपने प्राण को चिरकाल तक स्थिर रखने पर योगी अन्य शरीर में प्रवेश कर सकता है जिस तरह वायु पुष्पों से गंध खींच कर उसका घ्राणेंद्रियों के साथ संबंध स्थापित कर देती है उसकी तरह योगी रेचक अभ्यासरूप योग से कुण्डिलिनी रूप घर से बाहर निकल कर ज्यों ही दूसरें शरीर में जीव का संबंध करता है त्यों ही वह शरीर परित्यक्त हो जाता है। जीव रहित यह शरीर चेष्टाओं से रहित हो कर काठ और मिट्टी के ढेले के सदृश पड़ा रहता है जैसे पुरूष जलपूर्ण कुंभ से वृक्ष और लता सींचने की इच्छा रखता है उसे ही सींचता है वैसे ही अपनी रूचि के अनुसार दूसरे शरीर में प्रविष्ट हो कर स्थिर रहता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आदि शंकराचार्य का है, जब शंकराचार्य और मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ हुआ और मंडन मिश्र की पराजय होने लगी तब मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया और भारती ने शंकराचार्य से ऐसे प्रश्न किए जो यौन संबंधों से जुड़े हुए थे शंकराचार्य जी अखण्ड ब्रह्मचारी होने के कारण उन प्रश्नों का उत्तर न दे पाए तब उन्होंने भारती से प्रश्नों का उत्तर देने के लिए छ: मास का समय मांगा। तब शंकराचार्य ने अपने शरीर को छोड़ कर किसी मृत राजा के शरीर में परकाया प्रवेश कर उन संबंधों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया और छ: मास बाद पुन: अपने शरीर में प्रवेश कर भारती के उन प्रश्नों का उत्तर दिया। वर्तमान काल में आज से सौ वर्ष पूर्व स्वामी रामतीर्थ जी नदी के जल पर ऐसे चलते थे जैसे वे जल में नहीं जमीन पर चल रहे हैं। ऐसे अनेक महान योगी हमारे देश में हो चुके हैं।

PAGE 16- 21_Page_1_Page_1_Page_1_Page_2_Page_3

संसार सागर से पार उतरने के साधन का नाम योग है। चित्त को शांत करने के दो उपाय है- ज्ञान तथा योग, एक परमात्मा का यथार्थ ज्ञान है जो संसार में प्रसिद्ध है दूसरा प्राण निरोध है जिसे योग कहते हैं। ये दोनों एक फल देने वाले हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि किसी के लिए योग का साधन असाध्य है तो किसी के लिए परमात्मा विष्यक ज्ञान असाध्य है। ज्ञान तथा योग दोनों ही शास्त्रोक्त हैं। योग के द्वारा जाति, देश तथा धर्म के सभी विचार संकीर्ण हो जाते हैं और योग के द्वारा ही हम सब इस नील गगन के नीचे एक विश्व में उस मानवता को देखेंगे जो समस्त जीवों के हृदयरूप अलौकिक परमपिता परमेश्वर को मानने वाली होगी। इसी से समस्त विश्व का कल्याण होगा। यही हमारी संस्कृति का मूल आधार है और यही भारतीय संस्कृति की पहचान है।

 

श्रीकृष्ण मुदगिल

ооо полигон работаполигон отзывы

Leave a Reply

Your email address will not be published.