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आत्मिक शांति से प्रशस्त प्रगतिपथ

आत्मिक शांति से प्रशस्त प्रगतिपथ

एक बार रास्ते में जाते हुए एक गुब्बारे बेचने वाला व्यक्ति मेरी नजर में आया। उस व्यक्ति की उम्र 70-80 साल की होगी। इतने बुजुर्ग व्यक्ति को घूम-घूम कर गुब्बारे बेचते हुए देखकर मेरा मन विचलित हो गया। उसको कुछ सहायता करने की इच्छा से मैं उसके पास पहुंची और कुछ गुब्बारे खरीदने लगी। मेरे साथ मेरा 2 साल का बेटा भी था। वृद्ध ने चार गुब्बारे मुझे पकड़ा कर एक गुब्बारा मेरे बेटे के हाथ में पकड़ा दिया और बोला, ‘यह तेरे बेटे के लिए मेरी तरफ से भेंट है।’ मैं कुछ क्षण के लिए स्तब्ध हो गई। उसको आगे सहायता करने से भय महसूस करने लगी। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उस व्यक्ति की कैसे सहायता करूं। क्योंकि उसके पास तो वह बहुमूल्य चीज थी जो किसी को कोशिश करने से भी नहीं मिलती। जो आत्म-संतुष्टि उस व्यक्ति के पास थी, वो तो धनी और ज्ञानी व्यक्ति के पास भी नहीं मिलती। तब दिमाग में एक बात कौंधी कि आत्म-संतुष्टि हमारी खुद की एक मानसिक अवस्था है। उसे पाने के लिए हमें मूल्य नहीं चुकाना पड़ता।

हमारा जीवन बड़ा विचित्र है। हम धन अर्जन करते हैं केवल हमारी सुख-शान्ति के लिए, लेकिन उसी धन का मोह मनुष्य को अंधा बना देता है। विषय-वासना में डुबा रहता है, हमेशा विचलित रहता है। व्यक्ति एक बार चाहत के दल-दल में फंस जाए तो धीरे-धीरे खुद सम्पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। आशावादी होना तथा उच्च आकांक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन खुद के अस्तित्व को बचाकर रखने के बाद जो भी कार्य किया जाए वो सफल होता है।

इस ब्रह्मांड में हमारे चारों तरफ बहुत सारी चीजें हमें घेरे हुए है। उन सबको अपनी तरफ लाने का सोचना भी विचित्र है। हमारी पाने की लालसा कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि हमारे पास मौजूद बहुमूल्य वस्तुओं का हम उपयोग नहीं कर पाते। बहुत ज्यादा खुशी पाने की चाह में हम छोटी-छोटी खुशियों को भी समेट नहीं पाते हैं।

किसी व्यक्ति का भगवान के प्रति प्रमाद, विश्वास अथवा ईश्वर के प्रति निरंतर प्रेम उसे आत्म-संतोष प्रदान करता है। दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो जो व्यक्ति हमेशा सन्तुष्ट रहता है उस व्यक्ति को स्वयं भगवान प्रेम करते हैं।

संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय:।
मय्यर्पितमनोबुध्दिर्यो मध्दक्त: स मे प्रिय:।।

गीता में 12वें अध्याय के इस श्लोक में श्री कृष्ण ने कहा है कि जो इंसान हमेशा सन्तुष्ट रहता है वो इंसान सदैव भगवान का प्रिय रहता है।

असंतुष्ट मन व्यक्ति के लिए संसार में कोई भी परिस्थति अनुकूल नहीं मिलती। जब तक हमारे मन में असंतोष रहेगा, हम अपने भीतर या बाहर कहीं भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। उससे न केवल हमारी मानसिक शक्ति क्षीण होती है, बल्कि हमारा शारीरिक बल भी नष्ट होता है।

 उपाली अपराजिता रथ

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