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संसद में असंसदीय व्यवधान

संसद में असंसदीय व्यवधान

भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है की वर्तमान का विपक्ष केवल सरकार की आलोचना, निंदा और उसे बदनाम करके सत्ता हासिल करना चाहता है, जमीन पर संघर्ष उसे रास नहीं आता है। मुद्दाहीन और उद्देश्यहीन विपक्ष एक ही फॉर्मूले पर काम कर रहा है, और वो फार्मूला है मोदी सरकार को हर तरीके से हर मोर्चे पर बदनाम करो। इसी सन्दर्भ में संसद के मानसून सत्र में विपक्ष की भूमिका का उल्लेख महत्वपूर्ण है। पिछले लगभग दो सप्ताह से दोनों सदनों का काम-काज ठप्प है। दोनों सदन अनवरत शोर-शराबे के बाद रोज ही स्थगित हो जाते हैं। संसद चलाने का एक दिन का खर्च 44 करोड़ रु. होता है। लगभग 500 करोड़ रु. पर तो पानी फिर चुका है। ये पैसा उन लोगों से वसूला जाता है जो दिन-रात अपना खून-पसीना एक करके कमाते हैं और सरकार का टैक्स भरते हैं। ऐसा लगता है कि संसद का सत्र चलाने की परवाह विपक्ष को बिल्कुल नहीं है। वह अपनी जिद पर अड़ा हैं। यह शायद अड़ता नहीं लेकिन पेगासस जासूसी का मामला अचानक ऐसा उभरा कि विपक्ष सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया और संसद की कार्यवाही ठप्प कर दी। किन्तु प्रश्न उठता है की वे संसद का सत्र बाकायदा चलने क्यों नहीं देते? वे प्रश्न पूछ सकते हैं, स्थगन-प्रस्ताव और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ला सकते हैं। वे बीच में हस्तक्षेप भी कर सकते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है की हमारी संसद के दोनों सदन पहले दिन ही स्थगित हो गए। जो नए मंत्री बने थे, प्रधानमंत्री उनका परिचय भी नहीं करवा सके। विपक्षी सदस्यों ने सरकारी जासूसी का मामला जोरों से उठा दिया। सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया है। नए सूचना मंत्री ने संसद को बताया कि किसी भी व्यक्ति की गुप्त निगरानी करने के बारे में कानून-कायदे बने हुए हैं। सरकार उनका सदा पालन करती है। पेगासस संबंधी आरोप निराधार हैं। यहां असली सवाल यह है कि इस सरकारी जासूसी को सिद्ध करने के लिए क्या विपक्ष ठोस प्रमाण जुटा पाएगा?
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण जिस तरह हंगामे, शोर-शराबे और व्यर्थ के व्यवधान की भेंट चढ़ गया उससे धन और समय की तो बर्बादी हुई ही, राजनीतिक दलों पर लोगों का भरोसा भी घटा। ऐसा होना एक तरह से भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजना है। इससे अधिक चिंताजनक और कुछ नहीं हो सकता कि बजट सत्र में नाम मात्र का विधायी कामकाज हो सका और अनेक महत्वपूर्ण विधेयक लंबित रह गए। यदि संसद में बुनियादी काम ही नहीं होंगे तो फिर यह तय है कि वही देश भारतीय लोकतंत्र का उपहास उड़ाएंगे जो उसकी मिसाल देते हैं। इसके साथ ही देश की जनता भी संसद के रवैये पर निराशा प्रकट करेगी। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि जब आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव पेगासस जासूसी मामले पर राज्यसभा में अपना बयान पढ़ रहे थे, तो टीएमसी सांसदों ने उनके कागज फाड़ दिए और उन्हें हवा में उछाल दिया, जिससे राज्यसभा में एक अजीब सी स्थिति बन गयी। एक विडंबना यह भी रही कि संसद में जिन भी मसलों पर हंगामा किया गया उन्हें लेकर विपक्ष द्वारा चर्चा करने से जानबूझकर बचा गया। अगर चर्चा हुई होती तो पक्ष-विपक्ष की राय के जरिये आम जनता इन मसलों की तह तक जा सकती थी। आज जब इसकी आवश्यकता कहीं अधिक है कि संसद अपने हिस्से का काम सही तरह करे तब यह देखना दयनीय है कि राजनीतिक दल संसद को बाधित करने पर आमादा हैं। यह सही है कि यह जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है कि संसद सही तरह चले, लेकिन विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह संसद चलने में अपना सहयोग प्रदान करें। किन्तु वह ठीक इसके उलट काम कर रहा है, जो अशोभनीय है।

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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