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जनसंख्या : डिविडेंड या अभिशाप

जनसंख्या : डिविडेंड या अभिशाप

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का मसौदा तैयार कर दिया है। विश्व जनसंख्या दिवस पर आए इस ड्राफ्ट बिल पर देश में तरह-तरह की बहस छिड़ी हुई है। इनमें बढ़ती जनसंख्या के दुष्प्रभावों, जनसंख्या को नियंत्रित करने के नकारात्मक असर, जनसंख्या नियंत्रण के लिहाज से कानून की उपयोगिता और इस पर राष्ट्रीय कानून की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल हैं। अब जैसा की इस देश में ट्रेंड चल रहा है की भाजपा नित कोई भी सरकार किसी भी तरह का कानून पारित करे उसका विरोध होना जरुरी है, ठीक उसी तर्ज पर इस मसौदे का भी विरोध शुरू हो चूका है। गौर करने वाली बात यहां यह है की इस मसौदे या कानून को लेकर जहां सत्ताधारी राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में फूट है तो दूसरी तरफ इसे विपक्षी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के घटक दल का साथ मिल रहा है।

जहां एक तरफ बिहार में भाजपा के साथ सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है की सिर्फ कानून बना देने से जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं हो सकता है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो किया, वो उसका अधिकार है, लेकिन उन्हें लगता है कि सिर्फ कानून बनने से किसी को बच्चे पैदा करने से नहीं रोका जा सकेगा। नीतीश ने कहा कि इसके लिए महिलाओं का शैक्षिक स्तर और जागरुकता बढ़ाने की कोशिश करनी पड़ेगी। हालांकि, नीतीश सरकार के ही पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ने उलट बयान देते हुए कहा कि बिहार में दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को पंचायत चुनाव लडऩे से रोकने के लिए कानून बनाया जाएगा।

वहीं दूसरी तरफ यूपीए की मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार के घटक दल राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया शरद पवार ने जनसंख्या नीति का खुला समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था, बेहतर रहन-सहन और पर्यावरण संतुलन के लिए जनसंख्या नियंत्रण बिल्कुल जरूरी है। पवार ने बयान जारी कर कहा कि विश्व जनसंख्या दिवस के मौके पर देश के प्रत्येक नागरिक को यह शपथ लेनी चाहिए कि वह जनसंख्या नियंत्रण में अपना योगदान देगा। बेहतर देश और बेहतर जनजीवन के लिए यह बहुत ही जरूरी है।

इस मुद्दे पर तमाम बहस-मुबाहिसों के बीच यूपी जैसा कानून ही राष्ट्रीय स्तर पर लाने की मांग भी उठ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विचारक और बीजेपी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा के अलावा ऊपरी सदन के ही सांसद डॉ. अनिल अग्रवाल और हरनाथ सिंह आगामी ससंद सत्र में जनसंख्या नियंत्रण पर प्राइवेट बिल पेश करने जा रहे हैं। उधर, बीजेपी से ही लोकसभा सांसद रवि किशन ने भी सदन में निजी विधेयक पेश करने की बात कही है। सिन्हा ने बताया कि उनके प्राइवेट बिल पर राज्यसभा में 6 अगस्त को चर्चा होगी। वर्ष 2016 में भी बीजेपी सांसद प्रह्लाद सिंह पटेल ने प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था। उस पर चर्चा तो हुई थी, लेकिन वो मतदान के चरण तक नहीं पहुंच सका था। इस तरह, देश की आजादी के बाद से ऐसे 35 बिल संसद में पेश किए जा चुके हैं। इनमें 15 प्राइवेट मेंबर बिल कांग्रेस के सांसदों की ओर से पेश किए गए हैं।

जुलाई महीने की 11 तारीख को वल्र्ड पॉपुलेशन डे मनाया जाता है। हिंदी में विश्व जनसंख्या दिवस। इस दिन का महत्व हर देश के लिए अलग-अलग है। जैसे जनसंख्या का मतलब हर देश के लिए अलग है। इस साल जनसंख्या दिवस के दो दिन पहले यानि की 9 जुलाई को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन लिलिया नाम की महिला से मिले। इस महिला को ऑर्डर ऑफ पैरेंटल ग्लोरी के अवॉर्ड से नवाजा गया है। इसके हाथ में नौवां बच्चा था। रूस की सरकार घटती जनसंख्या से परेशान थी तो लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने को उत्साहित करने के लिए 2008 में ये अवॉर्ड शुरू किया था। हमारे देश की समस्या इससे उलट है। यहां जनसंख्या जितनी तेजी से बढ़ रही है उतनी तेजी से धान की फसल नहीं बढ़ती। वैसे तो भारत के लोग बहुत आलसी होते हैं लेकिन बच्चे पैदा करने में इतने कर्मठ हो जाते हैं कि जैसे उसमें एनर्जी ही नहीं लगती। सरकार ने सिफ्सा योजना चलाई, फ्री में गर्भ निरोधक गोलियां और कॉन्डम बंटवाए। लेकिन एक तरफ सरकार है तो दूसरी तरफ दादी। दादी का एक पोते से मन ही नहीं भरता है। कोई दादी के लिए तो कोई अल्लाह के लिए लाइन लगाए पड़ा है।

साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रोस्पेक्ट्स 2019 : हाइलाइट्स (The World Population Prospects 2019 : Highlights) नामक एक रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार वर्ष 2027 तक चीन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत की कुल आबादी 1.64 बिलियन के आंकड़े को पार कर जाएगी। तब तक वैश्विक जनसंख्या में 2 बिलियन लोग और जुड़ जाएंगे और यह वर्ष 2019 के 7.7 बिलियन से बढ़कर 9.7 बिलियन हो जाएगी।

रिपोर्ट में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि इस अवधि में भारत में युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद होगी, लेकिन आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों के अभाव में इतनी बड़ी आबादी की आधारभूत आवश्यकताओं जैसे- भोजन, आश्रय, चिकित्सा और शिक्षा को पूरा करना भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती होगी। उच्च प्रजनन दर, बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और बढ़ते प्रवासन को जनसंख्या वृद्धि के कुछ प्रमुख कारणों के रूप में बताया गया है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (United Nations Population Fund) द्वारा जारी इंडिया एजिंग रिपोर्ट (India Ageing Report) 2017 के अनुसार, एक ओर जहां वर्ष 2015 में भारत की कुल आबादी का 8 प्रतिशत हिस्सा 60 वर्ष की उम्र से अधिक का था, वहीं वर्ष 2050 में यह संख्या 19 प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है। बढ़ती जनसंख्या और वृद्ध आश्रितों की अधिक संख्या भारत के समक्ष दोहरी चुनौती के रूप में सामने आएगी और जिसके कारण सभी की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करना भारत के लिये और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

कुछ लोग, यहां तक की अपने प्रधानमंत्री भी इस बढ़ती जनसंख्या को ‘पापुलेशन डिविडेंड’ के रूप में देखते हैं। यहां पापुलेशन डिविडेंड या फिर डेमोग्राफिक डिविडेंड या फिर जनसांख्यिकी लाभांश क्या है, पहले यह जानना जरुरी है। इसको इस तरह समझा जा सकता की जब कोई विकासशील देश जब अपनी शिशु मृत्यु दर को नीचे ला देता है तब वहां जनसंख्या विस्फोट जैसी स्थिति बनती है। इसमें जीविका के लिए कमाऊ व्यक्तियों पर निर्भर लोगों का अनुपात बढ़ जाता है। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से इसका प्रभाव नकारात्मक होता है। लेकिन इसके ठीक बाद वाले दौर में, यानी बेबी बूमर पीढ़ी के कामकाजी स्थिति में पहुंचने पर जन्म दर तेजी से नीचे जाती है। ऐसे में कामगारों का अनुपात बढऩे लगता है और उन पर निर्भर लोगों की संख्या कम होती जाती है। कई देशों में कामगारों और उनपर निर्भर लोगों का अनुपात 40:60 से सीधे 60:40 होते देखा गया है, जिसके चलते वहां की प्रति व्यक्ति आय में अचानक उछाल आ जाता है। यह डेमोग्राफिक डिविडेंड साठ दशक के बाद पूर्वी एशिया के चमत्कारिक अर्थतंत्रों की प्रति व्यक्ति आय में आए 2 फीसदी उछाल के रूप में देखने को मिला था और निकट भविष्य में भारत भी ऐसी ही किसी चीज की उम्मीद करता नजर आ रहा है। भारत में युवाओं की एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो अकुशल, बेरोजगार सेवाओं और सुविधाओं पर भार जैसा है तथा अर्थव्यवस्था में उनका योगदान न्यूनतम है। किसी भी देश के लिये उसकी युवा जनसंख्या जनसांख्यिकीय लाभांश होती है, यदि वह कुशल, रोजगारयुक्त और अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाली हो।

लेकिन भारत में जनसंख्या समान रूप से नहीं बढ़ रही है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के अनुसार, संपत्ति तथा धन के आधार पर कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में विभिन्नता देखने को मिलती है। यह सबसे निर्धन समूह में 3.2 बच्चे प्रति महिला, मध्य समूह में 2.5 बच्चे प्रति महिला तथा उच्च समूह में 1.5 बच्चे प्रति महिला है। इससे पता चलता है कि समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में जनसंख्या वृद्धि अधिक देखने को मिलती है। जनसंख्या वृद्धि की वजह से गरीबी, भूख और कुपोषण की समस्या को प्रभावी ढंग से दूर करने और बेहतर स्वास्थ्य एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में बाधा आती है। इससे सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (स्ष्ठत्र) संख्या 1, 2, 3 और 4 प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

जनसंख्या वृद्धि के अपने फायदे और नुक्सान तो है हीं लेकिन उससे बड़ा मुद्दा है उसपर होने वाली राजनीति। जहां एक तरफ पिछले महीने ही मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति (वीसी) फिरोज बख्त अहमद ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईल दाखिल करके जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रभावी, नियम, विधान और दिशानिर्देश तैयार की मांग की थी। बख्त देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के बड़े भाई के पड़पोते हैं। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि जनसंख्या विस्फोट के कारण देश को कई संकटों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि सरकारी रिकॉर्ड में बताई जनसंख्या से हकीकत की आबादी से बहुत कम है।

दूसरी तरफ अश्विनी उपाध्याय जनसंख्या नियंत्रण पर वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में भी प्रजेंटेशन दे चुके हैं। उन्होंने इसी महीने की 11 तारीख को विश्व जनसंख्या दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून का महत्व बताया है। उपाध्याय ने चिट्ठी में पीएम से कहा कि जनसंख्या विस्फोट की समस्या यूपी और असम तक सीमित नहीं है बल्कि यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या है। उन्होंने इस पर मसौदा विधेयक भी तैयार कर रखा है जिसे सुब्रमण्यन स्वामी समेत बीजेपी के तीन सांसद संभवत: संसद में प्राइवेट बिल के तौर पर पेश करेंगे।

इसी तरह 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लाल किले से अपने भाषण में जनसंख्या नियंत्रण का जिक्र कर चुके हैं। पीएम ने देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताते हुए कहा था कि अनियंत्रित जनसंख्या से आने वाली पीढिय़ों के सामने नई चुनौतियां पेश होंगी। उन्होंने इससे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कदम उठाने की जरूरत बताई थी। उन्होंने उन परिवारों को सम्मान का हकदार बताया था जिनके कम बच्चे हैं। मोदी यही नहीं रुके और छोटा परिवार रखने को एक प्रकार की देशभक्ति बता दी।

इसी तरह वर्ष 2018 में देश के राष्ट्रपति से भी जनसंख्या नियंत्रण पर नीति लाने की गुहार लगाई गई थी। तब करीब 125 सांसदों ने देश में दो बच्चों की नीति लागू करने का आग्रह राष्ट्रपति से किया था। यूपी के मुख्यमंत्री और गोरखपुर से तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने 2015 में इस मुद्दे पर एक ऑनलाइन सर्वे कराया था। उस ऑनलाइन पोल में आम नागिरकों से राय मांगी गई थी कि क्या केंद्र की मोदी सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई नीति बनानी चाहिए।

जनसंख्या नियंत्रण पर एक बिल की दरकार है। कमाल की बात ये है कि इस कानून की मांग करने वाले लोग तो लंबे समय से दिख रहे हैं लेकिन इसका सीधा विरोध करने वाला कोई नहीं दिख रहा। फिर कानून बनने में समस्या कहां आ रही है समझ में नहीं आ रहा। डिबेट्स में बैठने वाले मुसलमान प्रतिनिधि ये बोल-बोलकर गला फाड़ते रहते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण बिल लाइए लेकिन उसका आधार देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को बनाइये, मुसलमानों को नहीं। कांग्रेस भी जनसंख्या नियंत्रण वाले कानून का विरोध कर नहीं सकती। किस मुंह से करेगी, संजय गांधी इसी पार्टी में हुए हैं। लोगों को पकड़-पकड़ कर नसबंदी कराई थी। नसबंदी का जो खौफ था उसे आज के जमाने में सिर्फ नोटबंदी बीट कर सकती है। अभी हाल ये है कि गूगल पर ‘जनसंख्या नियंत्रण बिल का विरोध’ सर्च करो तो एक आदमी नहीं मिलेगा। उसके सपोर्ट वाले सैकड़ों रिजल्ट्स दिखेंगे। कांग्रेस और बाकी कोई पार्टी जनसंख्या नियंत्रण बिल का विरोध नहीं कर रही। पक्ष और विपक्ष की यह राजनीति तो चलती रहेगी लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत ने वर्ष 1994 में जनसंख्या और विकास की घोषणा पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया था और उसने सम्मेलन की घोषणा पर भी हस्ताक्षर किया था। इसके मुताबिक, भारत ने यह माना था कि कोई दंपती अपने परिवार को कितना बड़ा करना चाहता है, यह तय करना उसका अधिकार होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि दो बच्चों के जन्म के बीच की मियाद क्या होगी, यह अधिकार भी दंपती के पास ही सुरक्षित रहेगा।

इसलिए भारत जैसे देश में जनसंख्या को लेकर सरकार को चाहिये कि शिक्षा व अच्छे स्वास्थ्य के माध्यम से पर्याप्त जागरूकता फैलाये। इस पर सामाजिक सहमति बनाई जाये। परिवार की घट-बढ़ का आधार न तो सुविधाओं या नागरिक अधिकारों में कटौती के रूप में हो, न ही लालच या प्रोत्साहन। आपातकाल के दौरान लोगों की हुई जबरिया नसबंदी भारत के लिये एक सबक है कि ऐसे मुद्दे लोगों के लिये बहुत ही संवेदनशील होते हैं जिन्हें अत्यंत सावधानी से हैंडल करना चाहिये।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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