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देर से ही सही पर एक आवश्यक और सही शुरूआत

देर से ही सही पर एक आवश्यक और सही शुरूआत

उत्तर प्रदेश के राज्य विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित जनसंख्या नीति का मसौदा जारी होते ही उसका स्वागत होना चाहिए था। अब तक राजनीति में उन्हें प्रोत्साहन है जो जनसंख्या का बोझ बढ़ाकर देश के संसादनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। यह प्रवृत्ति वोटबैंक की राजनीति को बहुत रास आती है। आज आवश्यकता है कि ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जाए जो जनसंख्या के बोझ को नियंत्रित करने में मददगार हैं। पर, इसके विपरीत देश का वामपंथी मीडिया योगी सरकार का विरोध करते-करते बढ़ती जनसंख्या के पक्ष में कुतर्क करने लगा। बेतहासा बढ़ती जनसंख्या भारत में आम तौर से और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से एक खतरनाक परिस्थिति निर्मित कर रही है। संसाधनों को आबादी के अनुपात में बढ़ाने की एक सीमा है। कृषि योग्य भूमि का रकबा लगातार घटता जा रहा। जल की उपलब्धता, पर्यावरण का प्रदूषण और स्वास्थ्यप्रद जीवन सुविधाओं पर भारी बोझ बढ़ रहा है।

अगर हम दुनिया के विकसित और बेहतर जीवन गुणवत्ता वाले देशों की सूची बनाएं तो पता चलेगा कि उन देशों की जनसंख्या भारत तो छोडि़ए अकेले उत्तर प्रदेश से ही काफी कम है। चिकित्सा, शिक्षा, ऊर्जा और आवागमन की सुविधाओं पर जितना बोझ उत्तर प्रदेश में है वह निकट भविष्य में स्थिति को और संकटपूर्ण बनाएगा। इसलिए देर से ही सही जो पहल जनसंख्या नियंत्रण के लिए की है वह स्वागत योग्य है।

जनसंख्या नियंत्रण नीति का विरोध वोट बैंक की राजनीति के लिये किया जाना भयावह है और प्रदेश के भविष्य तथा आने वाली पीढिय़ों के लिए चिंता का कारण बनेगा उसमें संदेह नहीं। जनसंख्या नियंत्रण रातों रात नहीं होता। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इसके लिए बहुत पहले से ही प्रयास किए जाने चाहिए थे। लेकिन कहीं से भी शुरूआत करनी ही होगी। सबसे बड़ी बात कि जो प्रावधान इस नीति में हैं वे पहले से ही अन्य राज्यों में कानून का रूप लिए हुए हैं।

दो बच्चों की नीति की बात करने वाला उत्तर प्रदेश पहला राज्य नहीं है। राजस्थान में सरकारी नौकरियों में यह नीति पहले से ही लागू है। इसी तरह पंचायती राज में भी दो बच्चों की नीति भी पुरानी है। जनसंख्या और संसाधनों के अनुपात का संतुलन किसी भी देश और समाज की शक्ति का महत्वपूर्ण परिचायक है। आज की दुनिया लोकतंत्र की है और इसमें आबादी का सत्ता तंत्र की निर्मिति में एक बड़ी भूमिका है। इसलिए प्राय: सत्ताधारी दल जनसंख्या नियंत्रण के लिए कदम उठाने से परहेज करते रहे। बढ़ती आबादी जमीन, आवास, भूजल, चिकित्सा व्यवस्था पर ही बोझ नहीं बढ़ाती बल्कि बेरोजगारी का भी एक बड़ा कारक है। कल्पना करें कि आज भारत की आबादी जितनी है अगर उसकी आधी होती तो क्या प्रतिव्यक्ति संसाधनों की उपलब्धता बेहतर नहीं होती।

उत्तर प्रदेश आबादी की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है। लेकिन वोटबैंक की राजनीति ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को न तो शुरू किया और अब जब कि योगी सरकार यह योजना लेकर आयी है तो उसका विरोध किया जा रहा है। वह विरोध भी अद्भुत तर्कों के साथ किया जा रहा है। उसे कुछ लोग धर्मनिरपेक्षता के ही विरुद्ध बता रहे हैं तो कुछ इसे खुल्लम-खुल्ला अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बता रहे। ऐसे तर्क देने वाले न तो अल्पसंख्यकों के हिमायती हैं और न ही धर्मनिरपेक्षता। उन्हें तो इस संवेदनशील मुद्दे पर केवल अपना वोटबैंक और योगी विरोध दिखायी दे रहा है। बच्चे न तो किसी मशीन से पैदा होते हैं और न ही आसमान में पलते बढ़ते हैं। जीवन में बार-बार बच्चों को जन्मे देने वाली औरतों की दृष्टि से अगर उसे देखा जाता तो समझ में आता कि जनसंख्या नीति औरतें के किस हद तक हक में है। वर्ष दर वर्ष गर्भ धारण करना और संतान को जन्म देने औरतों के लिए कितना भयावाह है यह जनसंख्या नीति पर अल्पसंख्यक विमर्श चलाने वालों के जेहन में नहीं रहता जैसे कि अल्पसंख्यक और गरीब पिछड़ी औरतें औरतें ही नहीं होतीं और उनका स्वास्थ्य कोई मुद्दा ही नही। औरतें औरतों ही नहीं नवजात बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा, भोजन, आवास और रोजगार की चिंता बढ़ती जनसंख्या के समर्थकों को नहीं होती। उनके लिए तो जन्म लेने वाला हर बच्चा सिर्फ एक वोटर है और कुछ नहीं। गरीबी और पिछड़ेपन को कुछ राजनीतिक दलों और गिरोहों ने अपनी सुविधा के लिए अपनी राजनीतिक खेती की जमीन बना लिया है। वे गरीबों को हमेशा के लिए गरीब बनाए रखना चाहते हैं ताकि उनकी वोट की फसल चुनाव दर चुनाव लहलहाती रहे। जीवन की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी आज सबसे बड़ी आवश्यकता है। सबके लिए पौष्टिक भोजन, आवास, चिकित्सा, शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों के साथ सबके लिए शौचालय की उपलब्धता एक बहुत बड़ी आबादी को सुनिश्चित कराना बहुत बड़ी चुनौती है।

भारत को जनसंख्या नियंत्रण के प्रभावकारी उपायों की आवश्यकता बहुत पहले से ही महसूस की जा रही है। सबसे बड़ा संकट यह है कि आबादी बढ़ती जा रही है और संसाधन घटते जा रहे हैं। आबादी और संसाधन का यह व्युत्क्रमानुपाती संबंध भारत और उत्तर प्रदेश के लिए चिंताजनक है। अकेले उत्तर प्रदेश की आबादी दुनिया के कई राष्ट्रों से अधिक है। सकैंडेनेवियायी देशों जैसे स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, ग्रीनलैंड। ढेनमार्क और आइसलैंड  की कुल आबादी से उत्तर प्रदेश की आबादी अधिक है। इन देशों का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं क्योंकि यहा जीवन की गुणवत्ता दुनिया में सबसे बेहतर मानी जाती है। यहां क्षेत्रफल और आबादी के अनुपात की तुलना भारत छोडि़ए अगर उत्तर प्रदेश से ही की जाए तो सारी कहानी सामने आ जाती है।

बढ़ती जनसंख्या का संबंध संसाधनों और अवसरों की उपलब्धता का ही मुद्दा नहीं होता बल्कि अपराधों की भी एक बड़ी भूमिका होती है। उपर्युक्त देशों में जीवन की गुणवत्ता कम होने से अपराध बहुत कम होते हैं और जेलें प्राय: खाली रहती हैं। इस नीति के तहत जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकारी सुविधाओं तथा नौकरियों और चुनावी राजनीति से जोडऩा ही सबसे बड़े विरोध का कारण है। बच्चे ईश्वर की देन हैं तो क्या उनको जन्म देने वाली औरतें ईश्वर की देन नहीं हैं? ये धरती, जल और पर्यावरण क्या ईश्वर की देन नहीं है? हर जन्म लेने वाले बच्चे के पूर्ण विकास के लिए भोजन, आवास, चिकित्सा और शिक्षा तथा रोजगार के बेहतर अवसर हों यह आवश्यक नहीं? आखिर जनसंख्या नियंत्रण को लोगों की मर्जी पर छोडऩा देश और प्रदेश के लिए भयावह होगा तथा आने वाली पीढिय़ां हमें माफ नहीं कर पायेंगी।

 

Deepak Kumar Rath


डॉ.
विवेकानंद उपाध्याय

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