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क्या योग का बाजारीकरण हो रहा है?

क्या योग का बाजारीकरण हो रहा है?

घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध – यह कहावत यूं ही नहीं बनी है। भारतीयों पर तो यह कहावत सौ प्रतिशत लागू होती है। हम हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति को लेकर इस तरह हीनता बोध से ग्रस्त हैं कि हमें अपनी विरासत पर कभी अभिमान ही नहीं होता। हम उसके प्रति तब जागते हैं जब विदेशी खासकर यूरोप और अमेरिका के लोग उसे अपनाते हैं। तब हमें लगता है कि इसमें कोई तो बात है। भारत में योग दो तीन हजार साल पुराना तो है ही। हमारे यहां सिद्ध योगी जंगलों में गुफाओं में योग साधना करते थे। लेकिन हमें कभी उसका महत्व समझ ही नहीं आया। मुगल काल में तो योग लगभग लुप्त ही हो गया था। उन्नीसवीं- बीसवीं शताब्दी में हमारे कुछ योगियों ने योग को फिर से स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। तो उन्होंने द्राविड़ी प्राणायाम का रास्ता अपनाया। यानी उन्होंने पहले योग का पश्चिमी देशों में प्रचार- प्रसार किया जब योग पश्चिमी देशों में लोकप्रिय हो गया तो धीरे-धीरे भारतीय भी उसे अपनाने लगे। किसी समय भारत का योग पश्चिमी में जाकर योगा बन गया है और वहां इस कदर छा गया है कि योग वहां न केवल फल-फूल रहा है बल्कि, अरबों डालर की इंडस्ट्री का रूप ले चुका है। वहां योगगुरू दौलत भी बटोर रहे हैं और शोहरत भी।

60221303_1cfe771968_o1893 में विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिये गये भाषण में अमेरिका में पहली बार योग का परिचय दिया गया था। इसके बहुत समय बाद तक अमेरिका में योग का प्रचार नहीं हुआ। लेकिन 1960 के दशक में लोगों ने इस बारे में ठीक से जाना। 70 के दशक में योग स्थापित हुआ और लोगों ने इसे मन और शरीर की चिकित्सा का माध्यम समझ लिया। हालांकि योग पहले आध्यात्मिक भावना से जुड़ा था, लेकिन फिर लोगों ने इसे चिकित्सा से जोड़ा और दर्द व चोटों से निजात पाने का माध्यम बनाया। फिर फिटनेस से जोड़़कर इसे विभिन्न खेलों में बेहतर प्रदर्शन के लिए लाभकारी बताया। योग के लाभ से जुड़े स्वास्थ्य अध्ययनों का प्रचार होने पर 90 के दशक में योग के फिटनेस पहलू ने जोर पकड़ लिया। योग प्रचलित हो गया और मुख्यधारा में आ गया। जब नाइकी, एपल और एचबीओ जैसी कंपनियों ने ऑन-साइट योग कक्षाएं शुरू कर दीं।

2001 में 43 लाख अमेरिकी योग का अभ्यास कर रहे थे जबकि अब ढाई करोड़ अमेरिकी योग करते हैं। योग केंद्रों की संख्या भी बढ़ी है। यह संख्या 2004 में 14058 थी जो 2013 में 26506 पाई गई। योग कक्षाओं और उपकरणों पर लोग 10.3 बिलियन डॉलर हर साल खर्च कर रहे हैं जो चार साल में 1.8 गुना बढ़ गया है। योग प्रशिक्षण की चेन कोरपावर ने यूएस में 119 स्टूडियो खोल रखे हैं और वह 500 स्टूडियो के लक्ष्य की विस्तार योजना बना रही है। हाल ही में छपे आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में योग 28 अरब डॉलर का उद्योग है।

योग को दुनियाभर में पहचान दिलाने में भारतीय योग गुरुओं का विशेष योगदान रहा है। टी.कृष्णमाचार्य को आधुनिक योग का जनक कहा जाता है। उनसे प्रेरणा लेकर दुनिया भर में कई योग संस्थान खुले। अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने मैसूर के शाही दरबार में बिताया जहां वे दर्शनशास्त्र व योग सिखाते थे। सन् 1933 में उन्होंने भारत के पहले योग स्कूल की नींव रखी। 1989 में सौ साल की उम्र में निधन होने से पहले उन्होंने ऐसे कई योग्य शिष्य तैयार कर दिए जिन्होंने देश-विदेश में योग की महत्ता को बढ़ाया।

बी.के.एस अयंगर हालांकि कृष्णमाचार्य के रिश्तेदार थे, लेकिन वे उन्हें अपना गुरू मानते हैं। उनसे योग सीखने वालों की संख्या लाखों में है। यहूदी मेनुहिन, जिद्दू कृष्णमूर्ति व जय प्रकाश नारायण उनके खास समर्थक रहे हैं। अपने बहनोई कृष्णमाचार्य की सलाह पर अयंगर मैसूर से पुणे चले गए जहां उन्होंने राममणि अयंगर मेमोरियल योग संस्थान की स्थापना की। कृष्णमाचार्य के एक और प्रिय शिष्य कृष्ण पट्टाभि जोइस गुरुजी के नाम से लोकप्रिय थे। 1974 में गुरुजी पहली बार दक्षिण अमेरिका गए। एक साल बाद उन्होंने अमेरिका का दौरा किया। 93 साल की उम्र में 2009 में गुरूजी का निधन हो गया।

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पांच हजार साल पुरानी योग विद्या को भारतीय योगियों ने वैश्विक पहचान क्या दिलाई, अमेरिका में इसे व्यवस्थित कारोबार का रूप दे दिया। 1950 के दशक में बैरन बैप्टिस्ट के माता-पिता सन फ्रांसिस्को में छोटा सा योग स्टूडियो व हैल्थ फूड स्टोर चलाते थे। बैरन ने अष्टांग विन्यास योग में से पावर योग नाम की पद्धति निकाली जो अमेरिका में बड़े पैमाने पर अपनाई गइै। बैरन ने बी.के.एस अयंगर से योग की दीक्षा ली। आज उनके दुनिया भर में तीस से ज्यादा संस्थान हैं। फिलाडेल्फिया ईगल्स की पूरी फुटबाल टीम बैरन से योग सीखती है।

इसी का नतीजा है कि रॉल्स रायस गाडिय़ों का बेड़ा रखने वाले हठ योगा के प्रेणना स्रोत विक्रम चौधरी सबसे लोकप्रिय गुरू हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन व बिल क्लिंटन के अलावा मडोना, जेनिफर एनिस्टन और लॉन टेनिस खिलाड़ी एंडी मरे के योग गुरू विक्रम चौधरी हैं। हालांकि वे यौन उत्पीडऩ के एक मामले में फंसे हुए हैं, लेकिन उनके योग का ब्रांड नेम विक्रम योग पश्चिमी देशों में बेहद लोकप्रिय है। 220 देशों में विक्रम चौधरी के सात सौ योग स्कूल हैं।

योग से दौलत और शोहरत कमाने के इस वैश्विक चलन को देख कर ही बाबा रामदेव योग के प्रसार के मैदान में उतरे। शुरुआती सालों में टीवी चैनल व योग शिविरों के माध्यम से उन्होंने योग को लोकप्रियता भी खूब दिलाई। कई फिल्मी सितारे उनके मुरीद हो गए। लेकिन योग और आयुर्वेदिक दवाएं बेचकर उन्होंने पैसा भी खूब कमाया और शोहरत भी। वैसे श्री श्री रविशंकर भी अपने ढंग से योग के प्रचार में लगे हैं।

योग के दुनियाभर में प्रसार से उसका बाजारीकरण हो रहा है जिसके कुछ नुकसान भी हो रहे हैं। कुछ योग गुरू इस प्राचीन विद्या का कॉपीराइट अपने नाम से कराकर उससे पैसा कमाना चाहते हैं। उन्हें इसमें कुछ सफलता भी मिली है। बौद्धिक संपदा के बल पर पैसा कमाने के लिए मशहूर अमेरिका में प्राचीन भारतीय विद्या योग के आसनों के करीब 150 पेटेंट, दो हजार ट्रेडमार्क और 150 कॉपीराइट करा लिए गए हैं। इससे सतर्क हुई भारत सरकार अब आसनों की वीडियोग्राफी करा रही है जिन्हें अमेरिकी और यूरोप के पेटेंट कार्यालयों को मुहैया कराया जाएगा, ताकि और नुकसान रोका जा सके। वर्ष 2005-2006 में हुए पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, अमेरिका में उस समय तक योग पर आधारित करीब 135 पेटेंट कराए जा चुके थे। अब इनकी संख्या 150 से ज्यादा हो सकती है। टीकेडीएल के निदेशक डॉ. वी. के. गुप्ता बताते हैं, यह काफी चिंताजनक है योग विद्या भारत के पारंपरिक और प्राचीन ज्ञान पर आधारित है और अन्य देशों में इसके पेटेंट, ट्रेडमार्क और कॉपीराइट होना दुर्भाग्यपूर्ण है। योगासनों का सबसे पहले उल्लेख पतंजलि योग सूत्र में मिलता है जिसकी रचना दो हजार वर्ष पहले हुई थी। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि हम हमारे ज्ञान को दूसरे देशों-कंपनियों की ओर से पेटेंट कराए जाने के इस चलन को मजबूती से रोकें। अब करीब 900 योगासनों की वीडियोग्राफी तैयार कराई जा रही है। इसे डिजिटल स्वरूप दिया जाएगा, ताकि भविष्य में इनकी नकल को रोका जा सके।

जैसे-जैसे योग की लोकप्रियता का दायरा बढ़ रहा है, हिंदू धर्म से इसका जुड़ाव कहीं-कहीं इसे लेकर विरोध भी पैदा कर रहा है। जैसे, पिछले वर्ष अमेरिका में साउथ कैलिफोर्निया स्थित एंसिनीतास यूनियन स्कूल में पढऩे वाले छात्रों के अभिभावकों के एक वर्ग ने अदालत में याचिका दायर कर कहा था कि उनका स्कूल अष्टांग योग के जरिए धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि इस मामले में उन्हें मुंह की खानी पड़ी। ओबामा प्रशासन भी योग को बढ़ावा देते हुए इसके किसी धर्म से जुड़े होने की बात को खारिज कर चुका है। असल में, ईसाई और इस्लाम मत के कुछ लोगों की आपत्ति है कि योग हिंदू धर्म को बढ़ावा देता है। ईसाइयों को योग के प्रति चेतावनी सबसे पहले दिवंगत पोप जॉन पाल द्वितीय ने एक पुस्तिका में लिखकर दी थी। न्यूयार्क में योग प्राध्यापक के रूप में विख्यात बेरिल बेंडर बिर्क ने योगासनों की तरफ खींचे चले आ रहे अमेरकियों की सोच का गहराई से अध्ययन किया। उनका मानना है कि योग के पीछे जो असली विचार काम करता है, वह दिमाग और शरीर को गहराई से जागरूक करना है। शरीर के उपचार और संतुलन से दिमाग में स्पष्टता और एकाग्रता आती है। इससे मिलती-जुलती राय भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनी पुस्तक- डिस्कवरी ऑफ इंडिया में व्यक्त कर चुके हैं। उनके अनुसार, योग शरीर को सेहतमंद रखने का भारतीय तरीका है। लेकिन, योग को लेकर अमेरकियों का एक वर्ग परेशान भी है और भयभीत भी महसूस कर रहा है।

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कुल मिलाकर पश्चिम में योग आधुनिक जीवन की तमाम समस्याओं का हल हो गया है। ऐसा माना जाने लगा है शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक स्वास्थ्य की हर समस्या का समाधान योग के पास है। इस तरह यह पश्चिमी दुनिया में जीवनशैली की अहम जरूरत ही नहीं बना बल्कि, अब यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि जिस तरह भारत में अंग्रेजी बोलना, जीन्स पहनना स्टेट्स सिम्बल माना जाता है वहां योग स्टेट्स सिम्बल और फैशन बन गया है।

योग की आवश्यकता और योग के प्रति इस जागरूकता के चलते वहां योग के बाजार ने भी स्वयं को विस्तार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। योग पर कई अंग्रेजी वेबसाइटों से पता चलता है कि ज्यादातर वेबसाइटें तो पश्चिमी देशों के संस्थानों की है। वे लोग योग सीख भी रहे हैं और उसे बेहतर तकनीक के साथ सीखा भी रहे हैं। आप उनके वीडियो के डेमो देंखे, टेक्स्ट देंखे और इसमें कोई आश्चर्य नहीं की बेहतरीन प्रोडक्ट की लंबी लिस्ट डॉलर के सिम्बल के साथ आपको मिलेगी।

बाजारवाद के चलते अब तो ‘योगा शॉप’ भी खुल गई हैं, जहां आप पाएंगे कई रंगों में उपलब्ध मॉडर्न मेट, रंग-बिरंगी नक्काशी की हुई कालीन, म्यूजिक सिस्टम, बुक्स, लड़के और लड़कियों के अलग योगा ड्रेसेस, योगा बेग्स, बेल्ट, जलनेति के लिए नेति पॉट, धोती कर्म के लिए धोती, विशेष आसनों के लिए तकिए, गद्दे और लकड़ी के पॉट जैसी अनेक और चीजें है, जो बाजार में उपलब्ध है।

योग करते वक्त अच्छा माहौल होना चाहिए, तो जरूरी है योगा परफ्यूम और खास तरह से बनाया गया योगा संगीत का इस्तेमाल हो। योगा टॉवेल और योगा रूमाल या नैपकिन की आवश्यकता योगा करने के बाद होती ही है। हां अब बात करते हैं कीमत की, तो जान लें की प्रत्येक आइटम की कीमत 20 डॉलर से 50 डॉलर तक हो सकती है। यानी एक हजार से लेकर ढाई हजार रुपये तक।

अब योगा क्लासेस कहने में थोड़ी झेंप आती है। इंडोनेशिया से अमेरिका तक योगा रिजॉर्ट खुल गए हैं। जहां योग की प्रत्येक विधा से आपका परिचय होगा। इस क्षेत्र में न सिर्फ आध्यात्मिक गुरु बल्कि, सरकारी और गैरसरकारी विभाग के कई सीनियर अधिकारियों ने अपनी नौकरी छोड़ कर विदेशों में योग केंद्र बना लिए हैं।

हिमालय के बौद्ध और हिंदू मठों से निकलकर योग अब योगा बनते हुए न्यूयॉर्क, लंदन, बैंकॉक, बाली, कैलिफोर्निया, मेक्सिको, स्पेन, मलेशिया, कोस्टारिका के भव्य योग रिजॉर्ट की शान बन चुका है. थाइलैंड के हुआ हिन, वेस्टइंडीज के पैरट, इंडोनेशिया के देसा सेनी वाली, मेक्सिको के मायाट्लुम, स्पेन के इंजीबा, कोस्टारिका के गोल्डन डोर, अमेरिका के वर्जिन आइलैंड, मिलामोंटे कैलिफोर्निया और कालानी बाई आदि रिजॉर्टों में योग को सीखना शान की बात है।

खैर जो भी हो, योग का बाजार धीर-धीरे धर्म, राष्ट्र और समाज की सरहदें पार करते हुए विराट रूप धारण करता जा रहा है। इससे योग का बाजारीकरण भी हुआ है जो सचमुच में चिंता का विषय है।

सतीश पेडणेकर

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