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योग बना विश्वगुरू

योग बना विश्वगुरू

योग से जुड़ कर हम सदा स्वस्थ्य और स्फूर्तिवान बने रह सकते हैं। कुछ लोगों की सोच के मुताबिक योग का अर्थ एक्सरसाइज से है। तो इसके लिए योग ही क्यों? जिम ही ठीक है, लेकिन जिम सिर्फ शरीर के ढांचे को बनाते और बिगाड़ते हैं न कि व्यक्ति के शरीर को हष्ट-पुष्ठ और मस्तिष्क को सेहतमंद और स्फूर्तिवान बनाने में सक्षम हैं। क्या मशीनी एक्सरसाइज से उम्र लंबी होती है? व्यक्ति सदा जवान बना रह सकता है? नहीं। योग आपको कई स्तर से सुधारता है- आसन से जहां हड्डियां, मांस-मज्जा और भीतरी अंगों में सुधार होता है, वहीं प्राणायाम से शरीर के भीतर की नस और नाडिय़ों में सुधार होता है। इसके अलावा यम, नियम, मुद्रा और क्रियाएं भी हैं जो आपके शरीर से दूषित पदार्थ को बाहर निकालकर हर तरह के रोग को समाप्त करने की ताकत रखती हैं। योग से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों स्तर पर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। निश्चित ही योग के माध्यम से 100 वर्ष तक स्वस्थ्य रहकर जवान बने रह सकते हैं। बशर्ते कि आप सदा योग की शरण में रहें। जानते हैं योगासनों के विषय में विस्तार से:-


 योगासन और उनके फायदे


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सूर्य नमस्कार

विधि-(पहली मुद्रा) सावधान की मुद्रा में खड़े होकर दोनों हाथों को कंधे के बराबर में उठाते हुए ऊपर की ओर ले जाएं। हाथों के अगले भाग को एक-दूसरे से चिपका लीजिए फिर हाथों को उसी स्थिति में सामने की ओर लाकर नीचे की ओर गोल घूमाते हुए नमस्कर की मुद्रा में खड़े हो जाएं। (दूसरी मुद्रा) सांस लेते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर खींचिए तथा कमर से पीछे की ओर झुकाते हुए भुजाओं और गर्दन को भी पीछे की ओर झुकाएं, ये अर्धचक्रासन की स्थिति मानी गई है। (तीसरी मुद्रा) सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए बाहर की ओर झुकिए। हाथ को गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जा कर घुटनों को सीधे रखते हुए पैरों के दाएं-बाएं जमीन को छुएं। कुछ समय तक इसी स्थिति में रूकिए। इस स्थिति को पाद-पश्चिमोत्तनासन या पादहस्तासन भी कहते हैं। (चौथी मुद्रा) इसी स्थिति में हाथों को जमीन पर टिकाकर सांस लेते हुए दाहिने पैर को पीछे की तरफ ले जाइए। उसके बाद सीने को आगे की तरफ खीचते हुए गर्दन को ऊपर उठाएं। इस मुद्रा में पैर का पंजा खड़ा हुआ रहना चाहिए। (पांचवीं मुद्रा) सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए बाएं पैर को भी पीछे की तरफ ले जाएं। अब दोनों पैरों की एडिय़ां आपस में मिली हों। शरीर को पीछे की ओर खिचाव दीजिए और एडिय़ों को जमीन पर मिलाकर गर्दन को झुकाते हुए शरीर को पर्वताकार स्थिति में लाएं। (छठी मुद्रा) सांस लेते हुए शरीर को जमीन के बराबर में साष्टांग दंडवत करें और घुटने, सीने, ठोड़ी को जमीन पर लगा दीजिए। जांघों को थोड़ा ऊपर उठाते हुए सांस को छोड़े। (सातवीं मुद्रा) इस स्थिति में धीरे-धीरे सांस को भरते हुए सीने को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधा कीजिए। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं। घुटने जमीन को छू रहे हों तथा पैरों के पंजे खड़े रहे। इसे भुजंगासन भी कहते हैं। (आठवीं मुद्रा) अब फिर पांचवी स्थिति जैसी मुद्रा बनाएं उसके बाद इसमें ठोड़ी को कंठ से टिकाते हुए पैरों के पंजे को देखते हैं। (नौंवी मुद्रा) इस स्थिति में चौथी स्थिति जैसी मुद्रा बनाएं उसके बाद बाएं पैर को पीछे ले जाएं, दाहिने पैर को आगे ले आएं। (दसवीं मुद्रा) तीसरी स्थिति जैसी मुद्रा बनाएं उसके बाद बाएं पैर को भी आगे लाते हुए पाद-पश्चिमोत्तनासन की स्थिति में आ जाएं। (ग्यारहवीं मुद्रा) दूसरी मुद्रा में रहते हुए सांस भरते हुए दोनों हाथों को ऊपर ले जाएं। उसी स्थिति में हाथों को पीछे की ओर ले जाएं साथ ही गर्दन तथा कमर को भी पीछे की ओर झुकाएं। (बारहवीं मुद्रा) में यह स्थिति पहली मुद्रा की तरह है अर्थात नमस्कार की मुद्रा में वापस आ जाएं।

लाभ

हड्डियां मजबूत बनती हैं, आंखों की रोशनी बढ़ती है, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है, दिमाग शांत रहता है, तनाव कम होता है, रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है, त्वचा रोग दूर होते हैं, पाचन तंत्र सुधरता है, शरीर हष्ट-पुष्ट बनता है, जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।



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हलासन

विधि- जमीन पर आसन बिछा कर पीठ के बल जमीन पर सीधे लेट जाएं। दोनों हाथों को किनारे रखें और उनकी सहायता से कमर और पैरों को ऊपर उठाएं। सहायता के लिए दोनों हाथों को हिप्स से टिकाएं। अब दोनों पैरों से सिर के ऊपर की जमीन छूने की कोशिश करें। इस दौरान गहरी सांस लें और फिर सांस छोड़ते हुए पैरों को सीधा करें। धीरे-धीरे पैरों को जमीन पर लाएं और सीधे लेट जाएं।

लाभ

दिल से जुड़े रोगों और ब्लड प्रेशर संबंधित समस्याओं से बचाता है, आयु वृद्धि होती है, शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है, रक्त संचार ठीक होता है, वजन घटता है, शरीर मजबूत बनता है, यह हिप्स और कंधों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, जांघों से अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद करता है, लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठने वाले लोगों के लिए भी इसका अभ्यास फायदेमंद है, रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है, पेट की अतिरिक्त चर्बी घटती है, शरीर सुडौल बनता है, वीर्य विकार और श्वास संबंधी रोग में भी इस आसन से काफी लाभ मिलता है।



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ताड़ासन

विधि- सबसे पहले जमीन पर कंबल बिछाकर सीधे खड़े हो जाएं। दोनों पैरों के पंजे व एडिय़ां जुड़े होने चाहिए। अपने दोनों हाथों को जांघों के आसपास रखें। गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं और नमस्कार की मुद्रा बनाएं। इसे अंजलि मुद्रा कहते हैं। अब दोनों हाथों को ऊपर ले जाते हुए पैरों का सारा भार अंगूठों पर छोड़कर शरीर को ऊपर की ओर स्ट्रेच करें। सांस छोड़ते हुए वापस उसी अवस्था में आ जाएं।

लाभ

ताड़ासन से शरीर के सभी जोड़ और हड्डी मजबूत और कोमल बनती है, पीठ दर्द, स्लिप डिस्क, गर्दन दर्द, कंधे की जकडऩ, गठिया और जोड़ों के दर्द से राहत मिलती है, पाचन क्रिया, श्वास प्रणाली, नर्वस प्रणाली और मांशपेशियों में सुधार होता है, अस्थमा और श्वास संबंधी बीमारियों के उपचार में सहायक है, आलस्य, थकान, चिंता, तनाव और भारीपन भी इस आसन के अभ्यास से दूर रहते हैं, शरीर में रक्त प्रवाह को संतुलित करता है, इसके साथ ही शरीर को एक सही आकार देता है, बच्चों की लंबाई बढ़ाने के लिए ताड़ासन काफी सहायक है



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मयूरासन

विधि-जमीन पर पेट के बल लेट जाइए। दोनों पैरों के पंजों को आपस में मिलाइए। दोनों घुटनों के बीच एक हाथ का अंतर रखते हुए दोनों पैरों की एडिय़ों को मिलाकर रखिए। फिर दोनों हाथों को घुटनों के अंदर रखिए ताकि दोनों हाथों के बीच चार अंगुल की दूरी बनी रहे। दोनों कोहनियों को आपस में मिला कर नाभि पर ले जाइए। अब पूरे शरीर का वजन कोहनियों पर दे कर घुटनों और पैरों को जमीन से उठाये रखिए। सिर को सीधा रखिए। पुन: सामान्य स्थिति में आने के लिए पहले पैरों को जमीन पर ले आएं और तब पुन: वज्रासन की स्थिति में आ जाएं।

लाभ

चेहरे पर लाली आती है, फेफड़ों के लिए बहुत उपयोगी है, भुजाओं और हाथों को बलवान बनाता है, रक्त संचार को नियमित करता है, मधुमेह रोग से बचाता है, पेट के रोगों जैसे-अफरा, पेट दर्द, कब्ज, वायु विकार और अपच को दूर करता है, गुर्दे, अग्नाश्य, अमाशय के साथ यकृत की बीमारियों को दूर करता है।



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पद्मासन या कमलासन

विधि-जमीन पर बैठकर बाएं पैर की एड़ी को दाईं जंघा पर इस प्रकार रखे कि एड़ी नाभि के पास आ जाएं। इसके बाद दाएं पांव को उठाकर बाईं जंघा पर इस प्रकार रखें कि दोनों एडिय़ां नाभि के पास आपस में मिल जाएं। मेरुदण्ड सहित कमर से ऊपरी भाग को पूर्णतया सीधा रखें। ध्यान रहे कि दोनों घुटने जमीन से उठने न पाएं। इसके बाद दोनों हाथों की हथेलियों को गोद में रखते हुए स्थिर रहें। इस प्राक्रिया को पैर बदल कर भी करना चाहिए। फिर दृष्टि को नासाग्रभाग पर स्थिर करके शांत बैठ जाएं।

लाभ

पद्मासन करने से हमारी रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है, माहवारी की तकलीफों को दूर करने में सहायक है, पद्मासन करने से शरीर का वसा कम होता है, नस-नाडियों में लचक आती है। शरीर दृढ़ और स्फूर्तियुक्त बनता है, मन को शांति मिलती है, बुद्धि तेज होती है, साथ ही सात्विकता भी बढ़ती है।



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सर्वांगासन

विधि- पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को कमर के दोनों तरफ और हथेलियों को नीचे की तरफ करके जमीन पर रखे। दोनों हथेलियों से जमीन को दबाए और दोनों पैर एक साथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठायें, घुटनों से उन्हें मोड़ें और ऊपर की ओर इस प्रकार झुकाएं कि ठुड्डी छाती को स्पर्श करे।

अपनी दोनों कोहनियों को जमीन पर टिकाकर हाथों से पीठ को ऊपर उठायें। अब धीरे-धीरे सावधानी से अपने शरीर को ऊपर की ओर सीधा खड़ा करें लेकिन सिर जमीन पर ही रहे। इस दौरान दोनों पंजे आपस में मिले हुए और पैरों की उंगलिया आसमान की ओर तनी रहें। जबतक संभव हो इस मुद्रा में रुकने के बाद शरीर को जमीन पर लाने के पहले सर्वप्रथम पैरों को घुटने से मोड़ें और घुटने नीचे करें। अब अपने दोनों हाथों को जमीन पर रखें और उन पर अपने को इस प्रकार आधारित करें कि सिर पर शरीर का पिछला भाग अर्थात पीठ जमीन पर आ जाये। जब आपकी पीठ का निचला भाग जमीन पर हो तब पैरों को आकाश की ओर कीजिये और धीरे-धीरे उन्हें जमीन पर ले आइये। शरीर की मांसपेशियों को तनावरहित और ढीला छोड़ दें और दो-तीन मिनट तक श्वासन में लेट जाएं।

लाभ

गले की ग्रन्थियों को प्रभावित कर वजन नियंत्रित करने में सहायक होता है, आंखों और मस्तिष्क की शक्ति विकसित करता है, यह दमा, धड़कन, सिर दर्द में राहत देता है, पाचन क्रिया शुद्ध करता है, श्वास और यौन ग्रंथियों को सक्रिय और विकसित करता है, हर्निया की रोकथाम करता है, मानसिक शक्ति को बल प्रदान करता है, कुंडलिनी शक्ति जागृत करने में सहायक होता है, यकृत की कार्य प्रणाली में सुधार लाता है, रक्त शोधक का कार्य भी करता है, सुस्ती दूर कर हारमोंस को संतुलित करता है।



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वज्रासन

विधि-वज्रासन ये अकेला ऐसा आसन है जिसे खाना खाने के बाद किया जाता है। बांकी के सभी आसन खाली पेट ही किये जाते हैं। वज्रासन से शरीर को मजबूती मिलती है। खाने के बाद कुछ देर रुकें। फिर कोई आसन बिछाकर उसपर घुटनों को मोड़कर इस तरह से बैठें कि पैरों के पंजे पीछे की ओर हो जाएं और नितंब दोनों एडिय़ों के बीच में आ जाए। अब दोनों पैरों के अंगूठे आपस में मिलाकर रखें। एडिय़ों में अंतर रहे, इसका भी ध्यान रखें। इसके बाद अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। ध्यान रखें कि आपका शरीर बिल्कुल सीधा रहे। अब हाथों को और शरीर को ढीला छोड़ दें। इसके बाद आंखें बंद रखें श्वास क्रिया को सामान्य रखें। इस अवस्था में कुछ देर यूं ही बैठे रहें। ऐसा हर रोज खाने के बाद करें।

यह आसन पेट से संबंधित बीमारियों के लिए फायदेमंद है। इससे उपापचीय क्रियाएं सही रहती हैं। आंत, पेट आदि दुरुस्त रहते है। माइग्रेन में भी ये आसन काफी फायदेमंद है।

लाभ

ज्वांइट पेन, गठिया, वजन घटाने में मददगार, मेटाबॉलिज्म ठीक करता है, मांसपेशियां लचीली बनती हैं, कब्ज, गैस की समस्या दूर होती है, श्वास समस्या दूर होती है।



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चक्रासन

विधि- भूमि पर बिछे हुए आसन पर चित्त होकर लेट जायें। घुटनों से पैर मोड़ कर ऊपर उठायें। पैर के तलवे जमीन से लगे रहें। दोनों पैरों के बीच करीब डेढ़ फीट का अन्तर रखें। दोनों हाथ सिर की तरफ उठाकर पीछे की ओर दोनों हथेलियों को जमीन पर लगाएं। दोनों हथेलियों के बीच भी करीब डेढ़ फीट का अन्तर रखें। अब हाथ और पैर के बल पूरे शरीर को कमर से मोड़कर ऊपर उठायें। हाथ को धीरे-धीरे पैर की ओर ले जाकर पूरे शरीर का आकार वृत्त या चक्रजैसा बनायें। आंखें बंद रखें। श्वास की गति स्वाभाविक चलनें दें। चित्तवृत्ति मणिपुर चक्र (नाभि केन्द्र) में स्थिर करें। आंखें खुली भी रख सकते हैं। एक मिनट से पांच मिनट तक अभ्यास बढ़ा सकते हैं।

लाभ

मेरूदण्ड तथा शरीर की समस्त नाडिय़ों का शुद्धिकरण होकर यौगिक चक्रजागृत होता हैं। लकवा और शरीर की कमजोरियां दूर होती हैं। मस्तिष्क, गर्दन, पीठ, पेट, कमर, हाथ, पैर, घुटने आदि सब अंग मजबूत बनते हैं। पाचनशक्ति बढ़ती है। पेट की अनावश्यक चर्बी दूर होती है। शरीर तेजस्वी और फुर्तीला बनता है। चक्रासन के नियमित अभ्यास से वृद्धावस्था में कमर नहीं झुकती।


 प्रीति ठाकुर

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