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भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों का डीएनए एक

भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों का डीएनए एक

पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने एक पुस्तक के लोकार्पण में जो भाषण दिया, वह अनायास ही विवाद का विषय बन गया। सर्वाधिक विवाद और आलोचना उनके डीएनए वाले वक्तव्य की हुई। उन्होंने कहा था कि भारत के हिंदुओं और मुसलमानों का डीएनए एक है तथा हम लगभग 40 हजार वर्ष से साथ रहते आए हैं और इसलिए हमें अभी भी साथ रहना सीखना चाहिए। केवल पूजा पद्धति भिन्न होने से कोई फर्क नहीं पडऩा चाहिए।

पूरे सोशल मीडिया पर इस वक्तव्य की काफी आलोचना हुई। स्वघोषित राष्ट्रवादियों ने भी राम-रावण, कृष्ण-कंस, कौरव-पांडव आदि के उदाहरण देना प्रारंभ कर दिया। कहा जाने लगा कि केवल डीएनए एक होने से कुछ नहीं होता, मूल बात धर्म तथा अधर्म की है। अनेक प्रबुद्ध लोगों ने भी मोहन भागवत के नेतृत्व क्षमता और हिंदुत्व की समझ पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिये। जिन्होंने उस वक्तव्य का समर्थन करने का प्रयास किया, उन्हें भी काफी आलोचना का सामना करना पड़ा।

देखा जाए तो यह कार्यक्रम मूलत: मुसलमानों के बीच हो रहा था। हालांकि वहां मोहन भागवत जी के जाने के कारण बड़ी संख्या में हिंदू भी उपस्थित थे, परंतु यह कार्यक्रम एक मुसलमान व्यक्ति द्वारा लिखी पुस्तक के लोकार्पण का था। इसलिए वस्तुत: मोहन भागवत यह भाषण मुसलमानों के बीच ही दे रहे थे, हिंदुओं के बीच नहीं। वे मुसलमानों को कह रहे थे कि आप स्वयं को हिंदुओं से भिन्न समझते हैं, परंतु डीएनए तथा इतिहास के स्तर पर वे भी हिंदुओं से भिन्न नहीं रहे हैं। उनके पूर्वज कभी हिंदू ही रहे हैं। उल्लेखनीय यह है कि यह बात वे मात्र चार महीने पहले दिल्ली में ही एक अन्य पुस्तक के लोकार्पण में कह चुके थे। उस समय भी इस पर काफी चर्चा, विवाद और आलोचना हुई थी। ऐतिहासिक कालगणना नामक मेरी ही लिखी पुस्तक के लोकार्पण में मोहन भागवत जी ने कहा था कि देश में रहने वाले लगभग सभी मुसलमान इसी देश के वासी रहे हैं, कोई भी बाहर से नहीं आए और उन सभी के पूर्वज हिंदू ही रहे हैं। इसी तथ्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस बार कहा कि डीएनए के अनुसार हिंदु-मुसलमानों में कोई भेद नहीं है।

उन्होंने यहां तक कहा कि भेद है ही नहीं तो एकता करने की बात का कोई आधार ही नहीं है। इसी क्रम में उन्होंने हिंदुओं की दुर्दशा की भी चर्चा की और कहा कि इसका कारण हमारे अंदर ही है, उस कारण को ठीक करना है, यही संघ की विचारधारा है। देखा जाए तो यह बात संघ प्रारंभ से ही कहता आया है कि हिंदुओं में जो भी कमियां हैं, उसका कारण हमारे अंदर ही है, वे कमियां मुसलमानों या अंग्रेजों के कारण नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संघ के प्रति मुसलमानों में जो भाव भरा गया है, वह सही नहीं है। संघ अथवा हिंदू बहुसंख्यकता के कारण मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है। ध्यातव्य यह है कि यह बात भी कोई पहली बार नहीं कही गई है। मुसलमानों को मुहम्मदी हिंदू कहने की संघ में काफी पुरानी परंपरा है।

वस्तुत: मोहन भागवत ये सारी बातें मुसलमानों को बता रहे हैं। उनका यह भाषण हिंदुओं के लिए नहीं है, यह बात उनके बाद के वक्तव्यों से स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने कहा कि भारत में इस्लाम आक्रामकों के साथ आया, इसका लंबा इतिहास है और इसके घाव गहरे हैं। फिर उन्होंने कहा कि एकता में बाधा लाने की बात पर हिंदू के खिलाफ हिंदू खड़ा हो जाता है, परंतु ऐसी किसी बात पर मुस्लिम समाज का समझदार नेतृत्व आतताई कार्यों का निषेध करने के लिए सामने नहीं आता।

संवाद को एकता के लिए आवश्यक बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों के लिए संवाद केवल समय लेने का एक तरीका होता है ताकि वे मतांतरण का अपना काम तबतक निर्बाध चला सकें। मोहन भागवत की यह बात एक प्रकार से मुस्लिम समाज के लिए ही थी। उन्होंने संवाद के गलत उपयोग के प्रति लोगों को सावधान किया कि संवाद करने का कोई गलत अर्थ न निकाल ले। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने खिलाफत आंदोलन और उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के बनने की चर्चा की और कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी यह प्रक्रिया जारी है। उन्होंने सेक्युलरवाद तथा हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर इतिहास को छिपाने पर प्रहार करते हुए कहा कि समाज से कटुता को हटाना है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सत्य को छिपा लिया जाए। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि लिंचिंग करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो, परंतु साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि ऐसे नकली मामले भी बनाए जा रहे हैं और इसलिए कौन-सा मामला सही है और कौन-सा गलत यह कहना कठिन है। यह कह कर सरसंघचालक ने लिंचिंग को ही संदेहास्पद साबित कर दिया।

मोहन भागवत जी ने यह समझ लिया था कि उनके इस वक्तव्य की आलोचना होने वाली है, इसलिए उन्होंने अपने भाषण में ही यह कह दिया था कि लोग कहेंगे कि आप भी भोले बन गए। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि इतिहास में हमने बहुत ठोकरें खाई हैं। परंतु उनका कहना था कि इसके भय से पहल करने से पीछे हटना ठीक नहीं। मोहन भागवत का कहना था कि किसी पुस्तक का उद्घाटन करने से हिंदू समाज कमजोर नहीं होगा। इससे भयभीत व्यक्ति संगठन नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि वर्चस्व की लड़ाई छोडऩी होगी। हिंदू नाम से जिनको परहेज हो, वे भारतीय नाम अपना लें, परंतु अपने पूर्वजों और संस्कृति को स्मरण रखें, यह आवश्यक है।

मोहन भागवत का पूरा भाषण एक राजनीतिक तथा रणनीतिक भाषण था। इसमें बहुत सी बातों को घुमावदार तरीके से कहा गया था। उनकी बातों पर समग्रता में तथा प्रसंग का ध्यान रख कर ही विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने जो कुछ भी कहा है, उसमें हिंदू समाज के लिए कम तथा मुस्लिम समाज के लिए अधिक बातें कही गई हैं।

 

रवि शंकर

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