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प्रो. श्याम सुंदर ज्याणी : पर्यावरण संरक्षण का योद्धा

प्रो. श्याम सुंदर ज्याणी : पर्यावरण संरक्षण का योद्धा

श्याम सुन्दर ज्याणी की कहानी आज पूरे विश्वभर में चर्चा का विषय बन गयी है। उनके द्वारा काफी बड़ी संख्या में लगाए गये पौधे अब पेड़ का रूप लेकर उनकी संघर्षशीलता और सफलता की कहानी को बयां कर रहे हैं। भूमि संरक्षण से सम्बंधित संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रदत्त दुनिया का सबसे बड़े सम्मान लैंड फॉर लाइफ के लिए ज्याणी के चयन से उनकी वनीकरण की अनूठी अवधारणा ‘पारिवारिक वानिकी’ के प्रति दुनिया उम्मीद भरी नजर से देख रही है।

श्री गंगानगर जिले की रायसिंहनगर तहसील के गांव १२ टी.के. के मूल निवासी व वर्तमान में बीकानेर के राजकीय डूंगर कॉलेज में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर श्यामसुंदर ज्याणी आज पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थल में पेड़ को परिवार का हिस्सा बनाकर जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाने में कामयाब हुए हैं। ज्याणी के लिए भूमि संरक्षण अभियान की शुरुआत बहुत चुनौतीपूर्ण रही। श्याम सुन्दर ज्याणी मध्यवर्गीय किसान परिवार में पैदा हुए। पारिवारिक जिम्मेदारियों से हटकर अपने देश, समाज, गांव के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देखना एक आम आदमी के लिए बहुत कठिन होता है, और सबसे बड़ी चुनौती थी कि किसी कार्य को करने के लिए संसाधन, सहूलियत, और सहयोग की जो कि उनके पास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था। पर उन्होंने अपने सपने को सपना न बनाकर सच करने की उम्मीदों को हौसला दिया।

महज छोटी सी उम्र से शुरू हुआ अभियान धीरे-धीरे हरित सामाजिक आंदोलन की ओर बढ़ता गया। जब ज्याणी १२ साल के थे उन्होंने एक नीम का पेड़ लगाया था। कुछ समय पश्चात उस नीम के पेड़ मे कीड़ा लग गया। उस पेड़ को बचाने के लिए अनजाने में उन्होंने उसमें काफी मात्रा में कीटनाशक दवा डाल दी। उस समय वह पेड़ काफी बड़ा था। जिसके कारण उस पेड़ की मृत्यु हो गई। उनको इस गलती का बड़ा अफसोस हुआ। उसी समय ज्याणी ने प्रण लिया कि मैं बड़ा होकर यह सीखूंगा की पेड़ कैसे लगाया जाता है, उसकी देखभाल कैसे की जाती है। बल्कि लोगों को मेरे साथ जुडऩे के लिये प्रेरित भी करूंगा। उनका सपना है कि देश के हर एक घर, हर एक गांव में फलदार पेड़ हो। ताकि देश का हर एक नागरिक, हर एक बच्चा उसको अपने भोजन की थाली का हिस्सा बना सके और जब मन करें तब घर में लगे हुए फलदार पेड़ से फल तोड़कर खा लें। इसके साथ पेड़ों के प्रति बच्चों और भविष्य में आने वाली पीढ़ी का प्यार भी बढ़ेगा। फल खाने के लालच में पेड़ों की देख-रेख भी अच्छी तरह से हो जाएगी।

२००३ में ज्याणी का तबादला बीकानेर के राजकीय डूंगर महाविद्यालय में हुआ। महाविद्यालय परिसर में ज्याणी ने कुछ नीम के पेड़ देखे जो कि १५ साल पुराने थे और वे पेड़ सूख रहे थे। उन्होंने अपने विद्यार्थियों के सहयोग से उन पेड़ों की देखभाल की। देखते ही देखते कुछ समय बाद सूखे पेड़ हरे-भरे हो गये। हरे-भरे पेड़ों को देखकर उनके कार्य करने का हौसला और हिम्मत बढ़ गयी। ज्याणी ने पेड़ लगाने की शुरुआत बीकानेर के पास गांव हिम्मतासर से की। उस समय उनकी छोटी सी टीम में करीब २५० से ३०० लोग ही थे। २००६ में ‘पारिवारिक वानिकी’ के नाम से एक विचार विकसित कर सामुदायिक मुहिम चलाई। जिसमें लोगों से मिलकर उन्हें यह समझाना शुरु किया कि पेड़ हमारे लिए कितने जरूरी हैं, अगर इनसे हमारे जीवन की आवश्यकताएं पूरी होती हैं तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हम भी उन्हें जीवन दें। और इन पेड़ों को हम सिर्फ पेड़ ना समझे बल्कि इन्हें परिवार का हरित सदस्य समझकर इनकी देखभाल करें।

इस काम में उनके घरवालों से लेकर उनके स्टूडेंट्स तक, सबने दिल खोलकर साथ निभाया। देखते-देखते रास्ता तैयार हो गया। समय-दर-समय बीतता गया। लोग, परिवार, समाज जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। ज्याणी पिछले दो दशक से लगातार पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने बौद्धिक विचार ‘पारिवारिक वानिकी’ को लेकर काम कर रहे हैं। देखते ही देखते ज्याणी और उनकी टीम ने १५००० से अधिक गांवों के १० लाख से ज्यादा परिवारों को जोड़ते हुए २५ लाख वृक्षारोपण करवा दिया है। ज्याणी के लगाए जंगल आज फेफड़ों का काम कर रहे हैं।

राजकीय डूंगर महाविद्यालय में ही ज्याणी ने ६ हैक्टेयर भूमि पर ३००० पेड़ों का एक जंगल खड़ा कर दिया है जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित पैनल के फार्मूले के अनुसार गणना करने पर आज की तारीख में १ अरब ८ करोड़ रुपए मूल्य की ऑक्सीजन उत्पन्न कर रहा है। इस जंगल के सहारे ज्याणी ने बीकानेर सम्भाग के २०० गांवों में छोटे जंगल खड़े कर दिए हैं, जिनमें १०० से लेकर १००० तक पेड़ हैं। ज्याणी इन्हें संस्थागत वन खंड कहते हैं बकौल ज्याणी यह वनीकरण की नई श्रेणी है जो जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में तो सक्षम है ही साथ ही क्रियात्मक पर्यावरण शिक्षा का बेहतरीन मॉडल है।

शोध पत्रों की मानें तो पता चला भारत में ४ सर्वाधिक कुपोषित राज्य हैं, जिनमें से एक राजस्थान भी है। तो इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सहजन के पेड़ को बढ़ावा देना शुरू किया। जिसमें कई सारे पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं और सहजन को पूरे साल इस्तेमाल में लाया जा सकता है। सहजन के फूल, पत्ते और फल भी बहुत फायदेमंद होते हैं। उन्होंने एक वीडियो बनाया जिसमें सहजन की रोपाई, उसकी देखभाल, उसके फायदे, बताकर लोगों को जागरूक करने की कोशिश की। और राजस्थान के ३३ में से २९ जिलों के लोगों के लिए नि:शुल्क बीज भी उपलब्ध करवाकर शिक्षक संघ शेखावत के सहयोग से १४ लाख सहजन लगवा दिए, इस साल बहुत से अन्य संगठन व शिक्षक संघ प्रगतिशील और युवा भी उनकी घर-घर सहजन मुहिम में साथ आ जुटे हैं।

उनके द्वारा किए गए इन कामों को देखते हुए उन्हें साल २०१२ में राष्ट्रपति अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। श्याम सुंदर कहते हैं कि ‘यह उन सभी लोगों का सम्मान है, जो पेड़ को अपना परिवार मानते हैं। प्रोफेसर ज्याणी इन कामों के लिए किसी और से पैसे नहीं लेते बल्कि अपनी तनख्वाह में से पैसे बचाकर यह काम करते हैं। इन्होंने ‘पर्यावरण पाठशाला’ नाम से यूट्यूब और फेसबुक पर एक पेज भी बना रखा है, जिससे ज्यादा-से-ज्यादा लोग उनसे जुड़ सकें और पर्यावरण के इस काम को बढ़ावा दिया जा सके।

ज्याणी का यह भी कहना है कि पौधों को गमलो में लगाकर घर की सजावट न बनाए। जहां इनकी जरूरत है वहां लगाए और इनकी देखभाल करके प्राकृतिक चीजों को बचाने में हमारा सहयोग दे। जब हम प्रकृति को कुछ देगे तो वह वापस लौटाकर हमे बहुत कुछ देगी। खेत-खेत खेजड़ी के जरिए भूमि को फिर से सेहतमंद बनाने में जुटे ज्याणी के साथ लाखों युवाओं व शिक्षकों की एक पूरी फौज जन पौधशालाएं विकसित कर सामुदायिक स्तर पर वृक्षारोपण को सामाजिक रीति-रिवाजों से जोड़ कर पेड़ के प्रति सोच व समझ में बुनियादी बदलाव ला रही है।

यूएनसीसीडी द्वारा गठित अंतर्राष्ट्रीय निर्णायक मंडल द्वारा गहराई से उन व्यक्तियों एवं संगठनों के कार्यों की समीक्षा करके कुछ नामों को अंतिम तौर पर फाइनलिस्ट के रूप में जारी किया जाता है। वर्ष २०२१ के लिए पूरी दुनिया में से १२ लोगों व संस्थाओं के नाम को फायनालिस्ट के रूप में घोषित किया गया। विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोधी दिवस पर कोस्टा रिका में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में इस वर्ष के पुरस्कार हेतु प्रोफेसर ज्याणी के नाम की घोषणा की गयी। हालांकि इस बार अंतिम १२ नामों में भारत से ज्याणी के अलावा सदगुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन और दुनियाभर में चर्चित उनके कार्यक्रम रैली फॉर रीवर को भी शामिल किया था, लेकिन अंतिम तौर पर ज्याणी के कार्यों को तरजीह देते हुए इस पुरस्कार हेतु चुना गया है।

अगस्त के आखिर में चीन में आयोजित होने वाले विशेष समारोह में इस पुरस्कार से प्रोफेसर ज्याणी को नवाजा जाएगा। पुरस्कार समारोह में प्रो. ज्याणी का विशेष भाषण होगा। अगले साल आयोजित होने वाले (कॉप) यानि कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज, जिसमें दुनिया के १९७ देशों के प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या पर्यावरण मंत्रालय की अगुवाई में हिस्सा लेते हैं। उसमें भी प्रोफेसर ज्याणी को खासतौर से आमंत्रित किया जाएगा। जहां वे उन सभी देशों के प्रतिनिधिमंडलों को यह बताएंगे कि ‘पारिवारिक वानिकी’ के जरिए किस प्रकार से वे परिवार के स्तर पर पर्यावरण संरक्षण व पारिस्थितीकी संतुलन का बुनियादी विचार और संवेदना बोध विकसित करके पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्थानीय समझ व योगदान को बढ़ा रहे हैं। अगले दो वर्षों तक यूएनसीसीडी के अम्बेसेडर के तौर पर दुनियाभर में भूमि संरक्षण के प्रयासों को गति व मजबूती देने में प्रोफेसर ज्याणी की अहम और वैश्विक भूमिका रहेगी।

 

अंकुश मांझू

 

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