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आधुनिक योग के जन्मदाता : पतंजलि

आधुनिक योग के जन्मदाता : पतंजलि

अनादिकाल से इस देश में योग विद्या का प्रचार रहा है। पुराने उपनिषदों में योगविद्या का उल्लेख है और बाद के उपनिषदों में तो यही मुख्य विषय है। पतंजलि ने इन प्राचीन ग्रंथों में बिखरी हुई योगविद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। इसलिए उन्हें योग का जन्मदाता माना जाता है। वर्तमान समय में योग के जिस रूप को प्रसिद्धि मिल रही उसकी वैदिक परंपरा में आधारशिला महर्षि पतंजलि ने रखी थी। अपनी असाधारण कृति ‘योगसूत्र’ में उन्होंने योग के मूल सिद्धांत और व्यवहार-विधान को संहिताबद्ध किया था। भारतीय संस्कृति में पतंजलि कई भूमिकाओं में देखे जाते हैं। वे सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पणिनी के शिष्य थे। वे व्याकरण के विद्वान हैं, संगीतकार हैं, गणितज्ञ हैं और एक खगोलविद् भी हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर पतंजलि को इस देश के महान योगियों में गिना जाता है। योगसूत्र के रचनाकार पतंजलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में चर्चा में थे। पतंजलि के लिखे हुए 3 प्रमुख ग्रंथ मिलते हैं – योगसूत्र, पाणिनी के अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रंथ। पतंजलि को भारत का मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक कहा जाता है। पतंजलि ने योगशास्त्र को पहली बार व्यवस्था दी और उसे चिकित्सा और मनोविज्ञान से जोड़ा। आज दुनियाभर में योग से लोग लाभ पा रहे हैं।

पतंजलि एक महान चिकित्सक थे। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे – अभ्रक, धातु योग और लौहशास्त्र इनकी देन है। पतंजलि संभवत: पुष्यमित्र शुंग (195-142 ई.पू.) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है।

पतंजलि को आमतौर पर आधा आदमी और आधा सांप के रूप में दर्शाया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है। पतंजलि शब्द का अर्थ है, ‘जो अंजलि यानी हथेली में गिरा हो’। पौराणिक कथाएं बताती हैं कि पतंजलि का जन्म गर्भ से नहीं हुआ था, बल्कि वह एक छोटे से सर्प के रूप में एक खूबसूरत कन्या की हथेली पर आसमान से आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि आदिपुरूष हिरण्यगर्भ ने ही मनुष्य जाति के उपकार के लिए उन्हें सबसे पहले इस विद्या का उपदेश किया था। योग दर्शन के टीकाकार वाचस्पति मिश्र ने लिखा है कि पतंजलि ने हिरण्यगर्भ द्वारा उपदिष्ट का ही पुनप्र्रतिपादन किया है।

मूल पतंजलि दर्शन चार पादों या चरणों में विभक्त है। सारा ग्रंथ सूत्र के रूप में लिखा है। कुल सूत्र की संख्या 115 है। चार पादों के नाम उनमें समाहित विषयों के अनुकूल ही हैं। नाम इस प्रकार हैं – 1. समादिपाद 2. साधनापाद 3. विभूति पाद 4. कैवल्य पाद।

पतंजलि के योग को आमतौर पर अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग में महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्तवृत्ति के निरोध का नाम योग है (योगश्चितवृत्तिनिरोध:)। इसकी स्थिति और सिद्धि के निमित्त कतिपय उपाय आवश्यक होते हैं, जिन्हें ‘अंग’ कहते हैं और जो संख्या में आठ माने जाते हैं। अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं। बहिरंग साधना यथार्थ रूप से अनुष्ठित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है। उनकी पुस्तक का नाम है – योगसूत्र। पतंजलि ने मात्र 200 से भी कम सूत्रों में पूरे योगशास्त्र को समेट दिया है। मनुष्य के अंतर्जगत की प्रणालियों के बारे में जो कुछ भी बताया जा सकता था वो सब इन सूत्रों में शामिल है। उनका योग दर्शन पतंजलि दर्शन के तौर पर भी विख्यात है। इस दर्शन की अनेक महत्वपूर्ण व्याख्याएं लिखी गई हैं।PAGE 34-37_Page_2

सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि सूत्र शब्द का असली अर्थ है धागा। किसी हार को आप उसके धागे के लिए नहीं पहनते। आप हार पहनते हैं फूलों का, मनके का या हीरे का या ऐसी ही किसी और चीज का, लेकिन कोई भी हार बिना धागे के नहीं बनता। योगसूत्र ने केवल धागा दिया। जब पतंजलि ने योगसूत्र दिया, तो उन्होंने कोई भी विशेष तरीका नहीं बताया। इसमें कोई भी अभ्यास नहीं बताया गया है। उन्होंने तो बस जरूरी सूत्र दे दिए। अब इन सूत्रों से कैसा हार बनाना है, यह अपने आसपास मौजूद लोगों और परिस्थितियों के आधार पर हर गुरु अपने हिसाब से तय कर सकता है। हर सूत्र के कुछ मायने होंगे, केवल उस आदमी के लिए, जो अपनी चेतना की खोज कर रहा है। पतंजलि के योगसूत्र किसी फार्मूला की तरह हैं। ‘अगर आप सापेक्षवाद के सामान्य सिद्धांत के बारे में नहीं जानते और मैं बोलूं, e=mc2, तो आपके लिए ये तीन अक्षर और एक अंक के अलावा और कुछ नहीं है। इसी तरह योगसूत्रों को कुछ ऐसे लिखा गया था कि यूं ही सरसरी तौर पर पढऩे वाले को इनका कोई मतलब समझ न आए। उन्होंने इन सूत्रों को इस तरह रचा कि ये उन्हीं को समझ आए जिन्हें एक खास स्तर का अनुभव हो, वरना ये शब्दों के ढेर बन कर रह जाते हैं।’

ओशो ने पतंजलि पर कई भाषण दिए हैं। कई खंडो में छपी अपनी योगदर्शन पुस्तक में वे कहते हैं -”पंतजलि बुद्ध-पुरूषों की दुनिया के आइंस्टाईन हैं। वे अद्भुत हैं। वे सरलता से आइंस्टाईन, बोर, मैक्स प्लांक या हेसनबर्ग की तरह नोबल पुरस्कार विजेता हो सकते थे। उनकी अभिवृत्ति और दृष्टि वही है जो किसी परिशुद्ध वैज्ञानिक मन की होती है। कृष्ण कवि हैं, पतंजलि कवि नहीं हैं। पतंजलि नैतिकवादी भी नहीं हैं, जैसे महावीर हैं। पतंजलि बुनियादी तौर पर एक वैज्ञानिक हैं, जो नियमों की भाषा में ही सोचते-विचारते हैं। उन्होंने मनुष्य के अंतर्जगत के निरपेक्ष नियमों का निगमन करके सत्य और मानवीय मानस की चरम कार्य-प्रणाली के विस्तार का अन्वेषण और प्रतिपादन किया है।’’


योग और एक्सरसाइज में बड़ा अंतर है: योगाचार्य दिव्य सुनील


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आज हमारे देश में योग को हठयोग की एक अवस्था आसन और प्रणायम से जोड़कर ही देखा जाता है। अधिकतर योगगुरू इसी तरह के योग का पैकेज बेंच रहे हैं।’’ योगाचार्य दिव्य सुनील ने उदय इंडिया की संवाददाता प्रीति ठाकुर से बातचीत करते हुए यह बात कही। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश –

अंर्तराष्ट्रीय योग दिवस से लोगों की जिंदगी में कैसे बदलाव आयेगा?

अन्र्तराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि इसे 177 देशों ने स्पोर्ट किया है। योग के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ गई है और 21 जून तक और बढ़ जाएगी। जो लोग आसन और प्राणायाम तक योग को समझ रहे थे उनकी आकांक्षा उसकी गहराई तक पहुंचने की होगी। 177 देशों में से एक देश हमारा भारत भी है जहां योग की उत्पत्ति हुई है। कुछ देश तो बाहर के ऐसे भी हैं जिन्होंने योग पर बहुत अधिक शोध किया है। ऐसे देशों की जिज्ञासा हमेशा भारत में बनी रहती है। जब वहां के लोग यहां आयेंगे, यहां पर अपना काम शुरू करेंगे तो एक तो यहां के लोगों को रोजगार मिलेगा, टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा और योग को दुनिया में प्रसार भी होगा।

योग दिवस घोषित करने से क्या योग का भारत में एक बार फिर से बोल-बाला होगा, जैसा कि प्राचीन काल में था?

उसमें समय लगेगा, क्योंकि हमारे देश में योग कि स्थिति थोड़ी-सी विकृत हो गई है। आज हमारे देश में योग को हठयोग कीएक अवस्था, आसन और प्राणायाम से जोड़कर ही देखा जाता है। अधिकतर योगगुरू इसी तरह के योग का पैकेज बेच रहे हैं। कोई हठयोग के नाम से तो कोई डायनामिक योग के नाम से इसे बेच रहा है। योग के और भी अंग हैं। शुद्धिकरण, आसन, प्राणायाम, बंध और मुद्राएं – इन पांचों को अपने जीवन में ढालते हैं तब हठयोग पूर्ण होता है। हठयोग से शरीर स्वस्थ रहता है। मन की शांति के लिए राजयोग की तरफ जाना चाहिए, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, समाधि आदि हैं। तीसरा स्तर आता है भावनात्मक भक्तियोग के तहत मंत्रयोग से अपने आप को मजबूत बनाते हैं।

एक्सरसाइज और योग में क्या फर्क है?

अगर एक्सरसाइज को योग से न जोड़कर हम आसन से जोड़ें तो इसे बड़ी सरलता से समझाया जा सकता है। आसन और एक्सरसाइज में सबसे बड़ा अंतर यह है कि जब हम आसन करते हैं तो उसके दो कॉन्सेप्ट हैं – स्ट्रेच और रिलेक्स। जब हम स्ट्रेच करते हैं तो किसी एक आसन में पार्टिकुलर एंगल पर बॉडी को होल्ड करते हैं। एक्सरसाइज से हम सिर्फ एक बॉडी पार्ट पर फोकस करते हैं। इसलिए एक्सरसाइज से हिलिंग हो जाए यह संभव नहीं है। एक्सरसाइज से सिर्फ मसल्स और बॉडी पर असर होता है। योग से इन दोनों के साथ-साथ मन पर भी प्रभाव पड़ता है और रोग भी दूर होते हैं।

क्या योग हिंदू धर्म से जुड़ा है? हिंदुत्व को बढ़ावा देने की कोशिश है योग को बढ़ावा देना?

यह सही नहीं है। योग जहां से उपजा है अगर उसकी गहराई में जाएं तो देव माने या उसके लिए किसी ऋषि को माने तो वहां हिंदुत्व शब्द की चर्चा ही नहीं है। हिंदुत्व तो कुछ समय बाद की उत्पत्ति है। योग कि उत्पत्ति एक शोध है। उन ऋषियों ने जिन्हें पता ही नहीं था कि वो हिंदू हैं, सिक्ख हैं या मुस्लमान हैं, उन्होंने इन आसनों को बनाया। ऐसे में योग को हिंदुत्व से जोडऩा बेवकूफी होगी। योग समाज के कल्याण के लिए है।

वो कहते हैं – ”यदि तुम पतंजलि का अनुगमन करो तो तुम पाओगे कि वे गणित के फार्मूले जैसी ही सटीक बात कहते हैं। तुम वैसा करो जैसा वे कहते हैं और परिणाम निकलेगा ही, ठीक दो और दो चार की तरह। यह घटना उसी तरह निश्चित ढंग से घटेगी जैसे पानी को सौ डिग्री तक गर्म करें तो वाष्प बनकर उड़ जाता है। किसी विश्वास की कोई जरूरत नहीं है। बस, तुम उसे करो और जानो। यह कुछ ऐसा है जिसे करके ही जाना जा सकता है। इसलिए मैं कहता हूं कि पतंजलि बेजोड़ हैं। इस पृथ्वी पर पतंजलि जैसा दूसरा कोई नहीं हुआ। वे कविता का प्रयोग नहीं करते। वे एक भी काव्यात्मक प्रतीक का उपयोग नहीं करते। कविता से उन्हें कोई सरोकार ही नहीं। वे सौंदर्य की भाषा में बात ही नहीं करते। वे गणित की भाषा में बात करते हैं। वे संक्षिप्त होंगे और तुम्हें कुछ सूत्र देंगे। वे सूत्र संकेत मात्र हैं कि क्या करना है। वे आनंदातिरेक में फूट नहीं पड़ते। वे ऐसा कुछ भी कहने का प्रयास नहीं करते, जिसे शब्दों में कहा न जा सके। वे असंभव के लिए प्रयत्न ही नहीं करते। वे तो बस नींव बना देंगे और यदि तुम उस नींव का आधार लेकर चल पड़े, तो उस शिखर पर पहुंच जाओगे जो अभी सबके परे है। वे बड़े कठोर गणितज्ञ हैं, यह बात ध्यान में रखना।’’

पतंजलि सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं अंतर्जगत के। उनकी पहुंच एक वैज्ञानिक मन की है। वे कोई कवि नहीं हैं। और इस ढंग से वे बहुत विरले हैं। क्योंकि जो लोग अंतर्जगत में प्रवेश करते हैं वे प्राय: कवि ही होते हंै। जो बहिर्जगत में प्रवेश करते हैं, अक्सर हमेशा वैज्ञानिक होते हैं। पतंजलि एक दुर्लभ पुष्प हैं। उनके पास वैज्ञानिक मस्तिष्क है, लेकिन उनकी यात्रा भीतरी है। इसलिए वे पहले और अंतिम वचन बन गए। वे ही आरंभ हंै और वे ही अंत हैं। पांच हजार साल में कोई उनसे ज्यादा उन्नत हुआ ही नहीं। वे अंतिम वचन ही रहेंगे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना और आंतरिक जगत में प्रवेश करना करीब-करीब असंभव है। वे एक गणितज्ञ, एक तर्कशास्त्री की भांति बात करते हैं।

(सतीश पेडणेकर)



अगर न्यूटन के गुरूत्वार्षण कानियम क्रिश्चियन है तो पतंजलि का योग भी हिंदू है: काजल ठाकुर


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संभवी योग स्टूडियो की संस्थापक काजल ठाकुर के मुताबिक योग से जीवन में शांति मिल सकती है। इनसे उदय इंडिया के संवाददाता संजय कुमार बिषोयी ने बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत के मुख्य अंश :

21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग घोषित किया गया है। यह किस तरह का संदेश हैं?

योग को कुछ लोग हिंदुत्व में पिछले दरवाजे से प्रवेश का तरीका समझ रहे हैं। पश्चिमी लोग योग को सिर्फ शारीरिक क्रिया समझते हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित करने के बाद लोगों की ये गलत धारण दूर हो जाएगी।

योग भारत भूमि की देन है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि प्रधानमंत्री मोदी सारा श्रेय ले रहे हैं?

मैं मोदी का प्रशंसक नहीं हूं। दुर्भाग्य से आज तक किसी ने भी इस तरह की कोशिश नहीं की थी, जैसी मोदीजी ने की है। मोदी जी ने जिस तरह से वैश्विक स्तर पर योग को बढ़ावा दिया है वह काफी प्रशंसनीय है।

योग दिवस के रूप में कहीं योग का राजनीतिकरण तो नहीं हो रहा है?

कुछ कट्टरपंथी लोगों ने योग को सांप्रदायिक रूप दे दिया है, लेकिन हमें योग के सकारात्मक पहलू को ध्यान में रखना होगा। संयुक्त राष्ट्र ने कभी राम दिवस या कृष्ण दिवस या यीशु दिवस घोषित नहीं किया। योग से जुड़ी किसी भी तरह के राजनीतिक या धार्मिक विचारों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

क्या योग का संबंध हिंदुत्व से है?

हिंदू शब्द एक भौगोलिक क्षेत्र से संबंधित है। जो भी हिंदुस्तान से संबंध रखता है उसे हिंदू के रूप में जाना जाता है। अगर एक चींटी हिंदुस्तान में पैदा हुई है तो वह हिंदू है और अगर उसी वक्त एक हाथी अफ्रीका में पैदा हुआ है तो वो अफ्रीकन हो गया। अगर न्यूटन के गुरूत्कार्षण कानियम क्रिश्चियन है तो पतांजलि का योग भी हिंदू है।

योग के जरिए किसी के विश्वास को ठेस पहुंचाने की कोशिश बताई जा रही है…

योग का मतलब मिलाना है। योग के माध्यम से पूरी दुनिया एकजुट हो सकेगी। यह दर्शन और विज्ञान दोनों है। यह किसी खास धर्म या जाति से जुड़े लोगों के लिए नहीं है।

हम योग को क्यों भूल गए? हमारे स्कूलों में शरीरिक प्रशिक्षण तो दिया जाता है, लेकिन योग का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। ऐसा क्यों?

हमें इतिहास की बात को छोड़ देना चाहिए। वर्तमान की चिंता करनी चाहिए कि आगे क्या करना है। लोगों में योग के अभ्यास की भावना पैदा करने का वक्त आ चुका है। योग के माध्यम से हमारे बीच राष्ट्रीयता की भावना पैदा होगी। इसके अलावा योग से संपूर्ण मानव समाज मानसिक और शारीरिक व्याधियों से मुक्त होगा।


अगर योग का अभ्यास व्यापक हो जाए तो संप्रदायवाद दूर हो सकता है: योगाचार्य शिवचित्तम


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हमारा शरीर एक सुपर नेचुरल कंप्यूटर है। उसे योग के माध्यम से पूरी तरह से जागृत किया जा सकता है। योगाचार्य शिवचित्तम के अनुसार योग को धर्म के साथ नहीं जोडऩा चाहिए। योगाचार्य की उदय इंडिया के संवाददाता संजय कुमार बिषोयी के साथ बातचीत के मुख्य अंश:

21 जून को योग दिवस घोषित किया है क्या सोचते हैं आप इस बारे में?

स्पष्ट है कि दुनिया को इसके लिए तैयार किया जा रहा है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं देखा गया कि 177 देशों ने एक साथ किसी भी बात पर अपनी सहमति जताई हो (या कह लें कि भारत द्वारा प्रयोजित किसी भी प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र ने निर्विरोध अपनाया हो)। 177 देशों के एक साथ सहमत होने से पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सही विचार का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश किया है।

हमारे समय में योग की प्रासंगिकता क्या है?

हमारा शरीर है एक सुपर कंप्यूटर है, लेकिन क्या हम इसका मैनुअल पढ़ सकते हैं? आध्यात्मिकता से जुडऩे का मतलब है कि हम उपयोगकत्र्ताओं को मैनुअली पढऩा सिख सकते हैं और यह योग से ही संभव है।

क्या हम दुनिया को अपनी विरासत का महत्व समझा पाने में सफल हो पाएंगे?

हम लोगों को यह समझाने में विफल हो गए हैं कि हमारा देश मात्र भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि एक आदर्श विचार है जो लोगों के दिल और दिमाग में रहना चाहिए। मैं राष्ट्र के रूप में भारत की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि सर्वभौमिकता के बाद राष्ट्रीयता का दूसरा स्थान है।

योग को अनिवार्य करना क्या मौलिक अधिकारों को उल्लंघन नहीं है?

हमारे देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या कुपोषण की शिकार है। इस वक्त ये बहस बहुत कष्टकारी है। क्या गरीबी से बाहर निकलना मौलिक अधिकार में शामिल नहीं है?

कुछ मुस्लिम नेता योग को अनिवार्य किए जाने पर आपत्ति जता रहे हैं? क्या कहेंगे?

कुछ ऐसे मुस्लिम नेता हैं जिन्हें उनके ही समुदाय के लोग नहीं पूछते। जब उनका समुदाय ही उनकी परवाह नहीं करता तो हम उनकी परवाह क्यों करें…

क्या भाजपा योग का राजनीतिकरण करने की कोशिश नहीं कर रही है?

कुछ छोटे गुट ऐसा करने की कोशिश कर रहे होंगे, लेकिन अगर योग का अभ्यास व्यापक हो जाए तो संप्रदायवाद दूर हो सकता है। हर चीज को भगवान से जोड़कर देखना भी मानवता को विभाजित करता है, लेकिन भगवान से अलग हो जाना भी मानवता के लिए एक खतरा है।

क्या योग के नाम पर भगवान का राजनीतिकरण नहीं है?

हमारी भूमि पर भगवान की कोई परिकल्पना नहीं थी। यह एक अनीश्वरवादी देश था। यह वह भूमि है जहां सभी भगवान पैदा हुए, यानि यह देवभूमि है। यहां सभी भगवान पैदा हुए हैं। उन्होंने शादी की, बच्चे हुए, आम लोगों की तरह ही अपनी जिंदगी गुजारी। लेकिन उनके सतकर्म थे, जिनकी वजह से हम उन्हें देव मानते हैं। इस देश में ईश्वर शब्द आयात किया हुआ हैं। जैसे आज के युग में क्रिकेट का भगवान सचिन तेंदुलकर हैं, वैसे ही उस वक्त के भगवान राम, कृष्ण और शिव हुए।


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