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दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा का गहराता संकट

दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा का गहराता संकट

हाल में संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने ‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी न्यूट्रिशन इन द वल्र्ड-2021’ शीर्षक वाली एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें भोजन के सेवन और कुपोषण पर कोविड-19 महामारी से प्रेरित आय में हानि के प्रभाव का अध्ययन किया है। इसमें दर्शाया गया है कि खाद्य सुरक्षा पर कोविड-19 का प्रभाव विकासशील और अविकसित दुनिया पर अधिक पड़ा हैं। इसके अलावा उन देशों पर खाद्य सुरक्षा का संकट मंडराने लगा है, जिसने महामारी से निपटने में सफलता जरूर अर्जित की लेकिन अन्य जलवायु संबंधी आपदाओं और आर्थिक मंदी के दौर ने बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई। रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की आधे से अधिक कुपोषित आबादी एशिया में पाई जाती है। जबकि एक-तिहाई से अधिक कुपोषित  आबादी अफ्रीका में निवास कर रही है। गौरतलब है कि वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2020 में अफ्रीका में करीबन 46 मिलियन से अधिक, एशिया में 57 मिलियन से अधिक और लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियन में करीब 14 मिलियन से अधिक लोग भूख से प्रभावित थे। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा जारी वैश्विक खाद्य नीति रिपोर्ट-2021 से साफ जाहिर होता है कि बढ़ती गरीबी और घटती आजीविका का प्रभाव खाद्य असुरक्षा तथा आहार की गुणवत्ता पर पड़ा है।

बता दें कि वैश्विक स्तर पर गरीबी उन्मूलन और भूखमरी की समस्या से निपटने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। जिसमें वैश्विक स्तर पर वर्ष 2030 तक सतत् विकास लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन एसडीजी-1 और भूख एसडीजी-2 को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। मौजूदा हालातों के मद्देनजर 2030 तक गरीबी उन्मूलन और भूखमरी से बड़ी आबादी को बाहर निकालने में कोई बड़ी सफलता हाथ लग जाएगी, ऐसा बिल्कुल भी प्रतीत नहीं होता। रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों तक अपरिवर्तित रहने के बाद अल्पपोषण की व्यापकता में महज एक वर्ष के भीतर 1.5 फीसद का इजाफा हुआ है। वहीं 2019 की तुलना में वर्ष 2020 में लगभग 11.8 करोड़ अधिक लोगों को भूख का सामना करना पड़ा, जो कि करीब 18 फीसद की वृद्धि को दर्शाता है। मौजूदा कोविड-19 संक्रमण के इस दौर में लोगों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आय में कमी के कारण भोजन जुटाने के लिए लोगों के सामर्थ्य में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। दुनिया में लगभग तीन में से एक व्यक्ति के पास वर्ष 2020 में पर्याप्त भोजन नहीं था। जहां तक इस आबादी का सवाल है तो लगभग 3 बिलियन लोगों को भोजन मयस्सर नहीं हो रहा है। यदि हम इसके पीछे बड़े कारणों की बात करें तो खाद्य प्रणालियों को प्रभावित करने वाले बाहरी कारक और आंतरिक कारक पौष्टिक खाद्य पदार्थों की लागत बढ़ा रहे हैं, जिसके चलते गरीब और मध्यम वर्ग की स्वच्छ भोजन तक पहुंच नहीं बन पा रही हैं। रिपोर्ट से यह तथ्य भी उभरकर सामने आया है कि पुरूषों और महिलाओं के बीच भोजन की पहुंच में काफी अंतर है। जहां वर्ष 2020 में खाद्य-सुरक्षा के मामले में प्रत्येक 10 पुरूषों की अपेक्षा 11 महिलाएं असुरक्षित थीं, जबकि वर्ष 2019 में यह आंकड़ा 10.6 से अधिक था।

अब बड़ा सवाल कि आखिर दुनिया की इतनी बड़ी आबादी को भुखमरी और गरीबी से बाहर कैसे निकाला जाए? दुनिया की बड़ी आबादी को भुखमरी से बाहर निकालने के लिए भागीरथ प्रयासों की सख्त दरकार हैं। इन प्रयासों में सामाजिक सुरक्षा उपायों को अपनाकर भुखमरी और गरीबी उन्मूलन की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं। सतत विकास और प्रगति के रथ में नीतियों का निर्माण इस रूप में किया जाए कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग को संबल मिले। जलवायु परिवर्तन और बदलते पारिस्थितिकी मिजाज को भांपते हुए ऐसे प्रयासों को बल दिया जाना चाहिए जिससे कि कमजोर वर्ग के लोगों को मजबूती प्रदान की जा सके। इसके अलावा खाद्य प्रणालियों को दुरुस्त किया जाए। पौष्टिक खाद्य पदार्थों की लागत को कम करने के लिए आपूर्ति श्रंखलाओं में सुधार किया जाए। खाद्य सुरक्षा से संबंधी संरचनात्मक असमानताओं से निपटने के लिए प्रयास करने होंगे ताकि आम आदमी तक खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। खाद्य प्रणाली को मजबूती प्रदान करने के लिए पूरी दुनिया को एक छत्रछाया के नीचे आना होगा, तब जाकर दुनिया से कुपोषण और भूखमरी की समस्याओं से निजात संभव हैं।

जैसा कि मकान, कपड़ा और भोजन ये तीनों मानव की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। मनुष्य अपने जन्म के साथ ही उक्त तीनों मूलभूत आवश्यकताएं महसूस करता आया हैं। मनुष्य अपने स्थाई निवास व सुरक्षा के लिए मकान की आवश्यकता महसूस करता है, साथ ही समाज में रहने के लिए कपड़ों की जरूरत भी समझता है तथा अपने जीवन की तीसरी और महत्वपूर्ण मूलभूत आवश्यकता भोजन के महत्व को बखूबी जानता है। भोजन के बिना मनुष्य अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भोजन का अभिप्राय अनाज, जल और वह सब कुछ जो खाने योग्य है। भोजन मनुष्य की वह प्राथमिकता है जिससे कि वह सभी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य के लिए आवश्यक भी समझता है। मौजूदा कोविड-19 संक्रमण के इस दौर में बेकारी, भूखमरी और गरीबी में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। मौजूदा वक्त में कोरोना के कहर के चलते लोगों के रोजगार छिन चुके हैं, परिणामस्वरूप बेकारी बढ़ी है।

आइए हम जानते हैं कि खाद्य सुरक्षा से क्या अभिप्राय है? सुरक्षा का अर्थ है मनुष्य की भोजन संबंधी आवश्यकताएं, जो घरेलू मांगों की पूर्ति करती हो साथ ही सस्ती दरों में उपलब्ध भी हो। यदि हम खाद्य सुरक्षा के उन तीन महत्त्वपूर्ण आयामों के बारे में बात करें तो इसमें भोजन की उपलब्धता, भोजन की पहुंच और भोजन का उपयोग को शामिल किया जा सकता हैं। यदि हम भारत के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो हमारे यहां भोजन की उपलब्धता और पहुंच को सुनिश्चित करने के पीछे कई सारी दुश्वारियां हैं। जैसे कि हर साल देश के किसी न किसी क्षेत्र में बाढ़ का मुंह बाए खड़े मिलना, इसके अलावा सूखे और अकाल की समस्या भी भोजन की उपलब्धता में दिक्कतें पैदा करती हैं। इसके साथ-साथ लोगों की कमजोर आर्थिक स्थिति भी उनकी खाद्यान्न तक पहुंच के बीच में गहरी खाई का कार्य करती है। वहीं भारत के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा और पोषण अवस्था संबंधी रिपोर्ट के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं।

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत, दुनिया में सबसे बड़ी खाद्य असुरक्षित आबादी वाला देश बनकर उभरा है। यह रिपोर्ट खाद्य और कृषि संगठन तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से जारी की गई है। इस रिपोर्ट के अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014 से 2019 तक खाद्य असुरक्षित आबादी में 3.8 फीसदी वृद्धि हुई है यानी वर्ष 2014 के मुकाबले वर्ष 2019 तक 6.2 करोड़ अन्य लोग खाद्य असुरक्षित आबादी में शामिल हो गए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-16 में भारत की 27.8 प्रतिशत आबादी मध्यम और गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में थी, जबकि वर्ष 2017-19 में यह अनुपात बढ़कर 31.6 प्रतिशत हो गया है। यदि हम खाद्य असुरक्षित आबादी की संख्या की बात करें तो वर्ष 2014-16 में 42.65 करोड़ थी, जबकि अब बढ़कर वर्ष 2017-19 में 48.86 करोड़ हो गई हैं। यहां आबादी के मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा की बात कही गई है। जहां मध्यम स्तरीय खाद्य असुरक्षा से अभिप्राय लोगों की खाद्य तक अनियमित पहुंच से है, जबकि गंभीर स्तरीय खाद्य असुरक्षा से अभिप्राय पर्याप्त मात्रा में भोजन की उपलब्धता न होने या उससे वंचित होने से है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 14.8 प्रतिशत आबादी कुपोषित है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2019 में सर्वाधिक कुपोषित लोग भारत में मौजूद थे।

भारत में खाद्य सुरक्षा का खतरा मंडराने के साथ-साथ आबादी के कुपोषित  होते ग्राफ में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी देखी जा रही है। वर्ष 2018-20 के दरम्यान भारत में कुल आबादी के बीच कुपोषण का प्रसार 15.3 फीसद था, जो कि इसी अवधि के दौरान वैश्विक औसत 8.9 फीसद की तुलना में काफी खराब प्रदर्शन है। वहीं भारत में वयस्क आबादी में मोटापे के मामले 2012 के 3 फीसद से बढ़कर 2016 में 3.9 फीसद हो गए हैं। इस प्रकार से आंकड़े यही दर्शाते हैं कि भारत की बहुत बड़ी आबादी आज भी कुपोषण का शिकार है और भुखमरी की समस्या से गुजर रही है। आजादी के बाद से ही भारत पर खाद्य-संकट मंडराया हुआ था। भारत में 1960 दशक के अंत तक आते-आते खाद्य संकट अपना विकराल रूप धारण करने लगा। ऐसे में एक ऐसी क्रांति की आवश्यकता महसूस हुई, जो देश को खाद्य संकट से उबार सके। देश में खाद्य उत्पादन में सुधार के लिए हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ। इस क्रांति ने भारत को न केवल खाद्य संकट से उबारा बल्कि देश को गेहूं व चावल के निर्यात की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। आज देश को आत्मनिर्भर बनाने की बात की जा रही है। यदि देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है, तो जरूरी है कि कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किए जाए। इसके बिना आत्मनिर्भरता संभव नहीं है। सरकार ने सभी वर्गों तक भोजन की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए 1995 में, स्कूली बच्चों के लिए ‘मिड डे मील-योजना’ 2000 में, गरीबों के लिए ‘अंत्योदय योजना’ और 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कई प्रयास किये। जो वाकई सराहनीय है। लेकिन ऐसे लगातार प्रयासों की सख्त दरकार हैं। गौरतलब है कि भूखमरी और गरीबी उन्मूलन के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं जिसमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, वन नेशन वन राशन कार्ड योजना, आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना, प्रधानमंत्री मंत्री किसान सम्मान निधि और सघन मिशन इंद्रधनुष 3.0 योजना चलाई जा रही है। बस जरूरत इस बात की है कि ऐसे प्रयास सतत रूप में किए जाए और जमीनी हकीकत में सामने भी आने चाहिए। तब जाकर कहीं देश की बड़ी आबादी को कुपोषित जीवन और भूखमरी से बाहर निकाला जा सकेगा।

मौजूदा कोविड-19 संक्रमण के इस दौर में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने आगाह किया है कि विश्व की 7 अरब 80 करोड़ आबादी का पेट भरने के लिए दुनिया में भोजन उपलब्ध है। लेकिन इसके बावजूद 82 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी का शिकार है। इस बीच ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस वर्ष कोविड-19 संकट के कारण 4 करोड़ 90 लाख अतिरिक्त लोग अत्यधिक गरीबी का शिकार हो सकते हैं। जो कि वाकई बेहद चिंताजनक है।

 

अली खान

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