ब्रेकिंग न्यूज़ 

संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता और अहमियत

संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता और अहमियत

विशद चर्चा आगे करेंगे। पहले एक अनजाना किस्सा। अमिताभ बच्चन के पैर जब बॉलीवुड में जमने लगे तब उन्होंने अपने पिताश्री डॉ. हरिवंशराय बच्चन, जो हिंदी, और अंग्रेजी साहित्य के बेजोड़ विद्वान थे, से पूछा, बताइए बाबूजी अब आप मुझसे क्या चाहते हैं? डॉ. बच्चन उस समय नई दिल्ली शिफ्ट हो चुके थे। उन्होंने अमिताभ से कहा मैं अब तुम्हारे साथ ही रहना चाहता हूं। कोविड 19 के अल्प प्रलय ने सम्पूर्ण भारतीय समाज को संयुक्त परिवार की उक्त पुरातन प्रथा की अहमियत का सबक सिखाया है। भौतिकता कहिए या देखादेखी के कारण हम अपनी मूल जड़ों से ही उखडऩे लगे थे, इन्हीं में से एक है संयुक्त परिवार की प्रणाली।

कोरोना के कारण अब हमें इस प्रथा की अनिवार्यता अब पुन: महसूस होने लगी है। कोरोना काल में संयुक्त परिवार की अहमियत को लेकर गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने एक सर्वेक्षण किया। जून महीने के उतरार्द्ध में हुए इस सर्वे में 2000 लोगों को शामिल किया गया था। इन सभी से टेलीफोन पर सवाल पूछा गया, कि पिछले डेढ़ साल में उक्त महामारी के दौरान उन्हें सबसे अधिक कमी किस बात की खली। इन सभी में से लगभग 700 प्रतिभागियों ने जो जवाब दिया वो चौंकाने वाला ही नहीं, बल्कि करीब एक जैसा था। इन लोगों ने माना, कि हम संयुक्त परिवार में रहकर पहले से बेहतर महसूस कर रहें है, और संक्रमण की आतंकित करने वाली खबरों के बीच  हम लोगों में बुरे से बुरे हालात का सामना करने का हौसला बढ़ा है। हमारी जीजिविषा में भी मार्केबल वृद्धि हुई है। जान लें कि यह सकारात्मक दृष्टिकोण तब पनप रहा है, जब केन्द्र सरकार का नीति आयोग साफ शब्दों में सतर्क कर चुका है कि कोरोना की तीसरी  लहर सितम्बर या अक्टूबर तक आ धमके तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

विज्ञान, और चिकित्सा शास्त्र के कई नामचीन लोगों को आशंका है कि तीसरा प्रहार ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इस तरह की स्थिति में संयुक्त परिवार प्रथा की वापसी से उपजे आत्मविश्वास से निश्चित रूप से कोविड के एक और प्रकोप पर अंकुश लग सकता है मध्य प्रदेश के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर दीपक मंशा रमानी का कहना है कि संयुक्त परिवार के कारण लोगो को बेकार के तनाव, अवसाद, चिंता, अकेलपन से भी निजात मिली। इस संदर्भ में अमेरिकी मनोविश्लेषक डेल कारनेगी ने सालों पहले एक विश्व प्रसिद्ध किताब लिखी थी। पुस्तक का टाइटल है, चिंता छोड़ो, सुख से जिओ। किताब में बार- बार कहा गया है, कि कुछ लाइलाज बीमारियों को छोड़ दें तो जानने को मिल सकता है, कि तमाम अन्य बीमारियों के मूल में कहीं अवसाद, कहीं चिंता, कहीं अकेलापन, कहीं कुछ अन्य मनोविकार होते हैं।

नई दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया तक कह चुके हैं, कि कोरोना के दूसरे प्रहार के दौरान हालात काबू से इसलिए बाहर जा रहे थे कि लोग जरा सी बात में चिंतित हो रहे थे, आतंकित हो रहे थे, और भागादौड़ी कर रहे थे। मौत से बढ़कर होता है मौत का डर। अब यदि पुरातन संयुक्त परिवार प्रथा की समाज मे जगह बन रही तो इसे कोरोना के विरूद्ध उम्मीदों भरा आकाश भी कहा जा सकता है।

संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी खासियत यह है, कि यह हमें प्रारम्भ से कड़े अनुशासन की नसीहत देती है। कोरोना काल में जो लोग घरों से दूर रहे, वे लोग कोविड डिसिप्लिन को भूल गए। ये यदि माता-पिता, भाई-बहन, कुछ अन्य रिश्तेदार  पति-पत्नी, और बच्चों के साथ रहते, तो महामारी के जरिए आए अल्प प्रलय पर बड़ा अंकुश लगाया जा सकता था। कोरोना के पहले भी प्लेग, स्पेनिश फ्लू, पोलियो, एड्स जैसी महामारी का रूप रखने वाली बीमारियों ने सम्पूर्ण मानव सभ्यता, और पृथ्वी पर स्थित अन्य सभी जीव जंतुओं के सफाए का अलार्म बजा दिया था, लेकिन आदमी की बुद्धि, विवेक के कारण उक्त लगभग सभी बीमारियां सालो पहले दफा हो चुकी हैं। तब भारत में संयुक्त परिवार प्रथा ही अंगीकृत की गई थी। इस बेहद मुश्किल भरे दौर में जब लोग महीनों घरों में कैद रहे तो सोचने लगे कि जीवन दूभर हो जाएगा।

भारत में 365 दिन ही कोई-न-कोई तीज त्यौहार मनते हैं, और वैसी भी एरिस्टोटल उर्फ अरस्तू, जो यूनानी दार्शनिक थे, ने सदियों पहले मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी बता दिया था। कोरोना काल ने संयुक्त परिवार को ही भले छोटे से समाज में परिवर्तित कर दिया है, जिसमें अपने पराए सब एक हो गए हैं। जो वर्ग नोकरी के लिए संयुक्त परिवार से विलग होकर एकल परिवार का आदी हो गया था और बाहर जा बसा था वह वर्क फ्रॉम होम के चलते पत्नी बाल-बच्चों के साथ रहने लगा, लेकिन जल्दी ही उसे ऊबन, एकरसता, आदि नेगेटिव भावनाओं के घेर लिया। यह बदलाव सही भी था, क्योंकि ऑफिस जैसा दोस्त, यारों का माहौल कहां? रोज कायदे से ऑफिस जाना, बॉस से विचार विर्मश, उनकी बॉडी लैग्वेंज से भी सीखते रहने की थ्रिलिंग। एक सालों से चली आ रही कार्य पद्धति से छुटकारा इतनी जल्दी सम्भव न था, लेकिन यह भी नैसर्गिक सत्य है, कि जब जिंदगी निगेटिविटी के अंतिम चरण के पार होने को होती है, तो वहीं से कहीं पॉजिविटी की शुरुआत होने लगती हैं।

जूम मीटिंग, कॉल मीटिंग या डिजिटल मीटिंग ने,जो जूनियर  सीनियर बंदा जहां है उसे, वही से उसे मुख्यालय से 24 घण्टों के लिए जोड़ दिया है। सम्पूर्ण भारतीय समाज का कोरोना के बाद जो सर्वे किया गया है, उसमें से तीस प्रतिशत संयुक्त परिवार की अवधारणा के कारण प्रसन्न्ता महसूस करने लगे हैं, बीस प्रतिशत तनाव से दूर हुए हैं, पन्द्रह प्रतिशत कोविड के डर, दहशत, आतंक से दूर हो गए हैं और 35 प्रतिशत में पर कुल मिलाकर घुल-मिलकर रहने की इच्छा बलवती होने लगी है। संयुक्त परिवार की अवधारणा लौटने के पहले बुढ़ापा कांपने लगा था, बच्चों की सपनों की दुनिया कहीं खो गई थी, लेकिन अब एक संयुक्त परिवार एक सम्पूर्ण समाज है। इस तरह का परिवार एक छत के नीचे रहकर एक रसोईघर से एक ही तरह का भोजन करता है। उनका धर्म, पूजा पद्धति, आर्थिक समन्वय लगभग समान रहता है। इसीलिए आड़े वक्त अर्थ के लिए पड़ोसी या दूसरों का मुंह नहीं देखना पड़ता। संयुक्त परिवार मानव सभ्यता की अनूठी देन है। प्यार का और ज्यादा प्यारा अनुवाद संयुक्त परिवार प्रथा है।

देश के जाने माने मनोविश्लेषक डॉ. आशुतोष तिवारी का कहना है कि संयुक्त परिवार के तहत आय, और उसके उचित उपयोग के बीच संतुलन अच्छे से कायम किया जा सकता है। उक्त प्रथा मानवीय संवेदना को विकसित करती है। आपसी जुड़ाव मजबूत होता है। डॉ. तिवारी कहते हैं कोविड के व्यापक दुष्प्रभावों ने संयुक्त परिवार के मर्म, और जरूरत को ज्यादा प्रांसगिक बना दिया है। अंत में जानना आवश्यक है कि संयुक्त परिवार की सीधी सादी परिकल्पना या परिभाषा क्या है। दरअसल, इस प्रणाली में तीन से चार छोटे परिवार एक समूह में रहते हैं। इस अनूठे संग्रह में माता-पिता के अलावा, चाचा-चाची, उनके बच्चे, लड़कों की पत्नियां, बुआ आदि रहते हैं, जिनकी संख्या कभी 15 के पार तक हुआ करती थी।

नवीन जैन

Leave a Reply

Your email address will not be published.