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गोरखनाथ हठयोग के प्रवर्तक

गोरखनाथ हठयोग के प्रवर्तक

हम बचपन में एक कहानी सुनते थे। नाथपंथ के आचार्य गोरखनाथ बकुल के वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बैठे हुए थे। उधर उनके मित्र कनपा ठीक उनके सिर के ऊपर से उड़ते हुए आकाश मार्ग से कहीं जा रहे थे। छाया देखकर गोरखनाथ ने सिर ऊपर उठाया और क्रोधवश अपना खड़ाऊ फेंका। खड़ाऊ कनपा को पकड़कर नीचे ले आई। तब कनपा ने व्यंग्य करते हुए कहा, कि बड़े सिद्ध बनते हो कुछ गुरू का भी पता है कि वे कहां हैं। कदली देश में महाज्ञान भूलकर स्त्रियों के साथ विहार कर रहे हैं। उनकी शक्ति समाप्त हो गई है। गोरखनाथ ने कहा मुझे तो समझा रहे हो कुछ अपने गुरू की भी खबर है? मेहर कुल की महाज्ञानशील रानी मैनावती के पुत्र गोपीचंद ने उन्हें मिट्टी में गड़वा के रखा है। इस तरह अपने-अपने गुरूओं का हाल जानकर दोनों सिद्ध अपने-अपने गुरूओं के उद्धार के लिए निकले। तब गोरखनाथ को पता चला कि उनके गुरू मीननाथ उर्फ मछिंदर नाथ सोलह सौ सेविकाओं के साथ द्वारा परिवृत्ता मंगला और कमला नामक पटरानियों के साथ विहार कर रहे हैं। वहां योगी का जाना निषिद्ध है। जाने पर उनको प्राणदंड होगा। केवल नर्तकिया ही मीननाथ का दर्शन कर सकती है। गुरू के उद्धार के लिए गोरखनाथ ने नर्तकी का रूप धारण किया। द्वारपालक के मुख से इस अपूर्व सुंदरी के सौंदर्य की बात सुनकर रानियों ने मीननाथ के सामने उसे जाने नहीं दिया। अंत में गोरखनाथ ने द्वार से ही मर्दल की ध्वनि की आवाज सुनकर मीननाथ ने नर्तकी को बुलाया मर्दल ध्वनि के साथ गोरखनाथ ने गुरू को पूर्ववर्ती बातों का स्मरण कराया और महाज्ञान का संदेश दिया। सुनकर मीननाथ को चैतन्य हुआ।

शिष्य द्वारा अपने भटके हुए ज्ञानी गुरू को राह पर लाने की यह कथा अद्भुत है और देशभर में थोड़े हेरफेर के साथ यह कथा प्रचलित है। कई विद्वानों का मानना है, कि इस कथा का गूढ़ उद्देश्य तथा अर्थ चौरासी सिद्धों के तांत्रिक वज्रयान का सात्विक नाथ पंथ में परिवर्तित होना है। गौरतलब है इन सिद्धों के आलौकिक शक्तिशाली होने पर भी निरीश्वर, शून्यवादी बौद्ध होने के कारण जनता प्राय: इनसे मुग्ध नहीं हुई थी। सुप्रसिद्ध बंगाल (अथवा कामरूप या असम) के जादू से लोग डरने लगे थे। और जीवनत्तवानेवषण संबंध में इन सक्तों पर अविश्वास सा होने लगा था। इसके अतिरिक्त सिद्धों के मध्य, मांस तथा स्त्री संबंधी आचारों से लोगों को घृणा होने लगी थी। तब गोरखनाथ ने विशुद्ध तथा सात्विक हठमार्ग का प्रचार सारे भारत वर्ष में किया। गोरखपुर, गिरनार और नेपाल उनके मुख्य केंद्र थे। इस सात्विक योगपद्धति का आदर भारतवर्ष के सभी क्षेत्रों में हुआ। नाथ पंथ के नवनाथ मतलब नौ संत देशभर में प्रसिद्ध रहे हैं। इनके नाम – गोरखनाथ, ज्वालेंद्रनाथ, कारिणनाथ, गहिनीनाथ, चर्पटनाथ, रेवणनाथ, नागनाथ, भृरनाथ तथा गोपीचंद्रनाथ हैं। गोरखनाथ की योगपद्धति को हठयोग कहा जाता है। योग की यह पद्धति ही आज दुनियाभर में मशहूर हो रही है। उल्लेखनीय है पतंजलि के योगसूत्र में आसन आदि का जिक्र कम है। यह मुख्य रूप से गोरखनाथ और उनके नाम से प्रचलित ग्रंथों में ही पाया जाता है। वहीं से हठयोग या योग देशभर में दसवीं शताब्दी के बाद लोकप्रिय हुआ था। आधुनिक मनुष्य को जब योग के गुह्य ज्ञान का पता चला तो विभिन्न देशों के करोड़ों लोग इसे अपनाने लगे।


योग शारीरिक व मानसिक परेशानी के सुधार में सहायक: आचार्य दीपक सचदेवा


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योग के माध्यम से भारत को एक बार फिर से विश्व गुरू का दर्जा प्राप्त होगा। योग दिवस के अवसर पर आचार्य दीपक सचदेवा से बातचीत करते हुए उदय इंडिया की संवाददाता प्रीति ठाकुर से हुई बातचीत के मुख्य अंश।

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस का क्या महत्व है?

योग को लोगों तक पहुंचाने के लिए ये एक अच्छा माध्यम है। इससे योग की पब्लिसिटी भी होगी और लोगों में इसके फायदों के बारे में जागरूकता बढ़ेगी। आज जितने भी लोग परेशान हैं चाहें परेशानी शारीरिक हो या मानसिक योग उसकी रिकवरी में सहयोग करता है। मानसिक परेशानी में तो योग है ही असरदार साथ ही शारीरिक परेशानी चाहें ज्वाईंट पेन हो या सरवाईकल हो इनका ईलाज है ही सिर्फ योग में। योग हर फील्ड में अपना रोल प्ले कर सकता है ये तो योग को पहचानने का पहला स्टैप है। योग हर घर में कभी किसी टी्रटमेंट के नाम पर तो कभी अध्यात्म के नाम पर तो कहीं मानसिक तनाव से मुक्ति के नाम पर हर घर में होने लगेगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस इसकी पहचान के रूप में सामने आयेगा।

21 जून को योग दिवस घोषित किया गया है क्या इस पहल से योग फिर से भारत में अपनी पैठ बना सकेगा?

योग की गरिमा ऐसी है कि हम जिससे भी योग की बात करें तो हर व्यक्ति एक या दो आसन जानता ही है। योग से हिंदुस्तान में हर व्यक्ति जुड़ा हुआ है। मोदी जी ने यूएन के जरिए जो अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करवाया है लोगों में इसके लिए जागरूकता बढ़ेगी और योग में ज्यादा रिसर्च के चांस बढ़ गए हैं। बड़े से लेकर छोटे तक सभी योग से जुड़ेंगे।

जिम (मशीनी कसरत) और योग में क्या फर्क है?

दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। आसन स्थिर होते हैं जब आप स्थिरता के साथ कुछ करने लगते हैं तो आपके विचार भी स्थिर होने लगते हैं। और अगर हम लगातार कोई एक्सरसाईज करने लगते हैं तो हम हाईपर एक्टिव होने लगते हैं। लेकिन लगातार 10 मिनट तक कोई आसन करने से दिमाग स्थिर होने लगता है मतलब विचार स्थिर होने लगते हैं जिससे आपको गुस्सा नहीं आयेगा और आप अपने सभी निर्णय स्थिर दिमाग से ले पाएंगे। जब हम आसन करते हैं तो ऑर्गनस पर काम करते हैं जबकि जब एक्सरसाईज करते हैं तो मसल्स और बोंस पर काम करते हैं। लॉग टर्म के लिए योग ही अच्छा तरीका है एक्सरसाईज एक खास वर्ग के लिए ठीक है।


                                                                                                                                                                                                                                                                                             ओशो रजनीश ने अपनी पुस्तक ‘मरौ हो जोगी मरौ’ में गोरखनाथ के योगदान का बहुत सुंदर वर्णन किया है। वे कहते हैं -‘गोरख से इस देश में एक नया ही सूत्रपात हुआ। गोरख एक श्रृंखला की पहली कड़ी हैं। उनसे एक नए प्रकार के धर्म का आविर्भाव हुआ। गोरख बिना न तो कबीर हो सकते हैं, न नानक हो सकते हैं न दादू, न वाजिद, न फरीद, न मीरा। इन सबके मौलिक आधार गोरख हैं। फिर मंदिर बहुत ऊंचा उठा। मंदिर पर बड़े स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन नींव का पत्थर नींव का पत्थर है। और स्वर्णकलश दूर से दिखाई पड़ते हों लेकिन नींव के पत्थर से ज्यादा मूल्यवान नहीं हो सकते। नींव के पत्थर किसी को दिखाई भी नहीं पड़ते मगर उन्हीं पत्थरों पर टिकी होती है सारी व्यवस्था, सारी भित्तियां, सारे शिखर। शिखरों की पूजा होती है बुनियाद के पत्थरों को तो लोग भूल ही जाते हैं। ऐसे ही गोरख को भी भूल गए हैं।’

‘लेकिन भारत की सारी संत परंपरा गोरख की ऋणी है। जैसे पतंजलि बिना भारत में योग की कोई संभावना नहीं रह जाएगी। जैसे बुद्ध के बिना ध्यान की आधारशिला उखड़ जाएगी। जैसे कृष्ण के बिना प्रेम की अभिव्यक्ति को मार्ग न मिलेगा। ऐसे ही गोरख के बिना उस परम सत्य को पाने के लिए विधियों की जो तलाश शुरू हुई, साधना की जो व्यवस्था बनी, वह न बन सकेगी। गोरख ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर अंतर खोज के लिए उतना शायद किसी ने नहीं किया है। उन्होंने इतनी विधियां दीं कि अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाए तो गोरख सबसे बड़े आविष्कारक हैं। इतने द्वार तोड़े मनुष्य के अंतरमन में जाने के लिए कि लोग द्वारों में उलझ गए। इसलिए हमारे पास एक शब्द चल पड़ा है – गोरख को तो लोग भूल गए- गोरखधंधा शब्द चल पड़ा। उन्होंने इतनी विधियां दी कि लोग उलझ गए कि कौन सी ठीक, कौन सी गलत, कौन सी करें, कौन सी छोड़े? उन्होंने इतने मार्ग दिए कि लोग किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए। इसलिए गोरखधंधा शब्द बन गया। अब कोई किसी चीज में उलझा हो तो हम कहते हैं किस गोरख धंधे में उलझे हो।’

ओशो आगे कहते हैं – गोरख के पास अपूर्व व्यक्तित्व था। जैसे आइंस्टीन के पास था। जगत के सत्य को खोजने के लिए पैने- से-पैने उपाय अलबर्ट आंइस्टीन दे गए हैं। उससे पहले किसी ने भी नहीं दिए थे। हां अब उनका विकास हो सकेगा। मगर जो प्रथम काम था वो आइंस्टीन ने किया है। जो पीछे आएंगे वो नंबर दो होंगे। वे अब प्रथम नहीं हो सकते। आइंस्टीन की जगह अब कोई नहीं ले सकता। ऐसी घटना अंतर जगत में गोरख के साथ घटी।11_Page_2

दुर्भाग्यवश इस महायोगी के बारे में ऐतिहासिक जानकारी बहुत कम उपलब्ध है। उनके बारे में जो किवदंतियां हैं उनके द्वारा प्रवर्तित योगमार्ग के महत्व के प्रचार के अलावा कोई विशेष प्रकाश नहीं डालती। गोरखनाथ के नाम पर बहुत ग्रंथ चलते हैं। इनमें से कई तो परावर्ती और कई संदेहास्पद हैं। कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है गोरखनाथ की पुस्तकें नानाभाव से परिवर्तित और विकृत होती हुई आजतक चली आ रही हैं। उनमें से कुछ-न-कुछ तो गोरखवाणी जरूर रह गई है। पर सभी प्रामाणिक नहीं है।

गोरखनाथ और उनके द्वारा प्रभावित योगमार्गीय ग्रंथों के अध्ययन से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि गोरखनाथ ने योगमार्ग को बहुत ही सुव्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने शैव प्रत्यभिज्ञा दर्शन के सिद्वांतों के आधार पर कायायोग के साधनों को व्यवस्थित किया है। उन्होंने लोकभाषा को भी अपने उपदेशों का माध्यम बनाया हालांकि यह कह पाना मुश्किल है कि उनके नाम पर चलने वाली लोकभाषा, की कौन सी पुस्तक प्रामाणिक है।

गोरखनाथ ने जिस हठयोग का उपदेश दिया वह पुरानी परंपरा से अधिक भिन्न नहीं है। शास्त्रों में हठयोग को सामान्य तौर पर प्राण निरोध साधना माना गया है। सिद्ध ‘सिद्धांत पद्धति’ में ह का अर्थ सूर्य बताया गया है ठ का अर्थ चंद्र। सूर्य और चंद्र के योग को हठयोग कहते हैं। इसकी व्याख्याएं कई और तरीके से भी की जाती हैं। एक- सूर्य का तात्पर्य प्राणवायु से हैं। और चंद्र का अपान वायु से इन दोनों का योग अर्थात प्राणायाम से वायु का निरोध करना ही हठयोग है। एक और व्याख्या सूर्य इड़ा नाड़ी को कहते हैं चंद्र पिंगला को इसलिए इड़ा पिंगला नाडिय़ों को रोककर सुष्मना मार्ग से ही प्राणवायु को प्रवाहित करना हठयोग है।

हठयोग की सात प्रक्रियाएं

शोधन- जो ष्ठकर्मों से सिद्ध होता है।

आसन- से दृढता सिद्ध होती है।

स्थिरता- मुद्राओं से सिद्ध होती है।

लाघव- प्रणायम से सिद्ध होता है।

धैर्य-इंद्रिय संयम से सिद्ध होता है।

प्रत्यक्ष- ध्यान से सिद्ध होता है।

निर्लिपित्व-समाधि से प्राप्त होता है।

आजकल हठयोग की दूसरी प्रक्रिया यानी आसन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो रही है। जिसके अभ्यास से शरीर दृढ़ और मन स्थिर होता है जगत में जितने प्रकार की योनियां है उतने ही प्रकार के आसन हैं। कहा जाता है भगवान शंकर ने चौरासी लाख आसनों का वर्णन किया है। उनमें चौरासी आसन प्रमुख हैं। उनमें से तैंतीस मत्युलोक में मंगलजनक हैं।

गोरखनाथ के नाम से बहुत-सी पुस्तकें संस्कृत में मिलती हैं और अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी चलती हैं। निम्नलिखित पुस्तकें गोरखनाथ की लिखी बतायी गयी हैं-

अमवस्क, अवरोधशासनम्, अवधूत गीता, गोरक्षकाल, गोरक्षकौमुदी, गोरक्ष गीता, गोरख चिकित्सा, गोरक्षपंचय, गोरक्षपद्धति, गोरक्षशतक, गोरक्षशास्त्र, गोरक्षसंहिता, चतुरशीत्यासन, ज्ञान प्रकाश शतक, ज्ञान शतक, ज्ञानामृत योग, नाड़ीज्ञान प्रदीपिका, महार्थमंजरी, योगचिन्तामणि, योगमार्तण्ड, योगबीज, योगशास्त्र, योगसिद्धासन पद्धति, विवेक मार्तण्ड, श्रीनाथसूत्र, सिद्धसिद्धान्त पद्धति, हठयोग, हठ संहिता। इसमें महार्थ मंजरी के लेखक का नाम पर्याय रूप में महेश्वराचार्य भी लिखा है और यह प्राकृत में है। बांकी संस्कृत में हैं। कई एक-दूसरे से मिलती हैं, कई पुस्तकों के गोरक्षलिखित होने में सन्देह है।

हिन्दी में सब मिलाकर 40 छोटी-बड़ी रचनाएं गोरखनाथ की कही जाती हैं, जिनकी प्रामाणिकता असन्दिग्ध नहीं है-

सबदी, पद, शिष्यादर्सन, प्राणसंकली, नरवे बोध, आतम बोध (पहला), अभैमात्रा योग, पन्द्रह तिथि, सप्नवाद, मछींद्रगोरख बोध, रोमावली, ग्यानतिलक, ग्यान चौंतीस, पंचमात्रा, गोरखगणेश गोष्ठी, गोरादत्तगोष्ठी, महादेवगोरख गुष्ट, सिस्टपुराण, दयाबोध, जाती भौरावली (छन्द गोरख), नवग्रह, नवरात्र, अष्ट परछाया, रहरास, ग्यानमाल, आतमाबोध (दूसरा), व्रत, निरंजन पुराण, गोरखवचन, इन्द्री देवता, मूल गर्मावती, खाणवारूणी, गोरखससत, अष्टमुद्रा, चौबी सिधि, डक्षरी, पंच अग्नि, अष्टचक्र, अवलि सिलूक, काफिर बोध।

इन गंथों से अधिकांश गोरखनाथी मत के संग्रहमात्र हैं। ग्रन्थ रूप में स्वयं गोरखनाथ ने इनकी रचना की होगी, यह बात संदिग्ध है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी, जैसे-बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि में इसी प्रकार की रचनाएं प्राप्त होती हैं।

गोरक्षमत के योग को पंतजलि वर्णित ‘अष्टांगयोग’ से भिन्न बताने के लिए ‘षडंग योग’ कहते हैं। इसमें योग के केवल छ: अंगों का ही महत्व है। प्रथम दो अर्थात यम और नियम इसमें गौण हैं। इसका साधनापक्ष या प्रक्रिया-अंग हठयोग कहा जाता है। शरीर में प्राण और अपान, सूर्य और चन्द्र नामक जो बहिर्मुखी और अंतर्मुखी शक्तियां हैं, उनको प्राणायाम, आसन, बंध आदि के द्वारा सामरस्य में लाने से सहज समाधि सिद्ध होती है। जो कुछ पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में भी है। इसलिए हठयोग की साधना पिण्ड या शरीर को ही केन्द्र बनाकर विश्व ब्रह्मांड में क्रियाशील शक्ति को प्राप्त करने का प्रयास है। गोरक्षनाथ के नाम पर चलने वाले ग्रन्थों में विशेष रूप से इस साधना प्रक्रिया का ही विस्तार है।

भगवान शंकराचार्य के बाद गोरखनाथ जैसा प्रभावशाली और महिमान्वित महापुरूष दूसरा नहीं हुआ। भारत के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाए जाते हैं। भक्ति आंदोलन से पहले सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग था। भारत वर्ष की कोई ऐसी भाषा नहीं जिसमें गोरखनाथ संबंधी कथाएं नहीं पाई जाती हों। इन कथाओं में परस्पर ऐतिहासिक विरोध बहुत अधिक है परंतु इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे। जिन्होंने न केवल योग के विविध आयामों का आविष्कार किया वरन प्राचीन योगमार्ग को सुव्यवस्थित भी किया। इतना ही नहीं सारे देशभर में उसका व्यापक प्रचार प्रसार किया। इस बीच उनका योग भले ही योगा बन गया हो मगर वह सारे विश्व में अपनी विजय पताका फहरा रहा है।

                (सतीश पेडणेकर)


लोगों को दवाई से छुटकारा मिलेगा: अमित सिंह


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इंडिया गेट पर 30 हजार लोग एक साथ योग करेंगे। हमारी कोशिश है कि हम अलग-अलग जगह पर लोगों को आसन सिखायें ताकि लोगों में योग को लेकर जागृति बढ़े,’’ योगगुरू अमित सिंह ने उदय इंडिया के सुरेन्द्र बिष्ट से बातचीत के दौरान कहा। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश।

अन्र्तराष्ट्रीय योग दिवस कैसे लोगों के लिए महत्वपूर्ण है?

अन्र्तराष्ट्रीय योग दिवस से हर घर तक योग पहुंचेगा जिसको योग की जानकारी भी नहीं है उन तक भी पहुंचेगा। सेंट्रल कॉसिल ऑफ योग ने योग के लिए एक प्रोटोकॉल बनाया है। जिसमें ये निर्णय लिया गया है कि 35 मिनट तक लोगों को योग सिखाया जायेगा जिसमें आसन प्रणायम सभी चीजे शमिल होंगी। जितने भी योगगुरू हैं या प्राकृतिक चिकित्सक हैं सभी इसमें हिस्सा लेंगे और लोगों को योग सिखायेंगे। इसमें श्रीपद येसो नायक जो आयुष मंत्रालय के मंत्री हैं उनका भी इसमे काफी योगदान रहेगा। इंडिया गेट पर 30 हजार लोग एक साथ योग करेंगे। हमारी कोशिश है कि हम अलग-अलग जगह पर लोगों को आसन सिखायें ताकि लोगों में योग को लेकर जागृति बढ़े और लोगों को मेडिसिन्स से छुटकारा मिल सके।student-yoga copy

21 जून को योगदिवस घोषित किया गया है क्या योग फिर से भारत में अपना खोया हुआ स्थान प्राप्त कर सकेगा।

मोदी जी का काम था कि यूनेस्को में योग को प्रजेंट करना ताकि लोग समझ सके कि योग एक ऐसी साधना है जो लोगों को कई भावनात्मक पहलूओं से दूर रख सकती है। दिमाग शांत रहता है, शरीर में लचक बनी रहती है जिससे बीमारियां पास नहीं आती। कई देशों के अंदर इस पर रिसर्च हो चुकी है और कई में चल भी रही है लेकिन लोग अब ज्यादा जागृत हो चुके हैं और आगे बढ़ कर योग से जुड़ रहे हैं।

योग और कसरत में क्या अंतर है?

योग करें और निरोगी रहें, लेकिन जिम से ऐसा नहीं होता जिम से शरीर की मांसपेशियों को गर्म करके शरीर को एक शेप दी जाती है, लेकिन इससे शरीर को लचीलापन नहीं मिलता। जिम से बाईसेप्स या डोले तो बनाए जा सकते हैं लेकिन इसमें इतनी ताकत नहीं होती और न ही बॉडी में लचीलापन रहता है शरीर में एक टाईटनेस सी आ जाती है जिससे कई तरह की परेशानियां भी पैदा होती हैं। जो बॉडी बिल्डर होते हैं उनको सबसे ज्यादा किडनी के इंफेक्शन का खतरा होता है क्योंकि वो पाउडर खा कर शरीर को कठोर बनाते हैं अगर किडनी को खतरा नहीं भी हुआ तो भी शरीर के किसी दूसरे हिस्से के खराब होने का खतरा हमेशा रहता है। लेकिन योग करने वाले का शरीर उतना आकर्षक नहीं होता कि डोले नजर आएं या सुडौल शरीर नजर आए लेकिन योग से शरीर निरोगी बनता है।


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