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सच्ची आजादी की ओर

सच्ची आजादी की ओर

देश की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं।  स्वतंत्रता के इन 75 वर्षों में देश में असंख्य परिवर्तन हुए हैं। बहुत सारे परिवर्तन यदि सकारात्मक हैं तो बहुत सारे परिवर्तन नकारात्मक भी हैं। स्वाधीनता के बाद यदि देश का द्रुत गति से विकास हुआ है तो दूसरी ओर राजनीतिक दूषण, नैतिक पतन, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि भी पर्याप्त बढ़ा है। इसी सन्दर्भ में यह कहना उचित है की आजादी के 75वें वर्ष में पहुंचते हुए हम अब वास्तविक आजादी का स्वाद चखने लगे हैं, आतंकवाद, जातिवाद, क्षेत्रीयवाद, अलगाववाद की कालिमा धूल गयी है, धर्म, भाषा, वर्ग, वर्ण और दलीय स्वार्थो के राजनीतिक विवादों पर भी नियंत्रण हो रहा है। इन नवनिर्माण के पदचिन्हों को स्थापित करते हुए कभी हम प्रधानमंत्री के मुख से कोरोना महामारी जैसे संकटों को मात देने की बात सुनते है तो कभी गांधी जयन्ती के अवसर पर स्वयं झाडू लेकर स्वच्छता अभियान का शुभारंभ करते हुए मोदी को देखते हैं। मोदी कभी विदेश की धरती पर हिन्दी में भाषण देकर राष्ट्रभाषा को गौरवान्वित करते हैं तो कभी ‘मेक इन इंडिया’ का शंखनाद कर देश को न केवल शक्तिशाली बल्कि आत्म-निर्भर बनाने की ओर अग्रसर करते हैं। नई खोजों, दक्षता, कौशल विकास, बौद्धिक संपदा की रक्षा, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन, श्रेष्ठ का निर्माण-ये और ऐसे अनेकों सपनों को आकार देकर सचमुच मोदी हमारी स्वतंत्रता को सुदीर्घ काल के बाद सार्थक अर्थ दे रहे हैं। आजादी का यह उत्सव उन लोगों के लिए एक आह्वान है जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, हताश, सत्वहीन बनकर सिर्फ सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं पर अपनी दुर्बलताओं को मिटाकर नयी जीवनशैली की शुरुआत का संकल्प नहीं स्वीकारते। इसीलिए आजादी के अमृत महोत्सव का यह जश्न एक संदेश है कि-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुजदिली का धब्बा लगता है जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएं सही दिशा और दर्शन खोज लेती है। आजादी का दर्शन कहता है-जो आदमी आत्मविश्वास एवं अभय से जुड़ता है वह अकेले ही अनूठे कीर्तिमान स्थापित करने का साहस करता है। और ऐसे अनूठे कीर्तिमान भारतीय खिलाडियों ने टोक्यो ओलिंपिक में बनाये, जिसकी विस्तार से चर्चा हमारी आवरण कथा में की गयी है।

यह कहने के बाद, यह कहना अनुचित नहीं होगा की हमारी संसद में जो हो रहा है, वह बहुत ही अशोभनीय है। संसद लोकतंत्र का मंदिर है और विपक्ष और ट्रेजरी बेंच संसद की दो आंखों की तरह हैं और इसके लिए बराबर हैं। लेकिन संसद के दोनों सदनों में कुछ अनियंत्रित दृश्यों के कारण यह मानसून लगभग धुल गया है। कृषि कानूनों पर चर्चा के बीच संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी की, मेजों पर चढ़ गए और सदन के अध्यक्ष पर फाइलें फेंक दीं। एक चौंकाने वाले वीडियो में, कांग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा राज्यसभा में टेबल के ऊपर चढ़ते और  सदन के अध्यक्ष पर  नियम पुस्तिका फेंकते नजर आए। यह तब हुआ जब ‘आप’ सांसद संजय सिंह पहले मेज पर चढ़ गए और फिर नारेबाजी की जिसके बाद उपाध्यक्ष भुवनेश्वर कलिता ने सदन को स्थगित कर दिया। प्रताप सिंह बाजवा के निराशाजनक कृत्य के बाद, कांग्रेस के अन्य सांसद नारेबाजी और हंगामा जारी रखते हुए मेजों पर बैठ गए, जिससे सदन का स्थगन हो गया। इससे भी अधिक खेदजनक तथ्य यह है कि माकपा के एक सांसद ने एक मार्शल का कथित तौर पर गला घोटने के कोशिश की। इस परिप्रेक्ष्य में, राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष को संसद में विपक्ष के सांसदों के कथित अनियंत्रित व्यवहार पर की जाने वाली कार्रवाई पर निर्णय लेना चाहिए। उन्हें अतीत के उदाहरणों और कार्यों को देखना चाहिए, और मामले को या तो विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया जाना चाहिए या एक नई समिति के गठन पर भी विचार किया जाना चाहिए।

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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