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ओडिशा और हॉकी

ओडिशा और हॉकी

पांच अगस्त को जब भारत ने टोक्यो ओलंपिक खेलों के पुरूष हॉकी में 41 वर्षों बाद पदक हासिल किया तो उसमें खिलाडिय़ों के पसीने व परिश्रम की महक के साथ ओडिशा के योगदान का एक अंश भी शामिल था।

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी दल के शानदार प्रदर्शन ने खिलाड़ियों के साथ राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक  ने भी असीम प्रशंसा बटोरी है।

हॉकी में पिछड़ते जाने के बावजूद ओडिशा सरकार ने खिलाडिय़ों की क्षमता पर  विश्वास  कायम रखते हुए राष्ट्रीय हॉकी का प्रायोजक  बनने का निर्णय किया जिसके बाद हॉकी के प्रर्दशन में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई।

पुरूष हॉकी दल ने 41 वर्षो का सूखा समाप्त करते हुए कांस्य पदक जीता जबकि महिला दल ने कांस्य पदक के मैच में रियो ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता ग्रेट ब्रिटेन को नाको चने चबवा दिये।

भारतीय दल के कप्तान मनप्रीत सिंह ने खुले मन से इसे स्वीकार किया। पदक जीतने के बाद मनप्रीत ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को एक  संदेश भेजकर मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताते हुए उन्हें दल के सामर्थ्य पर विश्वास बनाये रखने के लिए धन्यवाद दिया। मनप्रीत ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की दूरदृष्टि और समर्थन के लिये आभार जताते हुए कहा कि   ओलंपिक में पुरूष हॉकी दल की पदक जीत ओडिशा की भी जीत है जिसने हमेशा खिलाडिय़ों के ओलंपिक अभियान में विश्वास बनाये रखते हुए भरपूर समर्थन दिया।

मनप्रीत ने कहा ‘यह हमारे लिये विशेष क्षण है। हमने आखिरकार ओलंपिक पदक जीतने के अपने सपने को साकार कर दिया। एक ऐसे समय में जब क्रिकेट को देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल होने का दर्जा प्राप्त है। वैसी स्थिति में ओडिशा के मुख्यमंत्री ने हॉकी में अपना विश्वास व्यक्त और पूरी शिद्दत से सभी प्रकार की सहायता मुहैया करा के हमारा मनोबल और हौसला बढ़ाया। इसलिए इस विशेष अवसर पर मैं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जी को सारे खिलाडिय़ों की ओर से विशेष धन्यवाद देना चाहता हूं।’

केवल कप्तान या खिलाड़ी नहीं बल्कि देश के सभी कोनों से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के योगदान की सराहना की जा रही है।

टोक्यो ओलंपिक के तैयारी की रिपोर्ट बनाने वाली संसदीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में ओडिशा के योगदान की प्रमुखता से  उल्लेख किया है।

महिला, शिशु, क्रीड़ा व युवा कार्य से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति ने हॉकी दल के प्रदर्शन के लिये ओडिशा सरकार के समर्थन और विश्वास  बनाये रखने  के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की प्रशंसा की है।

भाजपा सदस्य विनय पी सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा ‘समिति मुख्यमंत्री नवीन पटनायक द्वारा स्थापित उच्च प्रदर्शन केंद्र (हाई परफॉर्मेंस सेंटर) तथा 2018 से भारतीय पुरूष और महिला हॉकी का प्रायोजक बनने के लिए उनकी प्रशंसा करती है। इसकी वजह से टोक्यो ओलंपिक में दोनों दलों ने शानदार प्रदर्शन किया है। समिति ने भारतीय हॉकी के पुनरत्थान में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के प्रयासों और योगदान की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। नवीन पटनायक अब भारतीय संसदीय इतिहास के रिकॉर्ड में सर्वदा के  लिये दर्ज हो गये हैं।’

टोक्यो ओलंपिक में पुरूष और महिला हॉकी दल के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद हॉकी के साथ इसके प्रायोजक बने ओडिशा भी देशवासियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। लोग ओडिशा मॉडल की बातें करने लगे हैं। ओडिशा ने किस प्रकार भारतीय हॉकी की वित्तीय सहायता की है। इस ‘गरीब’ खेल के  खिलाडिय़ों को फाइव स्टार वाली सुविधाएं मुहैया कराई है वह भी चर्चा का विषय बन गया है।

उल्लेखनीय है सहारा दो दशकों से अधिक समय से भारतीय हॉकी की प्रायोजक थी। पर जनवरी 2018 में यह संबंध टूट गया। हॉकी इंडिया बेसहारा हो गई। भारतीय हॉकी अपनी चमक खो रही थी। हॉकी से लोग दूरी बनाने लग गये थे। ऐसे में कोई बड़ी कंपनी प्रायोजक बनने को तैयार नहीं थी। इस विकट परिस्थिति में नवीन पटनायक सरकार ने आगे बढकर हॉकी इंडिया का हाथ थामने का निर्णय किया। 15 फरवरी, 2018 को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में ओडिशा सरकार ने राष्ट्रीय पुरूष और महिला खिलाडिय़ों की उपस्थिति में लगभग 150 करोड़ रुपये का समर्थन देकर पांच वर्ष का प्रायोजक बनने की घोषणा की। साथ ही दल के नये जर्सी का अनावरण किया जिस पर ‘ओडिशा’ बड़ी प्रमुखता से छपा था। ऐसा पहली बार था कि कोई राज्य सरकार एक राष्ट्रीय दल का प्रायोजक बनी।

साधारणतया ओडिशा की पहचान एक पिछड़े राज्य के रूप में होती है। ऐसे में इस प्रदेश के मुख्यमंत्री की अग्रणी सोच ने राज्य के हॉकी प्रेमियों को अभिभूत कर दिया।  भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने इस अवसर पर भुवनेश्वर को देश की क्रीड़ा राजधानी  के समान बताया।

 

टोक्यो ओलंपिक में हॉकी दल की सफलता ओडिशा के एक खुशी की बात थी दल में ओडिशा के दो खिलाड़ी – बीरेन्द्र लकड़ा (उपकप्तान) और अमित रोहिदास – शामिल थे। इन दोनों को ओलंपिक खेलों में पदक प्राप्त करने वाले ओडिशा के पहले खिलाड़ी होने का गौरव मिला है।

हॉकी से ओडिशा का गहरा रिश्ता है। ये और बात है कि ओडिशा को आदिवासी क्षेत्रों में व्याप्त अपनी अकूत प्रतिभाओं को ढूंढकर तराशने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने में थोड़ा विलंब हुआ। इस मामले में झारखंड बाजी मार गया। 1928 में एम्स्टर्डम ओलंपिक खेलों में पहली बार गई भारतीय हॉकी दल के कप्तान रांची के जयपाल सिंह मुंडा थे।  उसके बाद झारखंड क्षेत्र के माइकल किंडो, सिलवानुस डूंगडुंग, मनोहर टोपनो, अजीत लकड़ा जैसे आदिवासी खिलाडिय़ों ने ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया।

लेकिन ओडिशा को अपने पहले ओलंपिक हॉकी खिलाड़ी के लिए 1996 तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि  अस्सी दशक के बाद से ओडिशा ने बिना सरकारी सहायता के राष्ट्रीय हॉकी पटल पर अपनी धमक दिखानी शुरू कर दी थी। 1979 और 1980 के राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप में स्वर्गीय माइकल किंडो के नेतृत्व में ओडिशा दल ने सेमीफाइनल में जगह बनाकर भारतीय हॉकी अधिकारियों को हैरत में डाल दिया था।

1982 में पीटर तिर्की ने जूनियर विश्व कप दल में स्थान अर्जित कर राज्य के पहले अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी होने का गौरव हासिल किया। इन सफलताओं को देखते हुए तत्कालीन राज्य सरकार  ने 1985 में पानपोष (राउरकेला) में पहले हॉकी छात्रावास की स्थापना की। इसके बाद सुंदरगढ़ में भारतीय खेल प्राधिकरण ने एक हॉकी केंद्र, 1992 में राउरकेला में इस्पात संयंत्र ने सेल हॉकी अकादमी की स्थापना की जिसके फलस्वरूप राज्य को निरन्तर क्वालिटी खिलाडिय़ों की आपूर्ति शुरू हो गई। इसी वजह से ओडिशा अब देश का हॉकी का प्रमुख केंद्र बन गया है। भुवनेश्वर में टाटा ग्रुप की सहायता से स्थापित हाई परफॉर्मेंस सेंटर अत्यंत आधुनिक सुविधाओं से सज्जित है। निचले स्तर से प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों को ढूंढकर तराशने की जो  प्रक्रिया आरंभ हुई उसी के फलस्वरूप दिलीप तिर्की, लाजरुस बारला, इग्नेश तिर्की, प्रबोध तिर्की, ज्योति सुनीता कुल्लू, सुभद्रा प्रधान, बिनीता टोपो, से लेकर बीरेंद्र लकड़ा, अमित रोहिदास, दीपग्रेस एक्का जैसे उच्च स्तर के खिलाड़ी देश को मिले। 1995 में दिलीप तिर्की और महिला खिलाड़ी ज्योति सुनीता कुल्लू भारतीय हॉकी गगन में चमकते सितारे की तरह उभरे। इन दोनों ने अनगिनत आदिवासी युवाओं को हॉकी खेलने और बड़ी सफलता पाने को प्रेरित किया। ओडिशा के लिये एक विशेष गर्व करने वाली बात है कि  भारत की ओर से सर्वाधिक अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने का कीर्तिमान दिलीप तिर्की (412 मैच) के नाम है। दिलीप तिर्की को इसके लिये अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। दिलीप के अलावा ज्योति कुल्लू और इग्नेश तिर्की को भी अर्जुन पुरस्कार दिया गया है।

1996 में अटलांटा में आयोजित ओलंपिक खेलों में दिलीप तिर्की राष्ट्रीय दल में शामिल होकर ओडिशा के पहले ओलिम्पियन होने का गौरव प्राप्त किया। उसके बाद से ओडिशा ने रफ्तार पकड़ी और झारखंड को कही पीछे छोड़ दिया। 1996 के बाद से हर ओलंपिक खेल में ओडिशा के खिलाड़ी भारतीय दल में स्थान पाते आ रहे हैं। 2004 के एथेंस ओलंपिक में एक साथ ओडिशा के तीन खिलाड़ी दिलीप तिर्की, इग्नेश तिर्की और विलियम खालखो दल में थे। दिलीप तिर्की दल के कप्तान थे।

2016 के रियो ओलंपिक में पुरूष दल में कोई खिलाड़ी नहीं था पर महिला दल राज्य की चार खिलाड़ी सुनीता लकड़ा, दीपग्रेस एक्का, नमिता टोपो, लिलिमा मिंज शामिल थीं। इस बार दोनों दल में ओडिशा के दो दो खिलाडिय़ों को स्थान मिला था। पुरूष दल में शामिल अमित रोहिदास राज्य के दसवें ओलिम्पिक खिलाड़ी बने हैं।

टोक्यो में पदक जीतकर बीरेंद्र लकड़ा और अमित रोहिदास ओलंपिक में पदक जीतने वाले ओड़िशा के पहले खिलाड़ी बन गये हैं।

अबतक ओडिशा से दस ओलिम्पिक खिलाड़ी के साथ साठ से अधिक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी सामने आ चुके हैं। इन खिलाडिय़ों के संबंध में एक खास बात है कि यह आदिवासी समुदाय के हैं और एक ही जिले सुंदरगढ़ के हैं।

ओडिशा अब रेलवे, सेना, पुलिस, बैंक व कई अन्य राज्यों को खिलाडिय़ों की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। कई प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों के नौकरी की तलाश में राज्य के बाहर चले जाने से राज्य को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। इस स्थिति को बदलने के लिए अब सरकार ने कदम उठाए हैं। कई बड़े खिलाडिय़ों को राज्य में अच्छी नौकरी के प्रस्ताव दिये गये हैं। कई खिलाड़ी वापस लौटे भी हैं। अच्छे खिलाडिय़ों के बाहर चले जाने की वजह से ओडिशा आजतक सीनियर राष्ट्रीय हॉकी चैम्पिनशिप नहीं जीत पाया है। जबकि जूनियर और सबजूनियर प्रतियोगिताओं में ओडिशा हमेशा शक्तिशाली और ट्रॉफी की दावेदार मानी जाती है।

हॉकी से नवीन सरकार के प्रेम की शुरुआत 2014 से मानी जा सकती है। उस वर्ष पहली बार किसी राज्य सरकार ने हॉकी इंडिया लीग में अपने एक दल को उतारने का फैसला किया। कलिंग लांसर्स के नाम से गठित इस दल ने 2017 में विजेता का खिताब जीत लिया। इससे पहले 2007 में प्रीमियर हॉकी लीग में ओडिशा स्टीलर्स चैंपियनशिप जीतकर ओडिशा हॉकी के झंडे गाड़े थे। दिलीप तिर्की इस दल के कप्तान थे। उन्हें पीएचएल का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया था।

2023 में वल्र्ड कप की भी मेजबानी को तैयार

ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी एक देश के एक शहर को लगातार दूसरी बार विश्व कप हॉकी के मेजबानी का अधिकार दिया गया हो। यह राष्ट्रीय हॉकी संघ के साथ अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की ओडिशा के प्रति विश्वास को दर्शाता है।

वल्र्ड कप-2018 में जिस भव्य तरीके से आयोजन किया गया था वह कई पुराने हॉकी खिलाडिय़ों के लिए अकल्पनीय था। उद्धाटन समारोह में रंगारंग कार्यक्रम की चमक से लोगों की आंखे चौंधियां गई थी। अत: 27 नवंबर, 2019 को अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने 2023 में दूसरी बार मेजबानी करने का जिम्मेदारी भी ओडिशा को दी है। भुवनेश्वर में कलिंग स्टेडियम में आयोजित एक कार्यक्रम में  मुख्यमंत्री ने इसकी घोषणा की। इस बार भुवनेश्वर के साथ हॉकी के वास्तविक गढ़ सुंदरगढ़ जिले के राउरकेला को भी सह मेजबान बनाया गया है। विश्व कप मैचों के लिए राउरकेला में अत्यंत आधुनिक सुविधाओं से सज्जित देश के सबसे बड़े हॉकी स्टेडियम के निर्माण की भी घोषणा की है। बीस हजार दर्शकों की क्षमता वाले इस स्टेडियम पर 130 करोड़ खर्च होंगे। एक साल में इसे बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके साथ ही उन्होंने सुंदरगढ़ जिले के सभी 17 प्रखंडों में हॉकी का सिंथेटिक टर्फ बिछाने की भी घोषणा की ताकि गांवों में रहते हुए भी बच्चों को हॉकी की आधुनिक सुविधाएं मिले।

2014 में लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नवीन पटनायक ने राज्य में खेलों को प्रोत्साहन देने की  नीति पर काम करना शुरू किया। इस पारी में उन्होंने खेलों को अपनी राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिया है। वे एक बात अच्छी तरह से समझते हैं कि राज्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने के लिए दीर्घ अवधि की सुव्यवस्थित योजना की आवश्यकता होगी जबकि बड़े राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन के लिए मुख्यत: पैसों की ही जरूरत पड़ेगी।  ऐसे आयोजनों से खेलों का एक माहौल बनेगा जिससे युवा खेलों की ओर तो आकर्षित होगा ही साथ ही  राज्य की भी एक प्रगतिशील व सकारात्मक छवि देश विदेश में उभरेगी। इसे लक्ष्य बनाकर नवीन बाबू ने बड़े सधे तरीके से कदम बढ़ाने शुरू किये। 2014 में राज्य में प्रतिष्ठित चैम्पियंस हॉकी का आयोजन किया गया। इसके सफल आयोजन के बाद से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खेल अधिकारियों से उनकी नजदीकियां बढ़ी। नवीन सरकार ने खेलों के आयोजन को अपना यूएसपी, विशिष्टता बना ली है। 2017 में 22वें एशियन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के सफल आयोजन के बाद ओडिशा भारतीय खेल पटल पर एक सफल आयोजक के रूप में उभरा है। वास्तव में इसकी जिम्मेदारी झारखंड ने ली थी। पर आयोजन के ठीक तीन महीने पहले झारखंड ने असमर्थता जताते हुए हाथ खींच लिए। एक अंतर्राष्ट्रीय वादे से मुकरने से देश की अपमान होता। ऐसे समय मे नवीन पटनायक इसकी जिम्मेदारी उठाने को आगे आये। मात्र 90 दिनों में राज्य सरकार ने जिस शानदार तरीके से इन खेलों का आयोजन किया उसने सबों को ओडिशा सरकार एवं नवीन पटनायक का मुरीद बना दिया। सिर्फ आयोजन ही नहीं बल्कि इस चैम्पियनशिप में पदक जीतने वाले सभी भारतीय एथलीटों को ओडिशा सरकार ने को एक समान धनराशि प्रदान कर खिलाडिय़ों की प्रशंसा बटोरी। इसी वर्ष दिसंबर में भुवनेश्वर में  हॉकी वल्र्ड लीग का आयोजन किया गया। 2018 में विश्व कप हॉकी के आयोजन से पहले राज्य में एशियन रगबी, राष्ट्रीय खुली एथलेटिक चेम्पियनशिप का आयोजन किया गया।

ओडिशा में हॉकी की लोकप्रियता, खेल के प्रति दीवानगी और उच्च स्तर की सुविधाओं को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने 27 मार्च, 2017 को ओडिशा को विश्व कप हॉकी के मेजबानी सौंपी। 2018 में नवंबर-दिसंबर माह में भुवनेश्वर में जिस भव्य तरीके से 14वें विश्व कप हॉकी आयोजन किया गया उसकी प्रशंसा पूर्व व वत्र्तमान खिलाडिय़ों ने एकसुर में की। विश्व कप से पहले 15 फरवरी 2018 में ओडिशा सरकार ने भारतीय हॉकी के प्रायोजक बनने का भी जिम्मा लिया। अगले पांच सालों तक ओडिशा पुरूष व महिला हॉकी के सारे खर्च वहन करेगा। भारतीय हॉकी खिलाडिय़ों को ओडिशा नाम छपे जर्सी के साथ खेलने की वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओडिशा को लोग पहचानने लगे हैं। हॉकी के प्रति अपने विशेष प्रेम को दर्शाने हेतु  नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल घोषित करने की मांग की है।

 

भुवनेश्वर से सतीश शर्मा

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