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टोक्यो ओलंपिक में मणिपुर के खिलाडिय़ों ने दिखाया दम

टोक्यो ओलंपिक में मणिपुर के खिलाडिय़ों ने दिखाया दम

खेल जगत में मणिपुर की भूमिका काफी अहम रही है। यहां के खिलाडिय़ों ने हर बार पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया है। इस बार के टोक्यो ओलंपिक में भी मणिपुर का उल्लेखनीय योगदान रहा। टोक्यो ओलंपिक में  छह खिलाड़ी इस बार मणिपुर से ही चुने गए। ये हैं- मेरी कॉम (बॉक्सिंग), सुशीला चानू (महिला हॉकी खिलाड़ी), एस नीलकांता (पुरुष हॉकी), मीराबाई चानू (भारोत्तोलन), देवेंद्रो सिंह (बॉक्सिंग) और एल सुशीला देवी (जूडो) राष्ट्रीय खेलों में मणिपुर से खिलाड़ी अपना दम हमेशा दिखाते रहते हैं। वर्ष 2017 में अंडर-17 फुटबॉल विश्व कप में हिस्सा लेने वाली भारतीय महिला और पुरुष टीम में कुल आठ खिलाड़ी मणिपुर के ही थे।

टोक्यो ओलंपिक में पहली पदक (रजत) विजेता मीराबाई चानू की बात करें तो उनके छोटे से गांव नांगपोक काकचिंग में करीब हर युवा कोई न कोई खेल से जुड़ा हुआ है। फुटबॉल की लोकप्रियता तो देखते ही बनती है यहां बताया जाता है कि मणिपुर में प्राचीन काल से ही खेलों को लेकर सक्रियता रही है। मणिपुर में मूल रूप से मेतई समुदाय के लोग रहते हैं और लगभग 29 कबायली समुदाय हैं।

राजा कांगबा और राजा खागेम्बा के समय में खेल को काफी तरजीह दी गई। राजा कांगबा के समय मणिपुर के कुछ पांरपरिक खेलों की शुरुआत हुई, जैसे सगोल कांगजेई (जिसको वर्तमान में पोलो की तरह खेला जाता है) ऐसे कई पारंपरिक खेल, जैसे मुकना कांगजेई (फुट हॉकी जिसमें मणिपुरी कुश्ती भी होती है), सगोल कांगजेई (जिसको वर्तमान में पोलो की तरह खेला जाता है) थांगटा (मार्शल आर्ट) आज भी मणिपुर में खेले जाते हैं।

वर्ष 1891 में आंग्ल-मणिपुर युद्ध के बाद जब मणिपुर में अंग्रेजों का शासन आया, तब अंग्रेजों ने नए जमाने के खेलों जैसे फील्ड हॉकी, क्रिकेट, फुटबॉल से मणिपुर को रूबरू कराया। याइफबा बताते हैं कि अंग्रेज मणिपुर के लोगों की खेलने की क्षमता से बहुत प्रभावित हुए थे। ब्रिटिश सेना में अफसर रहे सर जेम्स जॉनस्टोन ने मणिपुर पर एक किताब लिखी, ‘मणिपुर एंड नगा हिल्सÓ जिसमें उन्होंने मणिपुर के पारंपरिक खेलों का जिक्र करते हुए स्थानीय लोगों की खेलों में कुशलता की प्रशंसा की। मणिपुर की सीमा से म्यांमार देश भी सटा हुआ है, इसलिए युवाओं को खेलों में डाला जाता था, जिससे वह सीमा की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहें।

मणिपुर एक छोटा राज्य है और अपनी सुरक्षा के लिए वह नागरिकों पर ज्यादा निर्भर रहता है। इतिहास में खेलों को मणिपुर में बढ़ावा देने का जिक्र जब भी होता है, तो राजा चूरचंद्र सिंह का नाम जरूर आता है, जिन्होंने खेल को बढ़ाने के लिए कई स्तर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया और मुफ्त में खेल के सामान भी बांटे। मीराबाई चानू ने ओलंपिक खेलों की भारोत्तोलन स्पर्धा में पदक का भारत का 21 साल का इंतजार खत्म किया। चानू ने क्लीन एवं जर्क में 115 किग्रा और स्नैच में 87 किग्रा से कुल 202 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। इससे पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने सिडनी ओलंपिक 2000 में देश को भारोत्तोलन में कांस्य पदक दिलाया था। चीन की होऊ झिऊई ने कुल 210 किग्रा (स्नैच में 94 किग्रा, क्लीन एवं जर्क में 116 किग्रा) से स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इंडोनेशिया की ऐसाह विंडी कांटिका ने कुल 194 किग्रा का वजन उठाकर कांस्य पदक हासिल किया।

लवलीना बोरगोहेन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत का एक दिलचस्प किस्सा सामने आया है। पीएम नरेंद्र मोदी ने लवलीना बोरगोहेन से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उनका जन्म गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को हुआ है। गांधी जी ने अहिंसा की बात की, जबकि वह अपने घूंसे के लिए प्रसिद्ध हैं। इसके बाद दोनों तरफ से जबरदस्त ठहाके गूंजे। पीएम मोदी ने लवलीना से कहा कि उनकी जीत हमारी नारी शक्ति की प्रतिभा और तप का प्रमाण है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सफलता हर भारतीय के लिए और विशेष रूप से असम और पूर्वोत्तर के लिए बहुत गर्व की बात है। बता दें कि 23 वर्ष की छोटी उम्र में लवलीना ओलंपिक जीतने वाली तीसरी खिलाड़ी बन गई है। उससे पहले ये कमाल बॉक्सर विजेंदर और मेरीकॉम कर चुके हैं। लवलीना ने अपने पहले ही ओलंपिक में ये कमाल कर दिखाया है। हालांकि वे गोल्ड या सिल्वर मेडल जीतने के लिए जिद ठाने बैठी थी लेकिन आज वे दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बुसानेज सुरमेनेली से हार गई। इससे पहले मुकाबले में वे 2019 की विश्व चैम्पियन तुर्की की सुरमेनेली से 0-5 से पराजित हो गई। हालांकि बॉक्सिंग के जानकारों का मानना है कि लवलीना का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे ओलंपिक दल को 15 अगस्त पर लाल किले की प्राचीर पर आमंत्रित किया है। दिन में बाद में वे खिलाडिय़ों को अपने सरकारी आवास 7 लोक कल्याण मार्ग पर आमंत्रित करेंगे। इनमें लवलीना भी शामिल होगी। मणिपुर के 26 वर्षीय नीलकांत शर्मा ने टोक्यो में भारत की पुरुष हॉकी टीम को कांस्य पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ओलंपिक हॉकी पदक के लिए 41 साल के लंबे इंतजार को समाप्त किया गया। भारोत्तोलक मीराबाई चानू के रजत के बाद, नीलकांत भारत को ओलंपिक पदक दिलाने में मदद करने वाले दूसरे मणिपुरी बन गए।

यहां बताता चलूं कि 12 साल की मीराबाई बचपन में ही भारी भरकम लकड़ी के गठ्ठर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलती थीं। इसी दौरान पूर्व अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर और कोच अनीता चानू की उन पर नजर पड़ी और वो मीराबाई की जिंदगी की दिशा ही बदल गई। 2008 के बीजिंग ओलंपिक को छोड़ दें, तो मणिपुर ने पांच ओलंपिक में चार अलग-अलग महिला वेटलिफ्टर्स को भेजा था। इस कोशिश को मीराबाई ने टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर अंजाम तक पहुंचाया। उनसे पहले कुंजारानी देवी और संजीता चानू भी इस खेल में मणिपुर का परचम बुलंद कर चुकी हैं।

संजय सिन्हा

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