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गांव का सरपंच बना देश का स्वर्ण पुरूष

गांव का सरपंच बना देश का स्वर्ण पुरूष

एथेलेटिक में देश का नया भाग्य लिखने वाले नीरज चोपड़ा की गौरवगाथा के कई चर्चे हैं लेकिन कुछ जानकारियां लोगो तक पहुंची भी नहीं है। टोक्यो ओलंपिक में सोना जीतकर लाए हरियाणा के पानीपत के निकटस्थ एक गांव के इस बंदे ने भाला फेंकने में कोई अवार्ड जीतने की तो क्या इस अजीब से लगने वाले खेल के बारे में कभी सोचा भी न था। रोचक बात यह थी कि किशोर उम्र में तो नीरज का वजन 80 किलो के आसपास हो गया था। मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि लोगों द्वारा हंसी उड़ाए जाने से तंग आकर नीरज ने मात्र छह महीने की मेहनत में शरीर की ऐसी साधना की कि उनकी उक्त फिटनेस ने उन्हें एक दिन मिलने वाली अंतराष्ट्रीय पहचान का पहला और अंतिम  दस्तखत कर दिया और आज उन्हें संसार गोल्डन बॉय के टाइटल से नवाजने लगा है।

यूं हरियाणा और पंजाब के लड़के जो न कर जाए कम है। खेल-कूद सेना में जाना खेती-बाड़ी करना, अखाड़ों में रियाज करके पहलवानी करना नई नस्लों की रग-रग में आज भी पहले जैसा समाया हुआ है। नीरज चोपड़ा स्वयं बताते हैं कि दस साल की उम्र में ही उन्होंने एक मैदान में कुछ बच्चों को भाला उर्फ जैवलिन की स्पर्धा करते हुए देख लिया था। उन्होंने बस वहीं से भाला फेंकने में नाम कमाने की ठान ली, लेकिन किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले नीरज के घर में 17 सदस्यों का परिवार था। आगे की पढ़ाई लिखाई के लिए उनका चंडीगढ़ आना हुआ।

इसी शहर में भाला फेंकने की प्रैक्टिस का काम आगे बढ़ा। नीरज चोपड़ा ने एथेलिटिक्स में 121 साल में देश के भाल पर स्वर्ण तिलक लगाया है। इस भाले को उन्होंने 87.59 मीटर फेंककर स्वर्ण जीता। इस गोल्डन बॉय के एक भाले की कीमत 110 हजार रुपए बताई जाती है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नीरज के पास प्रेक्टिस के लिए कुल चार भाले हैं। इन्हें स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने जुटाया है। चारों भालों की कीमत 4.35 लाख बताई जाती है। जान लें कि ओलंपिक के नियमों के अनुसार पुरूष भाले की लंबाई 2.6 से 2.7 मीटर होती है और वजन 800 ग्राम। संयोग से कोविड-19 की पहली आमद के पहले ही भारत सरकार ने खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी की स्थापना कर दी थी। उसी के तहत नायकों के नायक नीरज की प्रैक्टिस, फिटनेस, ट्रेनिंग, ट्रीटमैंट आदि पर लगभग 7 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 2016 के रियो ओलंपिक के बाद स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने 12 लाख 65 हजार रुपए ओलंपिक ओडियम (TOPS) के तहत व्यय किए। वहीं ए. सी. पी .सी. के तहत 1 करोड़ 29 लाख रुपए खर्च किए गए। इसी के तहत नीरज  चोपड़ा को भी प्रशिक्षण दिया गया।

मीडिया की खबरों के अनुसार नीरज की जैवलिन थ्रो में विश्व स्तरीय परवरिश के लिए उन्हें विभिन्न विश्व प्रतियोगिताओं में भेजा गया, जिसका कुल खर्च आया 4 करोड़ 85 लाख 39 हजार  629 रुपए। नीरज चोपड़ा के विदेशी कोच को वेतन के रुपए में कुल 12 लाख 224 हजार 800 रुपए का भुगतान किया गया। पहले कोच कोई और थे। लेकिन वर्तमान कोच ऑन होन है। नीरज के इन कोच को चूंकि भारत का मौसम नही जमा तो वे उन्हें विदेश ले गए। कोई खेल हो, उसमें शारीरिक, मानसिक शक्ति, ऊर्जा तैयारी जैसी बुनियादी चीजों की आवश्यकता, तो होती ही है, नीरज चोपड़ा को तो घी, दूध आदि शाकाहार से मांसाहार पर भी शिफ्ट होना पड़ा। इसके अलावा उचित तकनीक और विज्ञान की जरूरत भी पड़ती है। एक सेकंड की चूक से सोना सिल्वर या ब्रॉन्ज में ही नहीं मिट्टी में भी मिल सकता है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में नीरज चोपड़ा जो 23 वर्षीय हैं और अपने गांव में किशोरावस्था में मोटापे के कारण सरपंच भी कहलाते थे, की टोक्यो ओलंपिक में जेविलयन थ्रो में अंतिम दूरी को लेकर फाइनल आंकड़ा जरा सा फर्क वाला है।

नवीन जैन

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