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समय है टॉप्स पे जाने का

समय है टॉप्स पे जाने का

हर चार साल बाद जब ओलंपिक का मौसम आता है तो ये सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है कि हममें वह काबिलियत क्यों नहीं।

ये सवाल हमें लगातार शर्मिंदा करता है कि हमारे कुल घरेलू उत्पाद की दर जहां दुनिया के समृद्ध देशों को भी पीछे छोड़ रही है, वहीं हम अंतर्राष्ट्रीय खेलों के पहले पायदान पर भी नहीं पहुंच पाए। आरोप-प्रत्यारोप के इस चक्र में शक की सुई घूम कर जाती है, खेल अधिकारियों की ओर, जिन्होंने खेल का स्तर सुधारने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया।  खेल संगठनों में पनपते भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और निहित स्वार्थ के कारण एक अरब से ज्यादा की हमारी आबादी मात्र दर्शक बनी रह गई। आंकड़ों को देखा जाए, तो दुनियाभर में, खेलों की लोकप्रियता बढ़ाने में हमारा सबसे बड़ा योगदान है। लेकिन भारत में कितने खिलाड़ी हैं और कितने दर्शक, ये अंतराल भी दुनिया के किसी और देश मे नहीं होगा।

हर 4 साल बाद जब ओलंपिक खेलों का मौसम आता है, और बातें छिड़ती हैं कि कौन सा देश कितने पदक ले जाएगा, तब भी यही सवाल हमारे सामने फिर आ खड़ा होता है कि हममें वह काबिलियत क्यों नहीं।  सौभाग्य से हमें अभिनव बिंद्रा मिल गए, जिनकी वजह से ओलंपिक में स्वर्ण पदक न जीत पाने की शर्मिंदगी कम हुई, लेकिन खेलों के औसत स्तर को आज भी न छू पाने का मलाल तो अपनी जगह रहेगा ही।  इस सवाल का जवाब काफी जटिल है, और यहां इसकी परतों को खोलने की कोशिश करना भी बेकार होगा।

ऐसा नहीं है कि देश में खेल प्रतिभाओं की कमी है। कमी है तो उन्हें तलाशने-तराशने वाले एक भरोसेमंद तंत्र की। जिन खेल संघों पर खिलाडिय़ों की खोज करने और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं लायक तैयार करने की जिम्मेदारी है वे नाकाम हैं। खेलों में भारत की दयनीय स्थिति इसलिए और अधिक निराश करने वाली है, क्योंकि भारत युवाओं का देश है और इस तथ्य का राजनेता एक बड़े अवसर के रूप में जमकर उल्लेख भी करते हैं। यह विंडबना ही है कि इस बड़ी युवा शक्ति को सही दिशा देने की ओर किसी का ध्यान नहीं है। युवाओं के अपने विकास और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सुनिश्चित करने की दृष्टि से अभी बहुत काम होना बाकी है।

आज के समय में खेल देशों की प्रतिष्ठा और वहां के निवासियों की तरक्की आंकने की एक कसौटी भी बन चुके हैं। इस लिहाज से भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत पिछड़ा हुआ है। एक-दो खेलों को छोड़ दिया जाए तो यह नहीं कहा जा सकता कि देश में खेलों के प्रति वैसा उत्साह है जैसा होना चाहिए। भारत ने अपनी मेधाशक्ति के बल पर अंतरिक्ष विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के साथ-साथ कुछ अन्य क्षेत्रों में अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं, लेकिन यही बात खेलों के मामले में नहीं कही जा सकती। इसका कारण यह है कि जैसे मेधावी बच्चों की पूछ-परख होती है वैसी खेलों में दक्ष बच्चों की नहीं होती, जबकि ऐसा अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। इससे ही विशाल युवा शक्ति को सही दिशा मिलेगी।

देश को TOP पर लाने का मॉडल

देश बदल रहा है और इस बदलाव के नए पोस्टर बॉय हैं नीरज चोपड़ा। नीरज चोपड़ा  के ऐतिहासिक गोल्ड मेडल के साथ टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत का सुनहरा सफर समाप्त हो गया है। भारत ने टोक्यो में अपना सबसे बड़ा खिलाडिय़ों का दल उतारा था।  जिसमें भारत ने एक गोल्ड के साथ कुल 7 मेडल जीते। इसके साथ ही भारत ने ओलंपिक में अपने पुराने रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।  इससे पहले भारत ने लंदन ओलंपिक में 6 मेडल अपने नाम किये थे। आखिर यह बदलाव आया कैसे? साल 2014 में मोदी  सत्ता में आने के बाद इस देश में बहुत सारे बदलाव आये हैं और खेलों में यह उत्कृष्ट प्रदर्शन भी उसी बदलाव के बयार का एक हिस्सा है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता की भारत के ओलंपिक सफर में कहीं न कहीं केंद्र सरकार की भी बड़ी भूमिका रही है। मोदी सरकार की टॉप्स नीति के कारण ओलंपिक में भारत के सितारे चमक रहे हैं। सितम्बर 2014 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एथलीटों की मदद के लिए टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम की शुरुआत की। इसी नीति का नतीजा है कि भारत ने टोक्यो ओलंपिक में अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया है।

क्या है टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम

टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (ञ्जह्रक्कस्) को मोदी सरकार ने सितंबर 2014 को लॉन्च किया। इस योजना के तहत देशभर के ऐसे खिलाडिय़ों का चुनाव करना है, जो भारत को ओलंपिक और पैरालंपिक में पदक दिला सकें। ऐसे खिलाडयि़ों का चुनाव कर सरकार उनके लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करती है।

इस योजना के तहत खिलाडिय़ों तैयारी के लिए आर्थिक मदद करना। उन्हें तैयारी के लिए दुनिया के टॉप कोच उपलब्ध कराना। उनके अभ्यास के लिए जो भी आवश्यकता हो पूरा कराया जा रहा है। पीवी सिंधु ने भी इस योजना के तहत टोक्यो ओलंपिक के लिए तैयारी की।

ओलंपिक 2020 की भारत की तैयारियों को मजबूत करने के लिए टॉप्स सचिवालय भी बनाया गया। टॉप्स के जरिए सरकार ने 2020 ओलंपिक के संभावित पदक विजेताओं को ही सहायता मुहैया नहीं कराया बल्कि 2024 और 2028 ओलंपिक खेलों के पदक के दावेदार डेवलपमेंट समूह के खिलाडिय़ों को सहायता देकर भविष्य की प्रतिभाओं की भी मदद कर रही है। इस स्कीम के फायदे के बारे राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज अनीष भानवाला का कहना है की, ‘टॉप्स में चयन हमें सुरक्षा की भावना देता है और हमारा मनोबल बढ़ता है कि हमारे अंदर अच्छा प्रदर्शन करने की क्षमता है और सरकार हमारा पूरा समर्थन कर रही है। वे खिलाड़ी की जरूरत के अनुसार सभी जरूरी विश्व स्तरीय सुविधा मुहैया कराते हैं जो काफी मददगार होता है।’

ओलंपिक में चोपड़ा, मीराबाई चानू पुनिया ने जो उपलब्धि हासिल की है उसके बाद कुछ राज्यों ने उन पर पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है। ये खिलाड़ी जिन राज्यों की निवासी हैं उनमें पहले से ओलंपिक पदक विजेताओं के लिए निश्चित इनामी राशि का प्रावधान है, लेकिन जो दूसरे राज्य पुरस्कारों की बारिश कर रहे हैं वे राजनीतिक होड़ से प्रेरित नजर आ रहे हैं। राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि केवल पदक जीतने पर इनाम की बारिश से बात बनने वाली नहीं है। आखिर खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन देने के लिए उनके ओलंपिक में सफल होने तक इंतजार क्यों करना चाहिए? क्या खिलाडिय़ों को समय रहते यह अहसास नहीं कराना चाहिए कि अगर वे खेल में कॅरियर बनाकर देश का नाम रोशन करने को तत्पर हैं तो उनकी आजीविका के लिए सरकार के पास पर्याप्त इंतजाम हैं? खिलाडिय़ों को आर्थिक सुरक्षा का अहसास सार्वजनिक उपक्रम यानी सरकारी विभाग ही करा सकते हैं। देश में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जब विश्व स्तर पर देश का नाम चमकाने वाले खिलाड़ी को अपना अंतिम समय बेहद कष्ट भरे माहौल में गुजारना पड़ा। किसी के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे तो कोई अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए अपने पदक तक बेचने के लिए मजबूर था। ऐसे उदाहरण खिलाडिय़ों को हतोत्साहित करते हैं।

इसलिए यह आवश्यक था कि ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बने जिससे एक खिलाड़ी शुरुआत से ही अवगत हो कि उसे आगे बढऩे पर क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी। और यही काम मोदी सरकार के खेल मंत्रालय और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मिलकर टॉप्स (ञ्जह्रक्कस्) के तत्वाधान में किया है। अपने देश में खेलों में नई प्रतिभाओं के उभरने में जरूरत से ज्यादा समय लगता है और इसका एक बड़ा कारण यह है कि स्कूलों के स्तर पर प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों की पहचान की कोई मशीनरी ही उपलब्ध नहीं है। किशोरों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों में जाता है, लेकिन इन स्कूलों में पठन-पाठन के प्रति ही गंभीरता और समर्पण का अभाव है। जाहिर है कि ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि ये स्कूल खेलों को बढ़ावा देने में जी-जान से जुटेंगे। सरकारी स्कूलों में खेलों के लिए बजट इतना कम है कि उससे राज्य स्तर के खिलाड़ी ही तैयार नहीं हो सकते। देश में खेलों के विकास के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन मिले।

उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो यह कदम उठाया है वह खेल ढांचे और साथ ही खेल संस्कृति के निर्माण की दिशा में जो कुछ किया जाना है उसकी पूर्ति अच्छे से करेगी देश भविष्य में ऐसे ही ओलंपिक पदक तालिका में आगे बढ़ता जायेगा।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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