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खेल नीति से दिखने लगी मैदान में चमक

खेल नीति से दिखने लगी मैदान में चमक

ओलंपिक के सवा सौ साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत ने सात पदक जीते हैं। एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या और दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए यह उपलब्धि कुछ खास नहीं है। लेकिन अतीत की ओर झांके तो यह उपलब्धि भी कम नहीं है। इसके पहले भारत ने लंदन ओलंपिक में छह पदक जीते थे। इस बार भाला फेंक में नीरज चोपड़ा को स्वर्ण मिला है, जबकि भारोत्तोलन में मीरा बाई चानू और कुश्ती में रवि दहिया रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। भारत के खाते में चार कांस्य पदक आए, जिनमें बैंडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु, बॉक्सिंग में लवलीना बोर्गोहेन, कुश्ती में स्टार पहलवान बजरंग पूनिया और भारतीय हाकी टीम शामिल रही। इसके अलावा पहलवान सतीश पूनिया और महिला हॉकी टीम के साथ ही गोल्फर अदिति अशोक ने भले ही पदक नहीं जीते, लेकिन उन्होंने देश का दिल जीत लिया। ये चौथे स्थान पर रहे।

बेशक दुनिया परमाणु हथियारों से आगे के दौर में पहुंच गई है। कई देश अंतरिक्ष तक में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हैं। आज के दौर में आर्थिक महाशक्ति बनकर, सैनिक ताकत बढ़ाकर और अंतरिक्ष में कामयाबी के झंडे फहराकर ही ताकत और प्रतिष्ठा नहीं हासिल की जा रही, बल्कि खेलों की दुनिया में सफलता हासिल करके वैश्विक राजनीति में अपनी ताकत का लोहा मनवाया जा रहा है। ऐसे माहौल में भारत का खेलों की दुनिया में ऐसा प्रदर्शन बहुत संतोष जनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरह टोकियो ओलंपिक में खिलाडिय़ों ने अपना दमखम दिखाया और पदकों पर निशाना साधा, उससे संकेत साफ हैं। आने वाले दिनों में देश खेलों के मोर्चे पर भी अपना वैश्विक वर्चस्व दिखाने में कामयाब रहेगा। इसकी बड़ी वजह केंद्र की मोदी सरकार की दीर्घकालिक योजनाएं मानी जा रही है।

ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए केंद्र की सत्ता संभालते ही मोदी सरकार ने सितंबर 2014 में टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम शुरू की थी। अप्रैल 2018 में इसमें कुछ बदलाव किये गए। जो खिलाडिय़ों को सहूलियत देने के लिहाज से बेहतर माने जा सकते हैं। इसके तहत कोर ग्रुप में खिलाडिय़ों का चुनाव किया गया। इन चुने हुए एथलीटों को पचास हजार रूपए महीने का भत्ता दिया जाना शुरू हुआ। इसी तरह इस योजना के तहत डेवलपमेंट ग्रुप का चुनाव हुआ। इन समूह के खिलाडिय़ों को 25 हजार रूपए महीने दिया जाता है। फिलहाल कोर ग्रुप में हॉकी खिलाडिय़ों के साथ 162 खिलाड़ी और डेवलपमेंट ग्रुप में 254 एथलीटों को चुना गया है। जाहिर है कि इन भत्तों के सहयोग से खिलाडिय़ों को बहुत सहूलियत हुई है। हॉकी, पहलवानी और ऐसे खेलों में बहुत सारे खिलाड़ी कमजोर आयवर्ग से आते हैं। उनके लिए अपना खान-पान आदि के लिए ही संघर्ष करते रहना पड़ता था। लेकिन मोदी सरकार की इस योजना से अब कम-से-कम खिलाडिय़ों को इस तरह के संघर्षों का सामना करना नहीं पड़ता।

मोदी सरकार ने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के तहत ना सिर्फ खिलाडिय़ों का ध्यान रखना शुरू किया है, बल्कि उनके कोच, खिलाडिय़ों की कोचिंग, उनके उपकरण खरीदने में भी मदद की जाती है। इसके साथ ही सरकार की ओर से खिलाडिय़ों को सहयोगी स्टाफ मसलन फिजियोथिरेपिस्ट और फिजिकल ट्रेनर भी मुहैया कराए जा रहे हैं। पहले खिलाडिय़ों को एक-एक सुविधा के लिए तरसना पड़ता था या फिर अपने लिए प्रायोजक ढूंढऩा पड़ता था। लेकिन मोदी सरकार ने कम-से-कम इस समस्या से उन खिलाडिय़ों को मुक्त कराया है, जो प्रतिभाशाली तो हैं। लेकिन उनके पास प्रायोजक नहीं है।

यह केंद्र सरकार का सकारात्मक रूख ही है कि भारत भाला फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण हासिल करने पर झूम रहा है। इसके चैंपियन नीरज चोपड़ा पर भारत सरकार ने करीब सात करोड़ रूपए खर्च किए हैं। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, सरकार ने टोक्यो ओलंपिक तक 450 दिनों में नीरज की ट्रेनिंग और ओवरसीज कम्पटीशन के लिए 4 करोड़ 85 लाख 39 हजार 638 रुपये खर्च किए हैं। इसके साथ ही उनकी कोहनी के मार्च 2019 में हुए ऑपरेशन के बाद डॉ. क्लॉज बर्तोनेट्स को उनका निजी कोच बनाया गया। उनके वेतन पर केंद्र सरकार ने अब तक एक करोड़ 22 लाख 24 हजार 880 रुपये खर्च किए हैं। इतना ही नहीं, चार लाख 35 हजार रूपए से नीरज के लिए चार भाले खरीदे गए। अभी 2021 बीतने में पांच महीने बाकी हैं। लेकिन इसी साल अब तक नीरज पर 19 लाख 22 हजार 533 रुपये खर्च हुए हैं। टोकयो ओलंपिक में हिस्सा लेने के पहले नीरज ने यूरोपियन टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने के लिए स्वीडन में 50 दिन का कैंप भी किया था। यह खर्च भी सरकार ने ही उठाया है।

भारत में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना खेलो इंडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान है। जिसकी शुरूआत 21 जनवरी 2018 को हुई। इसके तहत हर साल दो तरह की प्रतियोगिताएं होती हैं। जिनमें एक सत्रह साल तक के बच्चों के लिए खेलो इंडिया युवा खेल स्कूल और 21 साल तक के युवाओं के लिए खेलो इंडिया युवा खेल कॉलेज होते हैं। मोदी सरकार इसके जरिए खिलाडिय़ों को उभारने की दिशा में कोशिश कर रही है। खेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत तीन हजार खिलाडिय़ों की केंद्र सरकार सहायता कर रही है। इसके तहत एथलीटों को हर साल छह लाख 28 हजार की मदद दी जाती है। इसमें उनके प्रशिक्षण के खर्च के अलावा हर महीने उन्हें मिलने वाला दस हजार रूपए महीने का भत्ता भी शामिल है।

भारत ने हाल के वर्षों में अपना खेल बजट बढ़ाया है। अभी वित्त वर्ष 2021-22 में आधा वक्त बाकी है। राज्यसभा में प्रस्तुत एक आंकड़े के मुताबिक सरकार ने अब तक टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के तहत चार अगस्त तक ही 12.48 लाख करोड़ खर्च कर चुकी है। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के तहत सरकार साल 2018-18 में 14.3 लाख करोड़, 2019-20 में 12.41 लाख करोड़ और 2020-21 में 12.48 लाख करोड़ खर्च किया है। इतना ही नहीं, ओलंपिक, एशियाड और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए सरकार की ओर से राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता योजना के तहत कैंप करने, प्रशिक्षण आदि के लिए खिलाडिय़ों को भी मदद  जा रही है। इस योजना के तहत 2018-19 में केंद्र सरकार ने 244 करोड़, 2019-20 में 301 करोड़ और 2021-21 में 152 करोड़ रूपए की मदद दी गई।

एक दौर था, जब खिलाडिय़ों को अपनी सुविधाएं खुद ही जुटानी पड़ती थीं। लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री हर खेल और खिलाड़ी में दिलचस्पी ले रहे हैं। ओलंपिक में जाने के पहले सभी खिलाडिय़ों से खुद उन्होंने बात की। पदक जीतने के बाद उन्होंने हर खिलाड़ी को फोन किया। महिला हॉकी टीम जब चौथे स्थान के मैच में हारकर रो रही थी, तभी प्रधानमंत्री ने उसे फोन किया और खिलाडिय़ों का मनोबल बढ़ाया। जाहिर है कि इस सराहना और दिलचस्पी ने खिलाडिय़ों का मनोबल बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है।

पूर्व खेल मंत्री किरिन रिजिजू ने कहा भी है कि भारत का लक्ष्य 2028 के ओलंपिक पर है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार जिस तरह खिलाडिय़ों, खेल संघों और खेल संस्थानों को मदद दे रही है, खेलो इंडिया के जरिए खिलाडिय़ों को निखारने और खोजने का अभियान जारी है, उससे आने वाले दिनों में भारत खेल के मैदानों में भी वैसे ही अपनी धाक जमाएगा, जैसे अंतरिक्ष की दुनिया में जमा चुका है। निश्चित तौर पर इसका सबसे ज्यादा मददगार खिलाडिय़ों की अपनी प्रतिभा और मेहनत होगी, लेकिन उस मेहनत की सफलता के पीछे सरकारी संरक्षण और खेलों के प्रति सकारात्मक रूप से बदली भारतीय नीति भी होगी।

 


उमेश
चतुर्वेदी

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