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स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : संगठित समाज का साकार होता सपना

स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : संगठित समाज का साकार होता सपना

देश की स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। स्वाधीनता के इन 75 वर्षों में देश में असंख्य परिवर्तन हुए हैं। बहुत सारे परिवर्तन यदि सकारात्मक हैं तो बहुत सारे परिवर्तन नकारात्मक भी हैं। स्वाधीनता के बाद यदि देश का द्रुत गति से विकास हुआ है तो दूसरी ओर राजनीतिक दूषण, नैतिक पतन, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि भी पर्याप्त बढ़ा है। देश में एकात्मकता बढ़ाने वाली शक्तियों की सक्रियता काफी बढ़ी है तो देशतोड़क ताकतें भी अपनी पूरी सामर्थ्य से प्रदर्शन में जुटी हैं। कुल मिला कर वर्तमान काल देश के लिए एक परिवर्तन का संधिकाल है। संधिकाल चाहे युगों का होता हो या फिर ऋतुओं का, व्यक्ति और राष्ट्र के लिए सावधानी बरतने का काल होता है। ऐसी सतर्कता के काल में एक संगठन अपने सौ वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है। एक ऐसा संगठन जो विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन होने के बाद भी पूरी विनम्रता और प्रसिद्धि परांगमुखता के साथ देश में राष्ट्रीय एकात्मकता को मजबूत करने के अपने कार्य में निमग्न है। यह संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज देश ही नहीं, विश्व में किसी भी सामाजिक व्यक्ति के लिए अनसुना नाम नहीं है। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता रखने वाला कोई भी व्यक्ति संघ के विचारों से सहमत हो या असहमत, परंतु वह उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे विश्व में एक विशाल तथा शक्तिशाली हिंदू संगठन के रूप में उभरा है। स्वाभाविक ही है कि देश की स्वाधीनता की इस 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश में हुए सामाजिक पुनर्जागरण में उसके योगदान को स्मरण करने का यह सर्वोपयुक्त समय है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के सीमोल्लंघन उत्सव के पुण्य अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और तब से देश में आने वाले राजनीतिक उतार-चढ़ावों के बीच संघ ने अपनी सहज भूमिका से अपना एक अभिनव स्थान बनाया है। वर्ष 1940 में डॉ. हेडगेवार की मृत्यु के बाद मात्र 33 वर्षीय तरूण माधवराव गोलवलकर को जब सरसंघचालक बनाया गया था, तो संघ के भविष्य को लेकर संघ के कार्यकर्ताओं तक में आशंका व्याप्त थी। परंतु चाहे देशविभाजन की विभिषिका रही हो या फिर विभाजित स्वाधीनता मिलने के बाद हुई गांधी जी की हत्या और उसके बाद संघ पर लगा क्रूर प्रतिबंध रहा हो, श्रीगुरुजी के नाम से विख्यात सरसंघचालक गोलवलकर ने अपने तारुण्य को आड़े न आने दिया, बल्कि उन्होंने उन विकट क्षणों में जिस अद्भुत गांभीर्य और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया, उसने देश को दूसरे विभाजन से बचा लिया, अन्यथा तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने तो देश के दूसरे सामाजिक विभाजन की पटकथा लिख दी थी।

हिंदू राष्ट्र का संरक्षण, संवर्धन और विकास ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल रहा है और उनका यह दृढ़ विचार है कि हिंदू ही भारत का राष्ट्रीय है। हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व की अवधारणा, संघठन करने की एकमात्र कार्यपद्धति और राष्ट्र को परमवैभव पर पहुंचाने के एकमेव लक्ष्य को सामने रख कर पिछले 96 वर्षों से संघ ने जो साधना की है, उसका परिणाम राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में दिखने लगा है। संघ के तपस्वी तथा सेवाभावी कार्यकर्ताओं के पुण्यप्रकाश कुछ इस प्रकार से देश में फैला है कि आज राष्ट्रीय जीवन के किसी भी आयाम में उन पर विचार किये बिना कार्य नहीं किया जा सकता। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निस्वार्थ तथा मौन तपस्या का ही परिणाम है कि आज देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदों पर उसके प्रशिक्षित स्वयंसेवक आसीन हैं। जीवन के हरेक क्षेत्रों में संघ द्वारा अनुप्राणित तथा प्रशिक्षित लोग नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं और देश को नई दिशा देने में जुटे हैं। आइए, देखते हैं कि स्वाधीनता के इस 75वीं वर्षगांठ पर अपने सांगठनिक जीवन के 96वें पड़ाव पर संघ एक संगठन से कैसे एक विशालकाय आंदोलन में परिवर्तित हुआ और उसने देश में परिवर्तन की कैसी लहर उत्पन्न की है।

एकात्मता की रक्षा

इस संदर्भ में विचारणीय बात यह है कि संघ के स्वयंसेवकों ने विविध आयामों में संघ के संगठन विस्तार की योजना से काम खड़े नहीं किए। उन क्षेत्रों की परिस्थितियों के समाधान के लिए उन्होंने प्रयास प्रारंभ किए और उसके परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं का विकास होता गया। इसका एक प्रमुख उदाहरण है वनवासी कल्याण आश्रम। वनवासी यानी कि देश के जनजातीय समाज के लोग। यूरोपीय ईसाइयों के विश्व संचार की व्यापकता बढऩे से अफ्रीका, अमेरिका आदि महादेशों में तो वहां के स्थानीय निवासियों की उन्होंने बड़े पैमाने पर हत्या कर दी थी। मात्र 2-3 सौ वर्षों में वहां 25 करोड़ लोग मार दिए गए थे। परंतु भारत में यह करना कठिन था, क्योंकि यहां की राज्य व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी और समाज उनकी तुलना में अत्यधिक उन्नत, सभ्य तथा संगठित था। फिर भी ईसाई मिशनरियों ने वनों में रहने वाले समुदायों को ढूंढा और उनके बीच अलगाववाद तथा मतांतरण का काम प्रारंभ किया। 15 अगस्त, 1947 में अंग्रेजों के भारत छोडऩे के बाद भी इन ईसाई मिशनरियों ने भारत के स्वाधीन तथा संप्रभु शासन को स्वीकारने से इनकार कर दिया। हालांकि वे पूरे देश में तो क्या किसी एक राज्य में भी प्रभावी नहीं थे, परंतु वर्तमान छत्तीसगढ़ तथा तत्कालीन मध्य प्रदेश के जसपुर इलाके में उन्होंने भारतीय शासन को मानने से इनकार कर दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रवि शंकर शुक्ल जब जसपुर गए तो मिशनरियों ने कुछ घंटे तक उनके हैलिकॉप्टर को नीचे नहीं उतरने दिया। उन्हें काले झंडे दिखाए गए, उनके खिलाफ नारे लगाए गए।

इस विषम परिस्थिति में उन्हें संघ का स्मरण हुआ। उन्होंने संघ के सरसंघचालक श्रीगुरुजी से संपर्क किया और उन्हें बताया गया कि राजनीतिक कारणों से उनकी जेल में बंद एक व्यक्ति इस स्थिति को बदल सकता है। उस व्यक्ति का नाम था रमाकांत केशव देशपांडे जिन्हें बाला साहेब देशपांडे भी कहा जाता था। पंडित रवि शंकर शुक्ल ने बाला साहेब देशपांडे को मुक्त किया और उन्हें कार्य करने की अनुमति दी। इस प्रकार जसपुर में वर्ष 1952 में वनवासी कल्याण आश्रम का जन्म हुआ। वनवासी कल्याण आश्रम ने जनजातीय क्षेत्रों में चल रहे समस्त अलगाववादी तथा मतांतरणसंबंधी कार्यों से वनवासी समाज को मुक्त करने, देश के साथ उनकी एकात्मकता को और मजबूत करने तथा वनवासियों की समस्याओं को दूर करने के लिए अथक प्रयास किए। वनवासी बंधुओं में शिक्षा के प्रसार के तथा उनकी स्वास्थ्यसंबंधी समस्याओं के समाधान के लिए अनेक प्रकल्प प्रारंभ किए। उनमें से अनेक प्रकल्प इतने विशाल बन गए कि वे आज वनवासी कल्याण आश्रम से पृथक संगठन बन चुके हैं। उदाहरण के लिए कल्याण आश्रम ने वन टीचर वन स्कूल की अवधारणा पर आधारित एकल विद्यालय प्रारंभ किए। इसके तहत वनवासी क्षेत्रों में उनके गांव के ही किसी पढ़े-लिखे युवक या युवति को प्राथमिक विद्यालय चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। उन्हें मासिक वेतन भी दिया जाता है और विद्यालय चलाने के लिए आवश्यक सभी संसाधन भी। यह सारा प्रयास शनै: शनै: इतना बड़ा हुआ कि आज 70 हजार से अधिक एकल विद्यालय देश में चल रहे हैं। ये सभी विद्यालय बिना किसी सरकारी सहायता के केवल समाज के सहयोग से चल रहे हैं। इन विद्यालयों से पढ़ कर निकले बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए छात्रावास तैयार किए गए, ताकि वे शहरों में रहकर अपनी पढ़ाई आगे जारी रख सकें। वर्तमान में ऐसे 18 आवासीय विद्यालय चल रहे हैं।

इसी प्रकार वनवासी कल्याण आश्रम की एक योजना वनवासियों को उनके मूल सनातन धर्म के साथ संबंधों को मजबूत बनाने की थी। इसके लिए उनके बीच रामकथावाचक तैयार किए गए। वनवासी युवाओं को इसका प्रशिक्षण दिया गया। उनकी टोलियां बनाई गईं। यह काम भी काफी बढ़ा और इससे कई हरि सत्संग समिति, वनवासी रक्षा परिवार नए संगठनों का विकास हुआ। इतना ही नहीं, जनजातीय समाज के विभिन्न मुद्दों और उनके देश के शेष समाज के साथ एकात्मकता के सूत्रों को उजागर करने के लिए बड़ी संख्या में शोध कार्य भी किए गए हैं। ऐसे कई सारे नए आयामों को नए संगठनों के रूप में विकसित करते हुए वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य विस्तार पूरे देश में हुआ। पूर्वोत्तर राज्यों में भी कल्याण आश्रम ने विशेष प्रयास करके कार्य खड़ा किया। आज देश के जनजातीय समाज को अलग करने वाले समस्त षड्यंत्रों का एकमात्र उत्तर वनवासी कल्याण आश्रम ही दे रहा है।

राष्ट्रीय एकात्मता को पुष्ट करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम के अलावा और भी अनेक प्रयास संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे हैं। भारत-तिब्बत मंच के माध्यम से देश के सीमावर्ती इलाकों में कार्य किया जा रहा है। भारत रक्षा मंच देश के अंदर चलने वाली देशविरोधी गतिविधियों को उजागर करने के कार्य में संलग्न है। पूर्व में अनेक युद्धों में भी संघ के स्वयंसेवकों ने उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया है। उदाहरण के लिए वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध में संघ के स्वयंसेवकों के योगदान से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रण दिया था।

शिक्षा

किसी भी समाज की रचना का मूल आधार वहां की शिक्षा होती है। इसलिए भारतीय समाज पर शासन करने के लिए उसे विखंडित करने हेतु अंग्रेजों ने यहां शासनाधारित शिक्षा पद्धति का प्रारंभ किया। उससे पहले देश में शिक्षा का संचालन समाज ही किया करता था। अंग्रेजी शिक्षा का प्रारंभ होने के साथ ही उसका विरोध भी देश में प्रारंभ हो गया था। स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद, महात्मा गांधी जैसी विभूतियों ने अंग्रेजी शिक्षा को हटाने और भारतीय शिक्षा की पुनर्स्थापना के लिए अथक प्रयास किए। स्वाधीनता के बाद दुर्भाग्य से स्वाधीन सरकारों ने अंग्रेजी शिक्षा को ही जारी रखा। इस शिक्षा के भारतीयकरण करने के ढेर सारे प्रयास विभिन्न संस्थाओं द्वारा देश में प्रारंभ हुए। इनमें से एक सबसे सशक्त प्रयास संघ के स्वयंसेवकों द्वारा विद्या भारती के रूप में किया गया। विद्या भारती का प्रारंभ एक विद्यालय से किया गया था। उस समय केवल इतनी कल्पना की गई थी कि वर्तमान शिक्षा के साथ-साथ भारतीयता के संस्कार भी बच्चों को दिए जाएं। इस कल्पना के साथ प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर प्रारंभ हुआ जोकि आज देश का सबसे बड़ा गैरसरकारी शिक्षा तंत्र बन चुका है।

विद्यालयों का संचालन करते हुए संघ के स्वयंसेवकों ने यह अनुभव किया कि सरकारी पाठ्यक्रमों में भी ऐसा बहुत कुछ है जो अभारतीय है, अथवा अपने ही देश को हीन साबित करने के लिए लिखा गया है। स्वयंसेवकों ने इस पर कार्य प्रारंभ किया और इस प्रकार शिक्षा बचाओ आंदोलन का जन्म हुआ। शिक्षा बचाओ आंदोलन ने एनसीईआरटी की पुस्तकों से बड़ी संख्या में ऐसे उद्धरण और तथ्य निकाल कर दिये जो या तो गलत थे या जिनकी व्याख्या गलत थी। ऐसे गलत तथ्यों का संकेत करते हुए उन्होंने पुस्तिकाओं की पूरी श्रृंखला प्रकाशित की। उनको संशोधित करवाने के लिए अभियान चलाया। इस प्रयास के कारण एनसीईआरटी की पुस्तकों में बहुत से संशोधन सरकार को करने पड़े।

भारतीय परंपरा में शिक्षा कभी भी राज्य-संचालित नहीं रही। इस बात को अनुभव करके समाज-संचालित शिक्षा का प्रारूप तैयार करने और उसका क्रियान्वयन करने की दृष्टि से संघ से प्रेरित इंदुमति काटदरे ने पुनरुत्थान विद्यापीठ का काम प्रारंभ किया। पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पुनरुत्थान विद्यापीठ ने भारतीय तथा समाज-संचालित शिक्षा के तंत्र को खड़ा करने के लिए 60 वर्षों का एक प्रारूप तैयार किया और उस पर कार्य प्रारंभ किया। इसके लिए उन्होंने देशभर के शिक्षाविदों के साथ बैठकें कीं, सम्मेलन किए और व्याख्यान आयोजित किए। साथ ही इसका साहित्य भी तैयार किया। उन्होंने इसके पहले चरण में शोध करना रखा था। दूसरे चरण में साहित्य निर्माण तथा तीसरे चरण में शिक्षक निर्माण करना शामिल है। वर्तमान में उनका दूसरा चरण चल रहा है और वे साहित्य निर्माण में तेजी से जुटे हुए हैं।

इसी प्रकार शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास शिक्षा के भारतीयकरण के लिए सक्रिय है और उसने वैकल्पिक पाठ्यक्रम तैयार करना शुरु किया है। कुछ इसी प्रकार के उद्देश्यों को लेकर कुछ स्वयंसेवकों ने वर्ष 1969 में भारतीय शिक्षण मंडल का प्रारंभ किया था। भारतीय शिक्षण मंडल भी शिक्षा के भारतीयकरण के लिए विविध प्रयोग कर रहा है। शिक्षा में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किए जाने वाले इन प्रयोगों, अभियानों तथा शोध के कारण ही आज देश में शिक्षा के भारतीयकरण की मांग काफी व्यापक हो गई है। साथ ही, जन-जन इस बारे जागरूक हुआ है कि देश के इतिहास में काफी कुछ मिथ्या पढ़ाया जा रहा है। भले ही वे इसे बदलने में सक्षम नहीं हो पाए हों, परंतु वे इसके मिथ्यात्व से अनभिज्ञ नहीं रहे हैं। इसलिए सोशल मीडिया आदि विभिन्न माध्यमों से देश में वैकल्पिक शिक्षण चलता रहता है, जो कि स्थापित अकादमिया को चुनौती देता रहता है। देश में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षाविद् तथा लेखक तैयार हो गए हैं, जो निरंतर तथ्य तथा शोधपरक लेखन द्वारा भारतीयता को बल प्रदान कर रहे हैं।

धर्म

समाज का एक बड़ा आयाम धर्म का है। धर्म के आधार को पश्चिमी कम्युनिज्म ने चुनौती दी, तो धर्म तो समाप्त नहीं हुआ, परंतु कम्युनिज्म ही समाप्त हो गया। भारत तो वैसे भी धर्मपरायण देश रहा है। भारतीय राष्ट्र का मूलाधार ही धर्म है। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि औपनिवेशिक ताकतें भारत के इस मूल प्राण धर्म को नष्ट करने का प्रयास करते ही। ऐसे में राष्ट्ररक्षा के लिए सन्नध संघ के स्वयंसेवकों ने भी बहुविध प्रयास प्रारंभ किए। सबसे पहला प्रयास विश्व हिंदू परिषद् के रूप में सामने आया। विश्व के सभी देशों में सरकारें बहुसंख्यक के धर्म का रक्षण करती ही हैं। भारत विश्व का एकमात्र राज्य है जो बहुसंख्यकों के धर्म के रक्षण करने के लिए सन्नध नहीं है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के नाम पर देश की सरकारें बहुसंख्यक समाज के धार्मिक अधिकारों का अतिक्रमण करती रहती है। इसलिए हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा की संवैधानिक लड़ाई लडऩे के लिए विश्व हिंदु परिषद् का निर्माण हुआ।

विश्व हिंदु परिषद् ने अशोक सिंघल के नेतृत्व में यह काम बखूबी किया। श्रीराम जन्मभूमि  का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद् ने प्रारंभ किया जिसकी अंतिम परिणति अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने के रूप में हुई है। सनातन धर्म के प्रवाह को निर्मल बनाए रखने के लिए भी विश्व हिंदू परिषद् ने ढेर सारे अभियान चलाए। परिषद् के नेतृत्व में ही धर्माचार्यों ने उद्घोषणा की – हिंदव: सोदरा: सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत। यह एक बड़ा नारा था। इसके क्रियान्वयन के लिए धर्माचार्यों ने काशी को डोमराजा के घर आतिथ्य ग्रहण किया। विश्व हिंदू परिषद् के इस अभियान ने महात्मा गांधी के अछुतोद्धार आंदोलन मको भी पीछे छोड़ दिया। सनातन धर्म की कडिय़ों को मजबूती से जोडऩे के लिए सनातन दर्शन की विभिन्न धाराओं के धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने के लिए परिषद् ने अथक प्रयास किए। आज इसका परिणाम भी दिखाई देता है। समाज से ऊंच-नीच की भावना तथा जातिगत द्वेष को कम करने में इन अभियानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मंडल कमीशन के कारण समाज को जातिगत आधार पर विभाजित करने का एक षड्यंत्र रचा गया, उसे रामजन्मभूमि आंदोलन द्वारा निस्तेज करके प्रभू श्रीराम के नाम पर समाज को फिर से एक करने का महती कार्य परिषद् ने किया।

मंदिरों को स्वायत्त करने की लड़ाई, सरकार तक धर्माचार्यों की आवाज पहुंचाने का कार्य, समाज को विभाजित करने के षड्यंत्रों को उजागर करके निस्तेज करना, समाज के विभिन्न वर्गों में जाकर परस्पर सद्भाव तथा एकता के बंधनों को मजबूत करना आदि ऐसे कार्य हैं, जिनका परिणाम व्यापक रूप से दिखता है।

इतिहास

किसी भी समाज की सक्रियता और प्रगति उसके इतिहासबोध पर निर्भर करती है। जिस समाज का इतिहासबोध समाप्त हो जाएगा, वह समाज आदर्श स्थापित नहीं कर सकता। इसलिए पिछले दो सौ वर्षों से भारत के इतिहास को विकृत करने के प्रयास चल रहे थे। सम्राट विक्रमादित्य जैसों महापुरुषों को इतिहास की पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया गया। आक्रांताओं को महान बताने की कुचेष्टाएं की गईं। भारतीय इतिहास के सभी स्वर्णिम पृष्ठों को नकारने और केवल पराजय के इतिहास के रूप में निरूपित करने के कुत्सित प्रयास किए गए। स्वाधीनता के बाद भी इन प्रयासों को ही आगे बढ़ाया गया। परिणामस्वरूप आम भारतीय मानस में केवल नकारात्मक भाव ही विकसित हुए।

भारत के इतिहासबोध को ठीक करने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने अथक प्रयास किए। उनके इन प्रयासों के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में देशभर में शोध संस्थान बने। इन शोध संस्थानों ने भारत के इतिहास को ठीक स्वरूप में प्रस्तुत करने के लिए विशाल साहित्य का निर्माण किया है। इन सभी प्रयासों का ही परिणाम है कि यूजीसी को स्नातक के पाठ्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा है। हालांकि अभी यह संघर्ष काफी लंबा चलने वाला है, परंतु इस संघर्ष का परिणाम आना प्रारंभ हो गया है। सरकारें और अकादमिया भले ही अभी पाठ्यपुस्तकों को बदलने के लिए तैयार नहीं हुआ हो, देश का आम जनमानस अवश्य इसके लिए तैयार हो गया है। अकादमिक जगत में जितनी चर्चा हो रही है, उससे कहीं अधिक समाज में इसकी चर्चाएं चलने लगीं हैं। निश्चय ही, इन चर्चाओं का परिणाम आने वाले कुछ वर्षों में देश की अकादमिया पर भी पडऩे ही वाला है।

विविध

देश के समाज जीवन के प्रभावित करने वाले उपरोक्त चार महत्वपूर्ण आयामों के अतिरिक्त संघ के स्वयंसेवकों ने अन्यान्य आयामों में भी उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन कार्यों का प्रभाव और परिणाम भी समाज में दृष्टिगोचर होने लगा है। राजनीतिक मुद्दों के विश्लेषण के लिए पहले केवल एक-दो संस्थान ही दिखते थे, परंतु अब संघ के स्वयंसेवकों के प्रयासों से भारतीय नीति प्रतिष्ठान, इंडिया फाउंडेशन, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन जैसे दर्जनों शोध संस्थान हैं जो राजनीतिक मुद्दों का भारतीय दृष्टि से विश्लेषण करते हैं।

ऐसे शोध संस्थानों में एक उल्लेखनीय नाम है जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र का। जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र ने कश्मीर समस्या के अध्ययन में मील के पत्थर का काम किया। सबसे पहले अध्ययन केंद्र ने ही यह रहस्योद्घाटन किया कि धारा 370 को हटाने में सबसे बड़ी बाधा धारा कैपिटल ए है जिसे कि असंवैधानिक तरीके से संविधान में शामिल किया गया था। हैरानी की बात यह थी कि यह बात संविधान विशेषज्ञों के भी संज्ञान में नहीं थी। अध्ययन केंद्र के शोध और अभियान के आधार पर ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाया जाना संभव हुआ है।

संघ के स्वयंसेवकों ने देश में ऐसा वातावरण बना दिया है कि डॉ. हेडगेवार की संकल्पना के अनुसार अब केवल कुछेक संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए आगे नहीं आ रहे, बल्कि समाज ही इसके लिए सामने आ रहा है। संघ का उद्देश्य भी यही रहा है, जिसे वह एक वाक्य में कहता रहा है कि संघ कुछ नहीं करेगा और स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेगा। इसी प्रकार संघ के संस्थापक का स्पष्ट मत था कि संघ को समाज में एक संगठन के रूप नहीं होना चाहिए, बल्कि संघ संपूर्ण समाज के संगठन के रूप में विकसित होना चाहिए। यानी संपूर्ण समाज अपने मुद्दों पर आंदोलित हो, सक्रिय हो, प्रत्युतर दे, समाधान तलाशे, यही संघ का उद्देश्य रहा है। आज संघ की यह संकल्पना काफी हद तक साकार होती दिखती है।

देश के विभिन्न मुद्दों के समाधान के लिए केवल संघ के स्वयंसेवक तथा उनसे प्रेरित लोगों द्वारा स्थापित संगठन ही सक्रिय नहीं दिखते, बल्कि समाज का एक बड़ा वर्ग इसके लिए तैयार हो गया है। यह वर्ग संघ से सीधे-सीधे भले ही नहीं जुड़ा हो, परंतु वह संघ के उस विशाल विचार प्रवाह का ही हिस्सा है। समाज का यह वर्ग हिंदुत्व के ऐसे अनेक प्रश्नों को उठा रहा है, उसके लिए अभियान चला रहा है, जिनके लिए पहले संघ को अकेले प्रयास करना पड़ता था। आज समाज आगे बढ़ कर प्रयास कर रहा है। हालांकि ऐसा होने पर कई बार संघ के ऊपर आक्षेप भी किया जाता है कि यह काम उसे करना चाहिए था, जैसे कि मंदिरों को सरकारी अधिग्रहण से मुक्त करवाने की मांग के संबंध में कहा जाता है, परंतु वास्तव में संघ की सफलता तो इसमें ही है कि ये मुद्दे समाज स्वयं हल करने लगे, सरकार पर वह दबाव बनाने लगे। इसके लिए संघ को एक संगठन के रूप में बारंबार आगे आने की आवश्यकता नहीं पडऩी चाहिए। संघ का काम तो केवल इतना है कि वह ऐसे हिंदुत्वनिष्ठ, चरित्रवान, कर्मठ तथा ध्येयनिष्ठ लोग तैयार कर दे। आज भी संघ व्यक्ति निर्माण के उसी कार्य में जुटा हुआ है और उसके द्वारा तैयार ये लोग समाज में आगे बढ़कर देश के पुनर्निर्माण की गाथा लिखने में जुटे हैं। ये गाथाएं केवल संघप्रेरित संगठनों के माध्यम से ही नहीं लिखी जा रहीं, बल्कि संघप्रेरित समाज के माध्यम से लिखी जा रही हैं। कदाचित यही स्वप्न डॉ. हेडगेवार ने भी देखा था।

 

रवि शंकर

 

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