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विपक्षी एकता: मुंगेरी के सपने

विपक्षी एकता: मुंगेरी के सपने

यदि देश में कोई जिम्मेदार विपक्ष होता है और विपक्ष सत्ता दल से कितना भी कमजोर हो  पर उनकी बातों में दम होती है और सत्ता पक्ष उनकी बातों को सुनने और उस पर विचार करने के लिए विवश भी होता है। आज विपक्षी पार्टी का 24 घंटे केवल सत्ता पाने की ही सोचती है। तो उनकी प्रत्येक कार्यवाही के पीछे सत्ता पाने का लालच रहता है उसका नतीजा यह हुआ कि अब जनता भी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेती है तो सत्ता दल को क्या पड़ी है।

यदि विपक्षी दल मिलकर सत्ता की कमियां, गलतियां निकाल कर उन पर चर्चा करते तो उसके कुछ लाभदायक परिणाम निकलते। पहले भी इन्होंने एकता के प्रयास किए। जब-जब ऐसे प्रयास किए गए, जो नेता उसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं या संयोजन का काम करते हैं जनता उसे चुनाव में निपटा देती है। जबसे भाजपा सरकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में आई है तब से विपक्ष की ताकत दिनोंदिन क्षीण होती जा रही हैं। विपक्षी पार्टीयों को एक होने के लिए जुझारू अनुभवी नेता का नेतृत्व चाहिए। नेतृत्व भी कुदरती रूप से सबसे बड़ी पार्टी के नेता को ही मिलता है। आज की स्थिति में कांग्रेसी सबसे बड़ी पार्टी है जो लगभग देश के सभी प्रदेशों में है और कई जगह सत्ता में भी है पर कांग्रेस के नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी हैं। सोनिया गांधी के अस्वस्थ रहने के कारण और अपने बेटे राहुल गांधी के आगे बढ़ाने की आशा रखने के कारण पार्टी में कोई दूसरे नेता को कमान देने को तैयार नहीं होती है। दोनों ही नेतृत्व की द्रष्टि से कमजोर है पर सोनिया गांधी की अगुवाई में पार्टी ने केंद्र में 10 वर्ष राज किया है। उसके दो कारण स्पष्ट है उन्होंने एक तो प्रधानमंत्री ऐसे व्यक्ति को बनाया जिसकी उनके आगे बोलने की हिम्मत नहीं थी और दूसरी उसकी अपनी कोई सोच नहीं थी और अगर थी भी तो अपने विचारों को कुर्सी सलामत रखने के लिए मन में ही रख लेता था।

मनमोहन सिंह को सोनिया ने प्रधानमंत्री बना कर प्रधानमंत्री के सबसे उपयुक्त योग्य दावेदार नेता अर्जुन सिंह और प्रणव मुखर्जी को पीछे धकेल दिया था। पहले कांग्रेस की  मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार किसी हद तक ठीक चली हालांकि कोई काम नहीं कर सकी ना ही दूसरी बार चुनाव में कोई तीर मार सकी पर मिली जुली सरकार कांग्रेस ने दोबारा भी बना ली। सोनिया गांधी जानती थी कि वह राजनीति नहीं जानती हैं। अत: सभी राजनीतिक निर्णय अर्जुन सिंह और प्रणव दोनों से सलाह करके लेती थी इसलिए यूपीए की सरकार की पहली पारी ठीक से चल गई। दूसरी पार्टी में राहुल गांधी सर्वे सर्वा रहे वह समझते थे कि राजनीति अच्छी तरह जानते हैं उन्होंने इन नेताओं से सलाह लेना बंद कर दिया और अर्जुन सिंह को दूर कर दिग्विजय सिंह को साथ ले लिया जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह कर चौपटा करके आए थे। यूपीए-2 की सरकार में राहुल गांधी कांग्रेस के नेता होने के कारण विपक्षी दलों के भी नेता हो गए। विपक्ष के पास पूरे 5 वर्ष थे। कोई रचनात्मक कार्य करने के लिए या एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए विपक्ष राहुल गांधी की तरफ देखता रहा। राहुल गांधी ने सरकार के कार्यों पर हमला ना बोलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही अपने प्रहार चालू रखें।

विपक्ष के पास कोई अनुभवी नेता नहीं था जो नरेंद्र मोदी के समकक्ष कहीं आस-पास भी लगता नतीजा दूसरी बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के अकेले दम पर ही भारी बहुमत  मिला पर उसने अपने सहयोगी दलों को भी सरकार में भागीदार बनाया। राहुल गांधी विपक्ष को नेतृत्व देने में फेल हो गए। कांग्रेस पार्टी के नेता मोदी जी को कहीं चायवाला कहीं विदेश घूमने वाला कहीं महंगा सूट पहनने वाला कहा। अर्जुन सिंह जैसे कद्दावर नेता को केंद्र में मंत्री नहीं बनाने के लिए राहुल के कान भरे और उन्हें प्रधानमंत्री बनने में खतरा बताकर दूर कर दिया।

नौसिखिया राहुल के चक्कर में यूपीए 2 सरकार कमजोर होती गई उधर भाजपा में नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद एक नई ताकत आ चुकी थी पार्टी नई दिशा में संगठित हुई। लोकसभा चुनाव आने तक पार्टी की कमान अमित शाह के हाथ में आ गई नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाकर पार्टी ने नया दांव लगाया। कांग्रेस पार्टी की बुरी तरह हार हुई और यूपीए की सरकार बनने के सपने चकनाचूर हो गए। भाजपा को बहुमत मिला उसने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई 5 साल सफल रही विपक्षी एकता के सारे प्रयास धरे रह गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अनपढ़ चायवाला और भी कई उपाधियों से उन्हें नबाजते रहे। जनता पर इसका उल्टा असर हुआ, जनता को तो चाहिये अपनी समस्याएं समझने, दुख दर्द बांटने वाला या उसकी आवाज उठाने वाला विपक्ष चाहिए था जिस काम में विपक्ष नकामयाब रहा। विपक्ष का एक हो जाना गलत नहीं पर यह एकता किसी जनहित के मुद्दे पर होना चाहिए। ऐसा ना हो कर विपक्ष जब भी इकट्ठा होता है उसके पीछे सरकार को तंग करना, संसद में मिलजुल कर हंगामा करने के लिए होता है। यहां तक कि बिलों का फाडऩा अध्यक्ष के आसन पर जाकर पेपर फेंकना, सांसद नहीं चलने देना उसका उद्देश रहता है। बिल भले उनकी मर्जी का ना हो चाहे, संशोधन भी ना होने पाए पर किसी भी बिल की कमियों या उसमें कुछ जोडऩे घटाने की बात तो सरकार के सामने आती है और फिर जनता में जाकर अपने सुझाव की बात की जा सकती है जिस तरह आजकल विपक्षी एकता हो रही है केवल और केवल संसद को न चलने देने के लिए ही है। अब तो बात यहां तक आ पहुंची है कि मार्शल के साथ दुर्व्यवहार, बिल फाड़ कर अध्यक्ष के सामने फेंकना, टेबल, शीशे तोडऩा आदि। क्या विपक्षी सांसदों का यह व्यवहार लोकतंत्र की किसी भी परिधि में उचित ठहराया जा सकता है। ऐसे सांसदों को जनता दोबारा चुनकर भेजेगी इसमें भारी संशय है।

विपक्ष ने विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मिलकर एक होकर देख लिया जनता ने उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण पार्टी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को कांग्रेस घास तक नहीं डाली। ऐसे प्रमाण हैं जो विपक्ष की कहानी अपने आप कह रहे हैं पूरा विपक्ष कभी भी किसी जनहित या राष्ट्रहित के सुझाव पर चर्चा या उसके समाधान की बात को लेकर एक नहीं होता है। उदाहरण के तौर पर अभी कृषि बिल को ही ले लीजिए। विपक्षी पार्टियां जो कि अधिकांश केवल क्षेत्रीय पार्टियां ही है अगर चाहती तो गंभीर होकर इस पर चर्चा करती और अपने- अपने क्षेत्र के किसानों की समस्या बताती और सुझाव देकर बिल में कुछ परिवर्तन करवा सकती थी पर नेताओं का काम था कि धरना प्रदर्शन कैसे चले कैसे बिल को रद्द करवाया जाए। कोई भी बिल या नया कानून आता है उसमें मुख्य रूप से सरकार की सोच समस्याओं को सुलझाने या लोगों के हित की बात ही जुड़ी होती है। फिर भी विपक्ष उस पर अपनी राय देकर सुधार करवाने का प्रयत्न करें तो लोग भी उसकी सराहना कर सकते हैं। बिल जो पास हो गया, उसे उसका क्रियात्वन भी रोक दिया गया अब उस बिल पर हंगामा प्रदर्शन को हवा देना आदि का कोई औचित्य नहीं रह गया था पर विपक्षी नेताओं ने उसको जारी करने का प्रयास किया और कर रही है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की प्रशंसा करना होगी जिन्होंने पूरे सब्र और सम्मान के साथ तथाकथित किसान नेताओं से बार-बार बात की और बिंदुबार सुझाव मांगे और उन पर चर्चा कर सहमति बनने पर बिल में जोडऩे की बात की। फिर भी विपक्षी नेताओं ने उनके प्रदर्शन में जा जाकर उन्हें अपना धरना जारी रखने के लिए उकसाया विपक्षी पार्टियों के नेता बड़ी तैयारियां करके जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को बड़ा हऊआ बनाकर गुब्बारे की तरह फुला  देते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छोटी सी सुई चुभोकर गुब्बारे की हवा निकाल देते हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस तो जैसे पूरी तरह गुमराह हो गई है पर यह विपक्षी पार्टियों की मजबूरी है कि उनको कांग्रेस के पीछे चलना पड़ता है। कांग्रेस एक बिल का लोकसभा में समर्थन फिर राज्यसभा में विरोध करती है क्या उसे विपक्षी एकता का नेतृत्व दिया जाना खुद में एक मजाक नहीं है यहां तक कि लोकसभा में कांग्रेस दल का नेता था विपक्ष का नेता यह कहे कि कश्मीर का मामला यू एन ओ में लम्बवित है। उसने अपने हाथ से अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली फिर भी कांग्रेस आज भी उसे ही नेता बनाए हुए हैं। आजादी से लेकर आज तक ऐसा कमजोर दिशा विहीन गैर जिम्मेदार विपक्ष कभी नहीं देखा। लगता है सत्ता की चाह में अधिकांश विपक्षी नेता अगले चुनाव में संसद में भी अपनी कुर्सी गवां बैठेगे। नेहरू परिवार के वर्तमान वारिस कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा राहुल गांधी ने विपक्ष में रहकर जिस ढंग से अपनी जिम्मेदारी निभाई उसे जनता ने नकारा है। राहुल गांधी को संसद में या बाहर अपने व्यवहार एवं बोलचाल की कीमत अमेठी में हार कर चुकानी पड़ी। यही हाल आज अन्य विपक्षी नेताओं का हो रहा है। यही  हाल रहा तो अन्य नेताओं के साथ भी ऐसा हो सकता है और हमें संसद में उनकी आवाज की गूंज सुनाई ना दे। सरकार या संसद अध्यक्ष (स्पीकर) कुछ विपक्षी सांसदों की बेहूदा हरकतों को बंद नहीं कर पा रहा हैं, लगता है जनता उनकी आवाज अगले चुनाव में बंद कर देगी।

 

डॉ. विजय खैरा

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