ब्रेकिंग न्यूज़ 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति : बौद्धिक स्वराज की उपलब्धि का स्वर्णिम अवसर

राष्ट्रीय शिक्षा नीति : बौद्धिक स्वराज की उपलब्धि का स्वर्णिम अवसर

किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके योग्य और सक्षम नागरिक ही होते हैं। चरित्र, ज्ञान और कौशल युक्त नागरिक ही योग्य और सक्षम कहे जाते हैं जो किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत अथवा सामूहिक चुनौती को अवसर में बदल डालते हैं। शिक्षा ही वह माध्यम है जो ऐसे योग्य और सक्षम नागिरको का निर्माण करती है। पहली बार भारत में शिक्षा सार्वजनिक विमर्श का विषय बना है यह सबसे सकारात्मक बात इस प्रसंग में हुई है। सरकार और समाज दोनों ही स्तरों पर इस बार शिक्षा को लेकर एक विशेष जागरूकता दिखायी दे रही है। स्वंय प्रधानमंत्री में शिक्षा नीति को लागू करने में रुचि दिखायी है। शिक्षा ही है जो देश का वर्तमान और भविष्य दोनों को आकार देती है। इसलिए जो लोग देश और समाज की तनिक भी चिंता करते हैं उन्हें शिक्षा के स्वरूप पर और स्थिति पर अवश्य ही विचार करना चाहिए। कोई यह सोच सकता है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम अपनी शिक्षा को लेकर आज भी विचार ही कर रहे हैं। क्या यह किसी विडंबना से कम है? शिक्षा को तो स्वतंत्रता के बाद पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। दुर्भाग्यवश ऐसा न हो सका। पर आज यह अवसर उपलब्ध हुआ है। यह हमारी औपनिवेशिक शिक्षा ही थी जिसने भारत के स्वराज को जमीन पर साकार नहीं होने दिया। इसलिए स्वराज की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम अपनी शिक्षा को औपनिवेशिक जकड़बंदी से मुक्त करें। अपने बच्चों को अपनी भाषा में अपनी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना ही चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस दिशा में एक बड़ा कदम है। पहली बार तकनीकि विषयों की पढ़ाई भी भारतीय भाषाओं में होने की शुरुआत हुई है। भाषा का प्रश्न शिक्षा में बड़े ही महत्व का होता है क्योंकि भाषा दृष्टि और सृष्टि दोनों ही भूमिका निभाती है। विदेशी भाषा शिक्षा के भारतीय करण के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा थी जो इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने लगभग दूर कर दी है।

भारत एक ज्ञान की सभ्यता और राष्ट्र रहा है। भारतीय ज्ञान की ख्याति संपूर्ण दुनिया में अनादिकाल से रही है। भारत अंग्रेजों के आगमन तक अगर दुनिया का सबसे समृद्ध समाह था तो अपनी शिक्षा के कारण ही। जिस दिन से भारत में विदेशी शिक्षा का फंदा पड़ा उसी दिन से भारत की समृद्धि और सौभाग्य घटने लगा और भारत दुनिया के गरीब देशों मे गिना जाने लगा। ज्ञान के साथ भारत में चारित्रिक पूंजी और श्रेष्ठता का भाव भी सदैव विद्यमान रहा। फाह्यान से लेकर अलबरूनी इत्यादि विदेशी यात्रियों नें भारत के नागरिकों के श्रेष्ठता बोध और जीवन की उत्कृष्टता की विपुल चर्चा की है और प्रमाण दिए हैं। अंग्रेजी राज  बढऩे के साथ ही भारतीयों का चारित्रिक पतन भी बढ़ता गया। अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग अपने ही लोगों से कट कर उनके शोषण का यंत्र बन गया। इसलिए भारतीय भाषाओं में भारत की आवश्यकताओं और प्रकृति के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था भारतीयों का अधिकार और कर्तव्य दोनों ही है।

भारत अभी भी अपने ज्ञान के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों का मुखापेक्षी है। हमें दृढ़ता पूर्वक यह घोषणा करनी होगी कि हम इस बौद्धिक दरिद्रता को समाप्त करेंगे तथा अपने शिक्षण संस्थानों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बनाकर ही छोड़ेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने हमें यह अवसर प्रदान किया है कि हम ऐसा संकल्प ले सकें और उसे पूर्ण भी कर सकें। यह हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। इसके बिना भारत को बौद्धिक स्वराज नहीं प्राप्त होगा और जब तक बौद्धिक स्वराज हमें नहीं प्राप्त होता तब तक देश के दुखों का अंत नहीं है। भारत प्रतिभाओं का भंडार है और अपनी सामथ्र्य से कुछ कर गुजरने वालों का समाज है। इसलिए आज अगर जीवन के हर क्षेत्र में जो लोग भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं उन्हें आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी उठानी ही होगी।

किसी भी देश में प्राकृतिक संसाधनों का अभाव हो तो उसका आयात बाहर से किया जा सकता है। इसी तरह से आवश्यकता पडऩे पर कुछ थोड़े से विशेषज्ञ भी बाहर से बुलाए जा सकते हैं लेकिन चरित्रवान नागरिकों का आयात नहीं किया जा सकता। चरित्रवान नागरिक  का अर्थ है कि देशभक्त, साहसी, पराक्रमी, बलिदानी, धैर्यवान, विनम्र तथा ज्ञानवान, संयमी तथा आत्मबोध से युक्त नागरिक। ऐसे नागरिक ही देश की असली संपत्ति होते हैं। यह सृजन शिक्षा के द्वारा ही संभव होता है। ऐसे नागरिक कहीं आसमान से नहीं टपकते। उनको गढऩा पड़ता है। यह कार्य केवल देश की ही आवश्यकता नहीं है बल्कि संपूर्ण मनुष्यता और यहां तक कि संपूर्ण सृष्टि की भी आवश्यकता है। इस जगह हम शिक्षा में परिवार, शिक्षकों और शैक्षिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका देख सकते हैं। अगर एक डॉक्टर, इंजीनियर अथवा ठेकेदार कोई गलती करे तो इस गलती को कुछ समय बाद ठीक किया जा सकता है और उसका प्रभाव थोड़े ही लोगों पर पड़ता है लेकिन एक शिक्षक के कारण पीढिय़ां नष्ट हो सकती हैं और उस हानि की भरपायी करना संभव ही नहीं।

इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपनी उस हानि की भरपायी कर सकें जो औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के जारी रहने से भारत में आज भी हो रही है। पाठ्यक्रम, परीक्षा, मूल्यांकन तथा पाठ्य पुस्तकें इत्यादि इस क्रम में बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है जनमत का बनना और तदनुरूप कार्य। बदलाव शिशु शिक्षा से लेकर शोध तक की संपूर्ण शिक्षा में होना है पर उसका स्वरूप और गति बहुत कुछ हमारी इच्छाशक्ति पर ही निर्भर रहने वाली है। अगर हम यह अवसर चूक गए तो अकल्पनीय हानि होने की संभावना है। इसलिए इस ज्ञानयज्ञ में हमें अपनी भूमिका को पहचानना होगा और तदनुरूप भूमिका निभानी ही होगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ऐसे समय में आयी है जब भारत की शिक्षा ही नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन ही कोरोना महामारी का सामना कर रहा है। सारी दुनिया इस संकट के दुष्चक्र में फंसी हुई है। पर यह बुरा समय आज नहीं तो कल अवश्य ही बीत जाएगा। इसलिए शिक्षा नीति पर जितना कार्य आम दिनों में हो सकता था वह आज के संकटपूर्ण समय में संभव नहीं। फिर भी जो लोग देश और समाज की चिंता करते हैं उनके लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

 


डॉ.
विवेकानंद उपाध्याय

Leave a Reply

Your email address will not be published.