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डिग्री के साथ-साथ स्किल का होना भी जरूरी

डिग्री के साथ-साथ स्किल का होना भी जरूरी

भारत में कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ तो पर्याप्त संख्या में हैं, लेकिन इनमें से कइयों की हालत ठीक नहीं है और वहां पर सीटों की भी कमी है। इस साल की क्यू एस वल्र्ड रैंकिंग के अनुसार दुनिया की टॉप 200 यूनिवर्सिटीज में भारत के सिर्फ 3 शिक्षा संस्थान शामिल हैं, इनमें आईआईटी बॉम्बे 172 वें नंबर पर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलुरु 185 वें नंबर पर और आईआईटी दिल्ली 193 वें नंबर पर है। दुनिया की टॉप 1000 यूनिवर्सिटीज में हमारे देश की केवल 22 यूनिवर्सिटीज ही शामिल हैं, यानी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाले संस्थानों की संख्या हमारे देश में बहुत कम है।

अब ज्यादातर बोर्ड्स और ज्यादातर स्कूलों से पास होने वाले बच्चों की संख्या हर साल बढ़ रही है। पिछले साल 2020 में केंद्रीय विद्यालयों में 98.62 प्रतिशत बच्चे सीबीएसई की परीक्षा में पास हुए थे, जबकि इस बार 2021 में 100 प्रतिशत पास हुए हैं। सरकारी स्कूलों में पिछले साल 2020 में 95 प्रतिशत छात्र पास हुए थे, जबकि इस बार यानी 2021 में 99 प्रतिशत छात्र पास हुए हैं, इसका बहुत बड़ा कारण यह है कि इस बार बोर्ड की परीक्षाएं हुई ही नहीं और नंबर देने में भी नरम रवैया अपनाया गया है। कोविड की वजह से कोशिश यह थी कि किसी भी छात्र को फेल ना किया जाए। इस बार सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में 95 प्रतिशत से ज्यादा नंबर लाने वाले छात्रों की संख्या 70 हजार है, ये पिछले साल के मुकाबले दुगनी संख्या है, जबकि डेढ़ लाख छात्रों ने 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए हैं।

कुछ वर्ष पहले तक 90 प्रतिशत या इससे ज्यादा अंक हासिल करना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। अब सोचने की बात ये है कि जब ये छात्र कॉलेजों में जाएंगे तो कॉलेजों की कट ऑफ परसेंट कितनी होगी? 2019 में 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक पाने वाले छात्रों की संख्या लगभग 94 हजार के आसपास थी। हजारों छात्रों को अपने मनपसंद कॉलेज और अपने मनपसंद कोर्स में एडमिशन नहीं मिल पाएगा क्योंकि ज्यादा नंबरों की वजह से एडमिशन की रेस अब और ज्यादा मुश्किल हो गई है। उदाहरण के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास इस समय सिर्फ 65 हजार सीटें ही उपलब्ध हैं और उत्तर भारत के अलग-अलग राज्यों से आने वाले ज्यादातर छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाहते हैं, जहां अब हर साल एडमीशन के लिए 85-100 प्रतिशत के बीच कट ऑफ रहता है, अब यदि 12वीं कक्षा में 95 प्रतिशत लाने वाले सभी 70 हजार छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना चाहें तो सबको दाखिला नहीं मिलेगा, इनमें से 5000 छात्रों के लिए दरवाजे बंद हो जाएंगे। हालांकि 12वीं कक्षा पास करने वाले सभी छात्र अंडर ग्रेजुएट नहीं करते, सभी बच्चे इन कॉलेजों में नहीं आते, बहुत से छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग का विकल्प चुन लेते हैं या फिर अन्य कोई क्षेत्र चुन लेते हैं। भारत में इंजीनियरिंग और मेडिकल की करीब 15 लाख सीटें उपलब्ध हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इंजीनियरिंग की सीटें लगातार कम हो रही हैं और वैसे भी हमारे देश में आजकल बड़ी संख्या में इंजीनियर भी बेरोजगार हैं। कई एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का पास हो जाना उन छात्रों पर भी असर डालता है जो अच्छे नंबरों के लिए साल भर मेहनत करते हैं। इसलिए बोर्डों को मेरिट वाले अपने पुराने सिस्टम पर वापस लौटना ही होगा। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का पास हो जाना वैसे तो खुशी की बात है पर देश के सिस्टम के आगे एक सवाल यही उठता है कि क्या इतनी संख्या में पास हुए सभी बच्चों को कालेजों में दाखिला और बाद में नौकरी मिल पाएगी?

विडंबना यह है कि जिन छात्रों को कॉलेजों में एडमिशन मिल भी जाता है, उनमें से 16 प्रतिशत को नौकरी नहीं मिल पाती, पोस्ट ग्रेजुएशन करके भी बेरोजगार रहने वाले युवाओं की संख्या हमारे देश में 14 प्रतिशत है। इस समस्या का हल है स्किल डेवलपमेंट, इसलिए छात्रों को चाहिए कि वे अपने स्किल डेवलपमेंट पर काम करें। डिग्री होने पर भी स्किल यानी कौशल के अभाव में आगे का रास्ता बहुत कठिन होता है, चाहे किसी भी कॉलेज की डिग्री क्यों न हो। वर्ष 2019 की इंडिया स्किल्स की रिपोर्ट के अनुसार ग्रेजुएशन करने वाले 53 प्रतिशत युवा इस लायक ही नहीं हैं कि उन्हें कोई रोजगार दिया जा सके क्योंकि उनके पास डिग्री तो है लेकिन स्किल नहीं है यानी उनका स्किल सेट नहीं है।

कुछ लोगों का मानना है कि दुनिया का सबसे बड़ा संसाधन तेल और खनिज हैं, कुछ का मानना है कि भविष्य में डेटा सबसे बड़ा संसाधन होगा, किंतु वास्तव में दुनिया का सबसे बड़ा संसाधन युवाओं की संख्या है और भारत में भी ये युवा ही सबसे बड़ा संसाधन हैं, लेकिन स्किल के अभाव में हम इस संसाधन का सही उपयोग नहीं कर पाते। हमारे पास करोड़ों युवा हैं जिनमें ताकत है, जोश है, उनके पास डिग्रियां भी हैं, लेकिन स्किल नहीं है। स्किल या कौशल किसी कार्य को ठीक से करने की क्षमता को कहते हैं और भारत के सुपर पावर बनने के लिए इस क्षमता का होना इस समय सबसे ज्यादा जरूरी है।

पिछले कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75 कौशल विकास योजनाओं की शुरुआत की थी और तब उन्होंने कहा था कि युवाओं का कौशल ही भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है। वर्ष 2030 तक भारत के 65 प्रतिशत यानी 100 करोड़ युवा नौकरी करने की उम्र में पहुंच जाएंगे यानी उन्हें नौकरी चाहिए होगी, अब सवाल यह है कि क्या सरकारी या प्राइवेट सेक्टर के पास इतनी नौकरियां हैं? तो इसका जवाब है नहीं, न तो सरकार के पास और ना ही प्राइवेट सेक्टर के पास इतनी नौकरियां हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युवा जनसंख्या का फायदा उठाने का भारत के पास यह आखिरी मौका होगा, इसलिए स्किल डेवलपमेंट की शुरुआत स्कूलों से करनी होगी और बहुत कम उम्र में ही बच्चों का टैलेंट पहचानना होगा, लेकिन स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर बच्चों को सिर्फ आंकड़े और जानकारियां दी जाती हैं, जिन्हें रटकर परीक्षा में उत्तर पुस्तिका पर लिखना होता है। उनकी स्किल्स को बेहतर करने के लिए आज भी हमारे स्कूलों और कॉलेजों में कुछ खास नहीं किया जाता, जबकि सच यह है कि भारत में इस समय 90 प्रतिशत नौकरियां ऐसी हैं जिनके लिए किसी न किसी प्रकार के विशेष स्किल (कौशल) की जरूरत पड़ती है। परिणामस्वरूप 20 प्रतिशत डिग्री या डिप्लोमा धारक लोगों को नौकरियां मिल ही नहीं पातीं। भारत में ज्यादातर लोग स्किल डेवलपमेंट में रुचि नहीं रखते क्योंकि उन्हें लगता है कि यह तो श्रम से जुड़ा हुआ कोई मामला है, इसलिए सब लोग पढ़-लिख कर लाखों की नौकरियां करना चाहते हैं, बड़े-बड़े दफ्तरों में बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठना चाहते हैं, सूट पहनकर लैपटॉप लेकर घूमना चाहते हैं, पर वे स्किल सेट हासिल करने से बचते हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया के सोचने-समझने का तरीका बदलकर रख दिया है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक आने वाले समय में पूरी दुनिया में 100 करोड़ नौकरियां अकेले टेक्नोलॉजी पर ही आधारित होंगी, इसलिए नई-नई टेक्नोलॉजी की जानकारियां जुटाना और उन में महारत हासिल करना भारत के युवाओं के लिए बहुत जरूरी है। भविष्य में भारत में टेक्नोलॉजी आधारित जिन पांच क्षेत्रों में नौकरियों की सबसे ज्यादा संभावनाएं होंगी उनमें हैं, ब्लॉकचैन डेवलपर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पेशलिस्ट, जावास्क्रिप्ट डेवलपर, रोबोटिक कंसल्टेंट्स और बैकएंड डेवलपर, नौकरियों की प्रतियोगिता में इनके सबसे बेहतर चांस हैं, इसलिए टेक्नोलॉजी के इन क्षेत्रों में स्किल सेट करना बहुत फायदेमंद साबित होगा। इसके अलावा फ्रीलांस कंटेंट क्रिएटर, फाइनेंस एक्सपर्ट्स, शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मी और डेटा साइंटिस्ट्स के लिए भी भारत में भरपूर मौके होंगे, इसलिए आज यह जरूरी है कि डिग्री व सर्टिफिकेट के साथ-साथ छात्रों को अपनी स्किल्स को बेहतर बनाना चाहिए। भारत की नई शिक्षा नीति भी इसमें बहुत सहायक है, नई शिक्षा नीति के मुताबिक कोई भी छात्र, किसी भी वर्ष में, कॉलेज की पढ़ाई को छोड़कर कोई नया स्किल सीख सकता है और फिर वापस आकर कॉलेज ज्वाइन कर सकता है। अत: अब इस नए समय में, नए भारत के निर्माण के लिए, छात्रों को डिग्रियों के साथ-साथ अपने स्किल डेवलपमेंट यानी कौशल विकास पर भरपूर ध्यान देना होगा।

 


रंजना
मिश्रा

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