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दुर्दांत तालिबान

दुर्दांत  तालिबान

अफगानिस्तान में दो दशकों की सैन्य उपस्थिति के बाद इस क्षेत्र से अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाने के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के फैसले के बाद अफगानिस्तान के भाग्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गयी हैं। वास्तव में अफगानिस्तान में हुई तालिबानी अमानवीयता, क्रूरता एवं बर्बरता की घटनाओं से जुड़े अनेक प्रश्नों को खड़ा करती है। अफगानिस्तान का लगभग अठारह वर्षों तक अमेरिकी एवं मित्र देशों के साये में जद्दोजहद के बाद फिर अंधेरे सायों एवं अमानवीयता के शिकंजे में चले जाना पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक तो है ही, मानवीयता पर कठोर हमला भी है। कथित इस्लामी सत्ता की स्थापना के लिए तालिबान जो कर रहा है, उसकी दुनिया में शायद ही किसी कोने में प्रशंसा होगी। दुनिया स्तब्ध है और भारत जैसे देश तो कुछ ज्यादा ही आहत हैं। बड़ा प्रश्न है कि अठारह वर्षों तक इस मुल्क में तालिबानों से मुकाबला करने के बाद अमेरिकी फौजों ने इस देश का साथ क्यों छोड़ा? प्रश्न यह भी है कि दुनिया में मानवता की रक्षा की वकालत करने वाली महाशक्तियां क्या सोचकर इस अवसर पर चुप्पी साधे रही? भारत सदैव मानवीय मूल्यों का हिमायती एवं रक्षक रहा है। अफगानिस्तान कभी भारत वर्ष का हिस्सा रहा था, इस आधार पर नहीं, पर मानवीयता के आधार पर भारत ने वहां तन-मन-धन से विगत कम से कम बीस वर्षों में भारी निवेश किया। एक उदारवादी एवं मानवतावादी ताकत के रूप में न जाने कितनी विकास परियोजनाओं में भारत की वहां हिस्सेदारी रही। भारत ने वहां अरबों डॉलर के सहायता कार्यक्रम चला रखे हैं, अब उनका क्या होगा? भारत और भारतीयों द्वारा वहां मानवीय सहायता, शिक्षा, विकास, निर्माण और ऊर्जा क्षेत्र में किए गए निवेश का क्या होगा? तालिबान पर किसी को भरोसा नहीं है और अभी सभी का ध्यान अपने-अपने नागरिकों को बचाने पर है, लेकिन आने वाले दिनों में व्यवस्थित ढंग से सोचना होगा कि ताकत और पैसे के भूखे आतंकियों के खिलाफ क्या किया जाए।

इसी परिप्रेक्ष्य में यह कहना उपयुक्त है की यह खुशी की बात है कि अफगानिस्तान से भारतीय नागरिकों की सकुशल वापसी हो रही है। भारत सरकार की नींद देर से खुली लेकिन अब वह काफी मुस्तैदी दिखा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन प्रशंसनीय है कि अफगानिस्तान के हिंदू और सिख तथा अफगान भाई-बहनों का भारत में स्वागत है। ऐसा कहकर उन्होंने सीएए कानून को नई ऊंचाईयाँ प्रदान कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जर्मन चांसलर एंजला मर्केल और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन से अफगानिस्तान के मसले पर बात की। संयुक्त राष्ट्रसंघ और अंतरराष्ट्रीय मानव आयोग में भी हमारे प्रतिनिधियों ने भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। हमारे प्रधानमंत्री और प्रतिनिधियों ने अपनी बातचीत और भाषणों में कहीं भी तालिबान का नाम तक नहीं लिया। उन्होंने काबुल में किसी की भर्त्सना नहीं की लेकिन उन्होंने बड़े पते की बात बार-बार दोहराई। उन्होंने कहा कि हम काबुल की सरकार से अपेक्षा करते हैं कि वह आतंकवाद को बिल्कुल भी प्रश्रय नहीं देगी; वह अफगानिस्तान की जमीन को किसी भी मुल्क के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देगी। ये जो बातें हमारी तरफ से कही गई हैं, बिल्कुल ठीक हैं। भारत ने चीन की तरह अमेरिका के मत्थे  सैनिक वापसी और अराजकता का ठीकरा नहीं फोड़ा है और न ही उसने पाकिस्तान पर कोई हमला किया है, हालांकि पाकिस्तान तालिबान को पहले भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। इस समय भारत के लिए सही नीति यही है कि उसका रवैया रचनात्मक रहे और सावधानीपूर्ण रहे।

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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