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अफगानिस्तान में तालिबान का तांडव

अफगानिस्तान में तालिबान का तांडव

कहते हैं की बर्बाद ए गुलिस्तां करने को एक उल्लू काफी है, यहाँ तो हर शाख पर उल्लू बैठे हैं।  अफगानिस्तान की भी अभी यही हालत है। पिछले बीस सालों से जो भी विकास की सड़कें अफगानिस्तान ने देखी थी, वह  फिर से ज़मींदोज होने की कगार पर है। तालिबान एक बार फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो चुका है बस इसका औपचारिक ऐलान बाकी है। तालिबान के एक अधिकारी ने कहा है कि विद्रोही संगठन जल्द ही काबुल स्थित राष्ट्रपति परिसर से अफगानिस्तान को इस्लामी अमीरात बनाने की घोषणा करेगा। गौरतलब यह है की   11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद, अमेरिका नीत बलों द्वारा अफगानिस्तान से तालिबान को अपदस्थ करने के लिए शुरू किए गए हमलों से पहले भी आतंकी संगठन ने युद्धग्रस्त देश का नाम इस्लामी अमीरात अफगानिस्तान रखा हुआ था।

हिन्दुकुश की पहाड़ियों से घिरे इस खूबसूरत मुल्क को उसके रहबरों ने इस पैमाइश के वक्त उसका साथ छोड़ दिया। अफगानी राष्ट्रपति  अशरफ गनी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मुहिब और राष्ट्रपति फजल महमूद फाजली के प्रशासनिक कार्यालय के प्रमुख के साथ अफगानिस्तान से ताजिकिस्तान के लिए रवाना हुए। कुछ विधायक इस्लामाबाद भी भाग गए हैं। इससे पहले, अफगान संसद के अध्यक्ष मीर रहमान रहमानी, यूनुस कनुनी, मुहम्मद मुहाक, करीम खलीली, अहमद वली मसूद और अहमद जिया मसूद इस्लामाबाद भाग गए, अफगान मीडिया ने बताया। राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने एक वीडियो क्लिप में कहा कि पूर्व अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अफगानिस्तान छोड़ दिया।

तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और सुरक्षा भी फेल हो गई, क्योंकि हजारों लोगों ने रनवे पर कब्जा कर लिया और हर कोई जल्द से जल्द अफगानिस्तान से निकलना चाहता है।  अफगान में तख्तापलट के बाद हजारों विदेशी भी फंस गए।  भारतीय राजदूत और आईटीबीपी के 150 जवान भी काबुल में फंस गए थे, जिन्हें निकालने के लिए एयरफोर्स के 2 प्लेन भेजने पड़े। दरअसल दशकों तक चले संघर्ष और युद्ध के बाद आखिरकार अफगानिस्तान की राजधानी पर तालिबान का कब्जा हो गया और महज 24 घंटे में अफगानिस्तान पर तालिबान का राज कायम हो गया।

तालिबानी 20 साल बाद काबुल की सत्ता पर काबिज हुए हैं, लेकिन  इसमें कोई शक नहीं की अफगानिस्तान करीब 20 साल पीछे चला गया है। अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों से लेकर अब तक के बीस सालों में ना सिर्फ अफगानिस्तान को तालिबान के कब्जे से आजाद कराया गया बल्कि इन दो दशकों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में लाखों-करोड़ों डॉलर खर्च किए। तालिबान से लड़ाई में हजारों अमेरिकी और अफगानी सैनिकों ने शहादत दी, मगर अब एक बार फिर अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से ऐसा लग रहा है जैसे सारा संघर्ष व्यर्थ हो गया।  तालिबान से अमेरिका और अफगानिस्तान की जंग का परिणाम शून्य निकला, क्योंकि जिस तालिबान से अमेरिका 20 साल तक लड़ा वो तालिबान अमेरिकी सेना की वापसी के बाद 44 दिन के अंदर ही काबुल पहुंच गया।

 

सुपरपावर निकला फिसड्डी

यह न सिर्फ देखने बल्कि सोचने वाली बात भी है की जिस अमेरिका ने 20 साल तक अफगानिस्तान पर अपना दबदबा कायम रखा, अरबों डॉलर खर्च कर अफगानी फौज को टफ ट्रेनिंग देने का ढोल पीटता रहा, आधुनिक हथियार दिए, अल्ट्रा मॉडर्न साजो सामान दिया उसके लौटते ही सारी कहानी ही पलट गयी। अमेरिका के सारे दावे धरे रह गए। सुपरपावर फिसड्डी साबित हुआ। पिछले 20 साल में काबुल से खदेड़े गए तालिबानी एक बार फिर काबुल की गद्दी पर काबिज हो गए, लेकिन यकीन करना मुश्किल है कि ये सब कुछ महज 44 दिनों के अंदर हो गया।

जानकारों के मुताबिक अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ते ही तालिबान बिजली की रफ्तार से काबुल में बने सत्ता के महल में दाखिल हो गया, लेकिन इसकी शुरुआत इससे भी पहले हुई। 14 अप्रैल को जब प्रेसिडेंट जो बाइडेन ने दुनिया को बताया कि अमेरिकी फौज अफगानिस्तान से वापस लौटेगी।  बाइडेन ने ऐलान कर दिया कि 11 सितंबर तक सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान की धरती छोड़ देंगे और 1 मई, 2021 को अमेरिका और नाटो ने अपने 9,500 सैनिकों को वापस बुलाना शुरू किया, जिनमें से 2,500 अमेरिकी सैनिक थे।

2 मई को अचानक ही अमेरिकी सैनिक कंधार एयरबेस को खाली कर निकल लिए। इसके साथ ही अमेरिकी फौज के लौटने की रफ्तार तेज हो गई। 2 जुलाई को बगराम एयरबेस, जो अफगानिस्तान का सबसे बड़ा और अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन के संचालन का सबसे अहम केंद्र था उसे अफगान बलों को सौंप दिया गया। और यही वह तारीख थी जब  पिछले दो दशकों से सत्ता से बेदखल तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जे की जंग शुरू कर दी।

चूँकि बगराम एयरबेस राजधानी काबुल से एक घंटे की दूरी पर ही स्थित है और उसके खाली होते ही तालिबानियों को शह मिली और उन्होंने अफगानिस्तान पर कब्जे की भीषण जंग छेड़ दी और इसके साथ ही अमेरिका का सारा संघर्ष और तमाम बलिदान अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद बेकार साबित होने लगा।

 

कैसे किया कब्ज़ा?

टीवी9 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ”अमेरिकी सेना के हटते ही सबसे पहले तालिबान ने अफगानिस्तान के अलग-अलग प्रांतों में ग्रामीण इलाके को कब्जा किया और फिर प्रांतीय राजधानियों की ओर बढऩे लगे। हालांकि अफगानिस्तान सेना की जांबाजी किसी काम नहीं आयी। जरांज तालिबान के नियंत्रण में आने वाली पहली प्रांतीय राजधानी थी, जिसके बाद तालिबानी आतंकी आगे बढ़ते गए और एक-एक प्रांत पर कब्जा करते चले गए। बीते 10 दिन में तालिबान की रफ्तार और तेज हुई। 8 अगस्त को तालिबान ने प्रांतीय राजधानी सर-ए-पुल, कुंदूज, तालोकान पर तालिबान ने कब्जा कर लिया। 13 अगस्त को तालिबान को सबसे बड़ी सफलता मिली, उसने अफगानिस्तान के दूसरे बड़े शहर कंधार पर कब्जा कर लिया। 14 अगस्त को चौथे बड़े शहर मजार-ए-शरीफ पर तालिबान का कब्जा हो गया।ÓÓ

15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के साथ ही अफगानिस्तान में तालिबान का राज कायम हो गया, लेकिन यहां सवाल ये है कि अफगानिस्तान पर तालिबान ने इतनी जल्दी फंदा कैसे कस दिया? तालिबान में ऐसा क्या है, जिसने देखते ही देखते एक मुल्क की सत्ता को रौंद दिया? इन सारे सवालों के जवाब के मूल जड़ में हैं अफगान नेता। अफगान नेताओं ने तालिबान से समझौता कर अफगानिस्तान का भविष्य तालिबान को सौंप दिया।  तालिबान ने सभी बड़े शहरों में स्थानीय नेताओं को इसके लिए राजी कर लिया कि वो अपने इलाके के सैनिकों को लड़ाई ना करने के लिए कहें। इस बात की तस्दीक कंधार के गवर्नर रोहुल्ला खानजादा ने भी की, जिनके मुताबिक नेताओं ने सैनिकों से लड़ाई ना करने का आग्रह किया और कंधार जैसा बड़ा शहर बिना लड़ाई के तालिबान के नियंत्रण में चला गया।

इसके बाद तालिबान ने सेना के कमांडरों, जिलों और प्रांत स्तर के नेताओं से संपर्क किया। उन्हें इस बात के लिए राजी किया की वो अगर सैनिकों से हथियार डलवा दें तो उनकी जान बख्श दी जाएगी। इसके लिए सैनिकों और कमांडरों के कबीले, दोस्त, परिवार की मदद भी तालिबान ने ली।  उनकी ये चाल कामयाब रही। तालिबान ने काबुल फतह के लिए प्रोपेगेंडा का भी सहारा लिया।  उसने ये बात, डर और दहशत आम लोगों से लेकर सैनिकों तक के दिमाग में बिठा दी कि आखिर में जीतेगा तो तालिबान ही और इसलिए बिना वजह ना तो तालिबान का विरोध करें और ना ही तालिबान से दुश्मनी मोल लें।  तालिबान का ये प्रोपेगेंडा काम कर गया और अफगानिस्तान के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ।

 

भारत के ऑप्शंस 

यह कोई संयोग भर नहीं है कि जिस समय संयुक्त राज्य अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकल रहा है, उसी समय उसकी विदेश नीति पूर्वी एशिया पर केंद्रित हो रही है।

इस बात पर आम सहमति बढ़ती जा रही है कि संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने विफल युद्धों में ही संलग्न बने रहने के बजाय अब चीन के साथ उभरती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिये स्वयं को तत्काल तैयार करना चाहिये।

तालिबान को पराजित करना और अफगानिस्तान का राष्ट्र-निर्माण अमेरिका की नव-रूढ़िवादी विचारधारा (लोकतंत्र को बढ़ावा देना और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में हस्तक्षेप) का अंग रहा था, जो स्पष्ट रूप से विफल रहा है।

हालाँकि अमेरिका भले ही अफगान सरकार का साथ छोड़ दे और इससे बाहर निकल आए किंतु भारत यह जोखिम नहीं उठा सकता। उसे न केवल अपने निवेश की रक्षा करनी है बल्कि अफगानिस्तान को भारत विरोधी आतंकवादी समूहों के लिये एक और सुरक्षित आश्रय बनने से रोकना है। इसके साथ ही भारत को काबुल के ऊपर पाकिस्तान के प्रभाव में वृद्धि पर भी संतुलित नियंत्रण कायम रखना है। अब जानकारों की माने तो अफगानिस्तान में जब तक अगली सरकार का गठन नहीं हो जाता, तब तक भारत सरकार की ओर से कोई रुख नहीं अपनाया जाएगा।  भारत ‘वेट एंड वॉचÓ की स्थिति ही बनाए रहेगा। भारत सरकार के सूत्रों से ये जानकारी मिली है कि अभी अफगानिस्तान में सरकार बनने का इंतजार किया जा रहा है। जिस तरह की सरकार बनेगी, उसी आधार पर भारत आगे अपना रुख तय करेगा। मतलब भारत सरकार अभी वेट एंड वॉच की स्थिति बनाए हुए है। भारत की नजर इस पर है कि अफगानिस्तान में अब पूर्ण तालिबानी सरकार बनेगी या अभी फिलहाल अंतरिम सरकार ही बनेगी।  हालांकि तालिबान के प्रवक्ताओं ने मीडिया से बात करते हुए इस बात के संकेत दिए हैं कि अफगानिस्तान में भारत की ओर से जिन प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, उसमें तालिबान किसी तरह की बाधा नहीं डालेगा।

अब इसमें तो कोई शक की गुंजाईश नहीं है की अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के परिणामों के प्रभाव भारत पर भी पडेंगे अत: उसे अपने हितों की रक्षा और अफगानिस्तान की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये यूरेशियाई शक्तियों के साथ मिलकर कार्य करना ही होगा।

 

नीलाभ कृष्णा

 

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