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अफगानिस्तान में तालिबान के आगमन से उपजा वैश्विक संकट

अफगानिस्तान में तालिबान के आगमन से उपजा वैश्विक संकट

“मुल्क कों मुल्क न रहने देने का नाम है तालिबान। धर्म की सत्ता का नया नाम है तालिबान। लाशों के ऊपर धर्म का झंडा लगा देने का नाम है तालिबान। औरतों को बुर्का पहनाकर भी नंगा कर देने का नाम है। बच्चों को मजहबी तालीम देकर भी उसे आतंकवादी बनाने का नाम है तालिबान। मानवीय संस्कारों को तिलांजलि देकर हथियारों के द्वारा जिहाद को काबिज़ज कर देने का नाम है तालिबान”

यह कहानी वहां कि है जिसे लोग अनार का देश कहते है, अनार खाइये तो उसके रस से निकला रंग मुँह लाल कर देता है, देख कर लगे कि जैसे मुँह मे खून लग गया हो और विडंबना तो देखिए यही खून इस देश का भाग्य बन गया है जी हा हम बात कर रहे है अफगानिस्तान की, जो हालहि में एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया जब अमेरिकी सैनिको की वापसी से एक बार फिर से अफगानिस्तान में तालिबानियों की भी वापसी हो गई। मसलन अमेरिका सैनिकों ने 20 साल के लंबे युद्ध के बाद अफगानिस्तान के सबसे बड़े एयर बेस बगराम को खाली कर दिया है। इसके साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियान का अंत हो गया।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों का वापस लौटना लगातार जारी है दरअसल अमेरिका राष्ट्रपति जो बाईडेन ने इस साल की शुरुआत में ही ऐलान कर दिया था कि 11 सितंबर 2021 से पहले अमेरिका सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लिया जायेगा। लेकिन अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी तय हो जाने के बाद से वहां तालिबान का कब्जा जिस तेजी से बढ़ रहा है वह पुरे विश्व के लिए बेहद चिंताजनक है। भारत के लिए ज्यादा चिंतजानक इसलिये है क्योकि भौगोलिक दृष्टि से भारत अफगानिस्तान का पडोसी देश है जिसके चलते भारत पर अफगानी पलायन का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है । माना जा रहा है कि साल 2001 के बाद पहली बार तालिबान इतना मजबूत दिख रहा है। आशंका जताई जा रही है कि इससे अमेरिकी सेना के बाहर निकलने के बाद अफगानिस्तान में सरकार के अस्थिर होने का खतरा है। जिसका सबूत 31 अगस्त तक अफगानिस्तान को अमेरिकी वर्चस्व से खत्म करने का अलल्टीमेटम तालिबानियों द्वारा विश्व शक्ति अमेरिका को दिया जाना माना जा सकता है। स्थिती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व पटल के दो देश चीन और पाकिस्तान अब खुल कर अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार के गठन को मंज़ूरी देने लगे है जिससे भारत मे आतंकवाद की समस्या मे भी इज़ाफा होगा।

अमेरिका के अफगानिस्तान में दाखिल होने की कहानी 2001 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलें से जुड़ी हुई है। 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों में लगभग 3000 लोगों की मृत्यु हुई थी। इस्लामिक आतंकवादी समूह अल-कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को इन हमलों के लिये उतरदायी ठहराया गया था। कट्टरपंथी इस्लामवादी तालिबान, जो कि उस समय अफगानिस्तान पर शासन कर रहा था ने लादेन की रक्षा की और उसे सौंपने से इनकार कर दिया। इसलिये 9/11 हमले के एक महीने बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान के विरुद्ध हवाई हमले ”ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडमÓÓ  शुरू कर दिया। इसके पश्चात नाटो गंठबधन ने भी अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। लंबी कार्रवाई के पश्चात अमेरिका ने तालिबान शासन को उखाड़ फेंका और अफगानिस्तान में एक संक्रमणकालीन सरकार की स्थापना की। लेकिन अब अमेरिकी सैनिको की अफगानिस्तान से वापसी से एक बार फिर अफगानिस्तान में तालिबानियों का आंतक आ गया है।

पश्तों भाषा में छात्रों को तालिबान कहा जाता है। 90 के दशक की शुरूआत में जब सोवियत संघ अफगानिस्तान से अपने सैंनिको को वापस लौटा रहा था उसी दौर में तालिबान का उभार हुआ माना जाता है। पश्तों आदोंलन पहले इस्लामिक मदरसों में उभरा और इसके लिए सउदी अरब ने फंडिग की। इस आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता था। जल्द ही तालिबानियों के द्वारा यह वादा किया जाने लगा कि अफगनिस्तान और पाकिस्तान के बीच फैले पश्तून इलाकों में शांति और सुरक्षा की स्थापना के साथ-साथ शरीया कानून के शुद्ध प्रारूप को लागू किया जाएगा। इसी दौरान दक्षिण पश्चिम अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव काफी तेजी से बढ़ा, सिंतबर 1995 में तालिबानियों ने ईरान की सीमा से लगें हेरात प्रांत पर कब्जा किया इसके ठीक 1 साल बाद तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबूल पर भी अधिकार कर लिया। उन्होंने उस समय अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रह बुरहानद्दीन रब्बानी को सता से हटा दिया। साल 1998 के आते-आते अफगानिस्तान के तकरीबन 90 प्रतिशत क्षेत्र पर तालिबान का नियंत्रण स्थापित हो गया और इसी के परिणामस्वरुप तालिबानी कट्टरपथियों ने अफगानिस्तान में शुद्ध इस्लामी तौर तरीकों को लागू किया जैसे:

  • मुस्लिम पुरूष ढाडी रखेगे और महिलाए बुर्का पहन कर ही घर से निकलेगी।
  • 10 साल की लड़कियों को स्कूल जाने की मनाही।
  • शरिया कानूनो का पालन नहीं करने पर मौत के घाट उतार दिया जाएगा।

वर्तमान में तालिबान के आगमन से अफगानिस्तान की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है और एक बार फिर से तालिबान के द्वारा शरिया के शुद्ध रूप को हतियारों के दम पर स्थापित किया जा रहा है। बाहरहाल तालिबान धर्म का चोला ओड़े जिस हिंसक रूप में एक बार फिर आया है उसकी दहशत पूरे विश्व मे दिखाई दे रही है।

अमेरिका का मानना है कि तालिबान के विरुद्ध चल रहा युद्ध अजेय है। अमेरिका प्रशासन ने वर्ष 2015 में मुरी में पाकिस्तान द्वारा आयोजित तालिबान और अफगान सरकार के बीच पहली बैठक के लिये अपना एक प्रतिनिधि भेजा था, हालांकि मुरी वार्ता से कुछ प्रगति हासिल नहीं की जा सकी थी।

दोहा वार्ता: तालिबान के साथ सीधी बातचीत के उदेश्य से अमेरिका ने अफगानिस्तान के लिये एक विशेष दूत नियुक्त किया। उन्होंने दोहा में तालिबान प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 2020 में अमेरिका और विद्रोहियों के बीच समझौता हुआ। दोहा वार्ता शुरू होने से पहले तालिबान ने कहा था कि वह केवल अमेरिका के साथ सीधी बातचीत करेगा, न कि काबुल सरकार के साथ, जिसे उन्होंने मान्यता नहीं दी थी। अमेरिका ने प्रकिया से अफगान सरकार को अलग रखते हुए इस मांग को प्रभावी ढंग से स्वीकार कर लिया और विद्रोहयों के साथ सीधी बातचीत शुरू की। परिणामत: अमेरिका और तालिबान के मध्य कुछ समझौते हुए जिसमे कुछ महत्वपूर्ण शर्तो को सुनिश्चित किया गया। गौरतलब है कि इस समझौते मे विवाद के चार प्रमुख पहलू रहे जिसमे, हिसां, विदेशी सैनिकों, अंतर-अफगान शांति वार्ता तथा अल-कायदा एवं इस्लामिक स्टेट (आईएस की एक अफगान इकाई)  जैसे आतंकवादी समूहों द्वारा अफगान धरती के उपयोग जैसी गलघोठ शर्तो को माना गया है। समझौते में तय किया गया कि अमेरिका 11 सिंतबर 2021 तक अफगनिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिको को वापस बुला लेगा और तालिबान ने हिंसा कम करने, अतंर अफगान शांति वार्ता में शामिल होने की सहमति दी।

अंत में, यह समझना भी जरूरी है कि तालिबान के आने से पूरी दुनिया के कट्टरपंथी खुश हो रहे है। भारत के कट्टरपंथी, चरमपंथी फूले नहीं समा रहें है लेकिन वो शायद यह भूल रहे है कि कट्टरपंथी वो भेडि़ए है जो सिर्फ शिकार करना जानते है। वो यह नहीं देखते की यह हमारे लोग है, हमारे जैसे लोग है। हर कट्टरपंथी तभी कट्टरपंथी बनता है जब वह यह मान लेता है कि उसके जैसा कोई भी नही है । तालिबान इस दुनिया में, अनवरत संघर्ष से प्राप्त की गयी सारी चीजों को खत्म करने के उददेश्य के साथ आया है। वो समय को करीब 15 सौ साल पीछे करने आया है। जिसके विषय में केवल भारत को ही नहीं अपितु पुरे विश्व को चिंतित होने की जरुरत है। ऐसा इसलिए क्योकि धर्म खतरे में है के नारे जब-जब किसी देश मे लगते है वह वास्तव में उस देश में जिहादी हिंसा को बढ़ावा देने का पहला कदम होता है जिसके शिकार अक्सर देश के युवा और मानवतावादी समर्थको को बनाया जाता है। मसलन समझने का विषय यह है कि धर्म तो हर समय सुरक्षित रहता है लेकिन उसके खतरे में होने का नाम लेकर पूरी मानव जाति को खतरे में डाल दिया जाता है। जिसका भायावह रूप इस्लामिक कट्टरतावाद के रूप मे सामने आता रहा है जिसका वर्तमान उदहारण आज अफगानिस्तान बना हुआ है।

 

डॉ. प्रीति

(लेखिका, अस्सिटेंट प्रोफेसर,शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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