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तालिबानी कब्जे में बदकिस्मत अफगानिस्तान

तालिबानी कब्जे में बदकिस्मत अफगानिस्तान

अफगानिस्तान में इन दिनों अफरातफरी का माहौल है। वजह है अफगानिस्तान में ठीक बीस साल बाद उस तालिबान की वापसी, जिसे अमेरिका की अगुआई में नाटो देशों की सेनाओं ने खदेड़ दिया था। तालिबान का अतीत जैसा रहा है, जिस तरह की उसकी कारस्तानियां रहीं हैं, उसके बाद अफरातफरी मचनी ही थी। पिछले साल दोहा में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ हुए समझौते के बाद तालिबान को वैसे तो 14 अगस्त तक ना सिर्फ काबुल आना था, बल्कि उसे शांति पूर्वक सत्ता का हस्तांतरण करना था। लेकिन उसने पहले ही काबुल में ना सिर्फ कब्जा कर लिया, बल्कि वहां बल पूर्वक सत्ता भी हासिल कर ली। उसके डर से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी पहले ही अफगानिस्तान छोड़कर कतर भाग गए।

इसके बाद से अफगानिस्तान का हर नागरिक अफगानिस्तान छोडऩे की फिराक में जुट गया है। काबुल हवाई अड्डे की ओर लोग लगातार जा रहे हैं। जिन्हें रोकने के लिए तालिबान के लड़ाके फायरिंग कर रहे हैं। अफगानिस्तान में जिसे जहां मौका मिल रहा है, उसी इलाके से सीमा पार करने की कोशिश में है। कुछ लोग उजबेकिस्तान निकल गए तो भारी संख्या में लोग पाकिस्तान की ओर आ रहे हैं। हवाई जहाज से या तो लोग कतर जा रहे हैं या फिर भारत आ रहे हैं। कुछ ने मास्को का रूख किया तो कुछ ने कहीं ओर का। अफगानी लोगों के डर की वजह भी है। दरअसल अपने पिछले शासन के दौरान तालिबान ने कड़े इस्लामिक कानून लागू किए थे। चूंकि ऐसे ही कानून उसने 1996 से 2001 के बीच के अपने शासन काल में भी लागू किए थे। इसलिए यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। तब तालिबान ने बच्चियों के स्कूल जाने और महिलाओं के बाहर काम करने पर पाबंदी लगा दी थी। इसके साथ ही उनके लिए बुर्का पहनना जरूरी कर दिया था। शरीया कानूनों के मुताबिक तालिबान शासन के दौरान महिलाओं के घर से बाहर निकलते वक्त अपने साथ अपना पुरुष रिश्तेदार रखना भी जरूरी होता था। तालिबान ने तब संगीत और सिनेमा पर पाबंदी लगा दी थी। उस दौरान कड़ी सजाएं भी दी जाती थीं। चोरी के आरोप में लोगों के हाथ काट लिए जाते थे तो बेवफाई की सजा सार्वजनिक रूप से पत्थर मारना थी।

दुनियाभर में हो रही आलोचनाओं और आशंकाओं को देखते हुए तालिबान ने इस बार अपना नरम चेहरा दिखाने की कोशिश की है। काबुल पर कब्जे के बाद यहां के स्थानीय चैनल टोलो न्यूज पर उसकी महिला एंकर बेहेश्ता को तालिबान के प्रवक्ता अब्दुल हक हम्माद ने इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू में तालिबान प्रवक्ता अब्दुल हक हम्माद ने दावा किया कि तालिबान इस बार लोगों का दिल और दिमाग जीतेगा। हम्माद ने यहां तक दावा किया कि तालिबान के कब्जे में अफगानिस्तान शांति बहाली की तरफ बढ़ेगा। गौरतलब है कि हम्माद तालिबान के दुबई स्थित दफ्तर में रहता है। उसके पास ऑस्ट्रेलिया की भी नागरिकता है। इस इंटरव्यू में उसने कहा कि उनके लिए लोगों का दिल और दिमाग जीतना और अंतरराष्ट्रीय लोगों को यह दिखाना महत्वपूर्ण है कि वे वैध हैं और उनके साथ कोई भी काम कर सकता है। उसने यह भी कहा कि तालिबान शासन मीडिया को काम करने की आजादी देगा।

लेकिन यह सारी बातें थोथी साबित हुईं। अगले ही दिन तालिबान के आतंकियों ने यहां के टीवी चैनलों पर कब्जा कर लिया और वहां ड्यूटी पर आई महिलाओं को वापस भेज दिया। इतना ही नहीं, काबुल छोड़कर भाग रहे लोगों पर गोलीबारी की। तालिबान लड़ाके कहीं भी-कभी भी गोलीबारी कर दे रहे हैं।

दोहा समझौते के मुताबिक अमेरिकी सैनिकों को 11 सितंबर तक अफगानिस्तान छोडऩा है। लेकिन अब तालिबान ने अमेरिका को 31 अगस्त तक अपने सैनिकों को वापस बुलाने का फरमान सुना दिया है। तालिबान के इस कदम से माना जा रहा है कि वह देर से ही सही, अपने उसी पुराने रंग में लौट आएगा, जैसा रंग उसका 1996 से 2001 के शासन के बीच रहा है। जिसमें उसने एक तरह से मध्ययुगीन शासन व्यवस्था स्थापित की थी। इसी शासन के दौरान उसने बामियान की प्रसिद्ध बुद्ध मूर्तियां उड़ा दी थीं। इस बार भी उसका वही रूप देखने को मिल रहा है। उसके लड़ाकों ने गजनी स्थित इस्लामिक सांस्कृतिक केंद्र को ढहा दिया है।

तालिबान पर भारत ने अपना रूख अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। लेकिन अतीत में भारत के साथ तालिबान का जो रवैया रहा है, वह आशंकित करने के लिए काफी है। वैसे तो अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत तीन लाख करोड़ डॉलर खर्च कर चुका है। लेकिन माना जा रहा है कि भारत सरकार देखो और इंतजार करो की नीति पर अमल कर रहा है। वैसे कुछ खबरें आई हैं, जिसके मुताबिक अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहां सक्रिय कश्मीरी आतंकी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लौट आए हैं और वहां उन्होंने विजय जुलूस निकाला है।

भारत से चीन और पाकिस्तान के रिश्ते छुपे नहीं हैं। सबको पता है कि चीन और पाकिस्तान भारत के प्रति कैसी धारणा रखते हैं। जिस तरह तालिबान को समर्थन देने का चीन ने ऐलान किया है और हाल के दिनों में ईरान ने भारत से जिस तरह दूरी दिखानी शुरू की है, उससे भारत की सीमाओं में चुनौती बढऩे की आशंका बढ़ गई है। चीन, पाकिस्तान, ईरान और अब अफगानी तालिबान मिलकर भारत के खिलाफ कुचक्र रच सकते हैं। इसके लिए भारत को सचेत रहना होगा। दिसंबर 1999 में जिस तरह काठमांडू से दिल्ली आ रहे भारतीय विमान का अपहरण हुआ था, वह भारत नहीं भूल पाया है। उसके पीछे तालिबान का भी हाथ रहा। फिर तालिबान के आतंकी पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते भारतीय कश्मीर में आतंकी दखलंदाजी करने की कोशिश करेंगे। शायद यही वजह है कि भारत की अभी पूरी कोशिश अफगानिस्तान से अपने नागरिकों की सकुशल वापसी पर केंद्रित है। वैसे तालिबान को भी पता होगा कि आज का भारत 1999 का भारत नहीं है और ना ही अब भारत में गठबंधन की ऐसी सरकार है, जो दबावों में काम करने को मजबूर थी। इसलिए तालिबान भी भारत के खिलाफ सोच-समझकर ही कदम उठाने की सोचेगा।

सबसे हैरत की बात यह है कि अफगानिस्तान की सेना में तीन लाख से ज्यादा सैनिक कार्यरत थे। जब अमेरिकी सेनाओं की वापसी होने लगी तो तालिबान ने जिस तरह हमले शुरू किए, तब तमाम सैनिक और अफगानी मामलों के जानकार दावा कर रहे थे कि अफगान सेना के सामने सत्तर-पचहत्तर हजार की संख्या वाले तालिबान टिक नहीं पाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जानकारों के मुताबिक, अफगानी सैनिकों के समर्पण की कई वजहें रहीं। दरअसल माना जा रहा है कि बाहरी मदद के चलते अफगानिस्तान में इफरात पैसा आ रहा था। वहां आर्थिक कदाचार पर लगाम का कोई माकूल इंतजाम नहीं था। भ्रष्टाचार का आरोप वहां के गृहमंत्री तक पर भी लग रहा था। चूंकि राजनीतिक नेतृत्व में भ्रष्टाचार चरम पर था, लिहाजा सैनिकों को वह लडऩे के लिए प्रेरित नहीं कर पाया। जब देश में तालिबान ने सक्रियता बढ़ाई, तब भ्रष्टाचार की वजह से सैनिकों को वक्त पर गोला-बारूद तक नहीं मिल पा रहा था। सुरक्षा बलों को ना तो पर्याप्त वेतन मिल रहा था और ना ही वक्त पर ठीक खाना। जानकार बताते हैं कि ज्यादातर सैनिकों की तनख्वाह महज पांच हजार रूपए के बराबर थी। वह भी भ्रष्टाचार की वजह से वक्त पर नहीं मिल पाता था। ऐसे में जैसे ही तालिबान ने दबिश बढ़ाई, सुरक्षा बलों ने मोर्चा छोड़ दिया।

यह बात और है कि तालिबान अफगानिस्तान की पंजशीर घाटी में विरोध तेज हो गया है। अहमद शाह मसूद के बेटे शाह मसूद और उपराष्ट्रपति अब्दुल्ला सालेह की अगुआई में पंजशीर घाटी ने तालिबान का नेतृत्व और सरकार मानने से इनकार कर दिया है। अफगानिस्तान में इस बीच कुछ जगहों पर लोगों ने भय त्यागकर प्रदर्शन भी किए हैं।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा किरकिरी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की हुई है। बेशक अमेरिका का अफगानिस्तान में पांव फंस गया था। लेकिन यह भी सच है कि बाइडन द्वारा सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान में जिस तरह मानवता त्राहि कर रही है, उसके लिए दुनिया तो दुनिया, अमेरिका के लोग भी बाइडन को जिम्मेदार बता रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तो मौका मिल गया है, यह बताने का कि उनके रहते ऐसा नहीं हो सकता था। वे कह रहे हैं कि बाइडन ने अमेरिका ने समर्पण कर दिया है। इस बीच तालिबान ने सरकार बनाने की कवायद तेज कर दी है। उसकी बारह सदस्यीय शूरा यानी केंद्रीय समिति में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई समेत कई नेताओं के शामिल होने की खबर है।

इन सबके बीच अफगानी नागरिक पिस रहा है। वहां के बैंकों में कामकाज ठप्प है। आर्थिक गतिविधियां रूक गई हैं। ब्यूटी पार्लर, सिनेमा हाल आदि बंद हो गए हैं। लोगों को तनख्वाहें नहीं मिल रही हैं और बाहर से जरूरी अनाज नहीं आ पा रहा है। इससे वहां महंगाई दो सौ गुना तक बढ़ गई है। इससे आम अफगानी नागरिक की जिंदगी मुहाल हो गई है। बच्चे भूख से छटपटा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दिशा में कुछ खास करता नजर नहीं आ रहा है। किसी को पता नहीं है कि चार करोड़ की आबादी और कबीलों वाले देश अफगानिस्तान के संघर्ष के दिन कितने लंबे चलेंगे?

 

Deepak Kumar Rath

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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