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उ.प्र. के बाद पंजाब, उत्तराखंड में भी डूबेगी कांग्रेस?

उ.प्र. के बाद पंजाब, उत्तराखंड में भी डूबेगी कांग्रेस?

पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी की ऐसी गले की हड्डी बन गए हैं जिसे न गुटका जा सकता है न बाहर थूका जा सकता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह का कद कम करने के लिए सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है। पर उन्होंने आते ही कांग्रेस का कद कम करना शुरू कर दिया। पंजाब में अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। कोई भी समझदार नेतृत्व ऐसे समय में पार्टी में दो धड़े बनाने का जोखिम नहीं उठा सकता पर सोनिया और राहुल गांधी ने ऐसा किया। सिद्धू को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने का एक भी कारण समझ नहीं आता। चुनाव का समय नजदीक है सिद्धू पंजाब की राजनीति से कुछ समय से बाहर चल रहे थे। राहुल गांधी को अपनी ही पार्टी के मुख्य मंत्रियों या नेताओं के बढ़ते कद से तकलीफ क्यों होती है उन्हें तो कहीं से कोई खतरा नहीं है। यह पहला मौका नहीं है जब पार्टी ने ऐसा कदम उठाया है। राहुल गांधी अपनी गलतियों से कुछ सीखना ही नहीं चाहते हैं।

राहुल ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी इसी तरह गले की हड्डी बना लिया। उनके ही कारण मध्य प्रदेश की सरकार गयी। राहुल को जरूरत से ज्यादा दिग्गी प्रेम ने मध्य प्रदेश में पार्टी की सरकार मिटवा दी। दिग्गी की सलाह पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के कद को कम आंका गया। राज्यसभा की सीट दिग्गी राजा को देना थी तो देते पर सिंधिया को क्यों नहीं दी। दोनों ही लोकसभा का चुनाव हारे थे। सिंधिया के पक्ष में तो 25 से अधिक विधायक थे जबकि दिग्विजय के पास 10, 12 से अधिक नहीं थे। यदि अब दिग्गी का कद कम करते हैं तो मध्यप्रदेश में नुकसान होता है और बनाए रखते हैं तो पार्टी का नुकसान पूरे देश में हो रहा है। यही हाल सिद्धू का हो गया, यदि अध्यक्ष बनाए रखते हैं तो पूरे देश में पार्टी की छीछालेदर हो रही है उसे रोक नहीं पाएंगे। हटाते हैं तो हाईकमान के अपने निर्णय का मजाक बनने का डर है।

उत्तर प्रदेश में वैसे कांग्रेस के पास कुछ खोने को था ही नहीं। थोड़ा बहुत कुछ पा सकती थी। वो अपनी गलतियों से खो दिया। प्रदेश को जब एक मजबूत अनुभवी अध्यक्ष की तलाश थी ऐसे में अजय कुमार लल्लू को बनाये रखने से पार्टी को फिर करारी हार मिल सकती है। न वे संघर्षशील नेता साबित हुए न ही कार्यकर्ताओं में जोश भर सके और न ही बूथ स्तर पर कोई कार्रवाई कर सके। पहले से संगठन और भी कमजोर हो गया। प्रदेश में कोई नेता नहीं प्रियंका गांधी के अतिरिक्त पर वे भी इतने समय के बाद भी उत्तर प्रदेश में कोई अपनी छवि में राजनीतिक निखार नहीं ला सकी। उनके भरोसे उ.प्र. के चुनाव पार्टी लडऩा चाहती है तो ज्यादा कुछ होने  वाला नहीं है। उनके पास करिश्माई नेतृत्व नहीं है न ही राजनैतिक सूझ-बूझ है। केवल इंदिरा जी से मिलती शक्ल है उसका लाभ कितना मिल पाएगा यह पिछले चुनाव ने बतला दिया। यहां तक कि राहुल गांधी अमेठी से लोकसभा सीट हार गये जहां वे चुनाव संभाले हुए थी। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में पार्टी मुंह की खाने वाली है।

मुस्लिम वोटों के लिए कांग्रेस कुछ नहीं कर पाई। स.पा. नेता आजम खान के जेल जाने के बाद प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनकी परवाह नहीं की, इस कारण बहुत से मुस्लिम नेताओं ने अखिलेश यादव के विरोध में बयानबाजी की है। पश्चिमी जिलों के नेताओं ने तो उन्हें अवसरवादी एवं स्वार्थी कहा है और उन्हें चुनाव में मजा चखाने की बात कही है। ऐसे हालातों में पश्चिमी उ.प्र. का और विशेषकर आजम खान को नेता मानने वाला मुस्लिम वोट स.पा. को नहीं मिलेगा। इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश में पड़ेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोट स.पा. से छिटका था इसलिए बहुजन समाज पार्टी के 10 लोकसभा सदस्य चुने गए थे जबकि स.पा. के उससे आधे यानी 5, वो भी मुलायम सिंह और अखिलेश को मिलाकर। पंजाब में कांग्रेस की स्थिति पहले से बेहतर दिखाई दे रही थी, जिसके कई कारण थे। पंजाब में अकाली दल और भाजपा का गठबंधन टूट जाने के कारण कांग्रेस अपने आप को सुरक्षित मान रही थी। शायद इसलिए कांग्रेस हाईकमान ने अमरिन्दर सिंह के बढ़ते कद को छाँटने के लिए उनके धुर विरोधी नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर भेजा है लेकिन ये गोट अब उलटी पड़ गई है। पंजाब में कांग्रेस की सरकार का फिर से बन जाना संभव नहीं लगता है। दोनों गुटों में बात इतनी बढ़ गई है कि सिद्धू के लोग खुलकर प्रेस में अमरिन्दर सरकार को भ्रष्ट नकारा बतला रहे हैं।

यही हाल उत्तराखंड में कांग्रेस ने अपने पांव में कुल्हाड़ी मारकर किया है। भा.ज.पा. ने जल्दी-जल्दी मुख्यमंत्री बदलकर जो नुकसान उठाना था उस नुकसान की भरपाई कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष बदल कर दी है। चुनाव के 6 माह पहले उत्तराखंड का अध्यक्ष बदला और नए अध्यक्ष को टीम वहीं मिली जो पूर्व मुख्यमंत्री हरीष रावत ने बनायी। नयी कमेटी मैं छांट-छांट कर सारे अपने लोगों को बड़े पद दे दिए। चलती पार्टी के पहिए को पंचर कर दिया। हरीष रावत जो पंजाब में संकट मोचन टीम के सदस्य हैं वहां तो कुछ गुल खिला नहीं पाये। यहां उन्होंने गुल खिलाने के बजाय उठती हुयी पार्टी को वापस जहां का तहां भेज दिया। पिछले चुनाव में उनके बेटे ने चुनाव लड़ा था, उनकी जमानत जब्त हो गई थी। वह फिर से अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते हैं। टिकट के बंटवारे में भी यही होने वाला है नया अध्यक्ष रावत की कठपुतली की तरह काम करेगा और राहुल गांधी हमेशा की तरह गच्चा खा जायेगें। सच पूछो तो उत्तराखंड में नए अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हरीष रावत की दुकड़ी ने भा.ज.पा. की जीत की कठिन राह को आसान कर दिया है।

आने वाले विधानसभा चुनाव का समीकरण ऐसा बन गया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तो भा.ज.पा. की जीत आज ही सुनिश्चित लग रही है। पंजाब में इसीलिए कांग्रेस के जीतने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। अकालियों की पौ बारह हो गई है इसीलिये  भाजपा का ग्राफ भी बढ़ चला है भा.ज.पा. पहले से अधिक सीटें पा सकती है। ये भी हो सकता है कि अमरिन्दर सिंह हाईकमान और सिद्धू से तंग आकर अपनी पार्टी बनाएं और अकेले दम पर चुनाव लड़े ऐसे में खिचड़ी सरकार बनेगी। पंजाब में शायद ही किसी एक पार्टी को बहुमत मिले क्योंकि गिरी से गिरी हालत में आप पार्टी भी कुछ सीटें जीतेगी और हो सकता है। भा.ज.पा. कैंप में खुशी है कि हरीष रावत ने उत्तराखंड में और  नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब में कांग्रेस पार्टी की लुटिया डुबोने का काम कर दिया। उ.प्र. में मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्व में भा.ज.पा. सरकार बनाने के लिए पूरी अस्वस्थ है और ऐसा राजनैतिक विशेषज्ञ भी मानते है।

 

Deepak Kumar Rath


डॉ. विजय खैरा

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