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भिक्षावृति उन्मूलन व पुनर्वास की जरुरत

भिक्षावृति उन्मूलन व पुनर्वास की जरुरत

भारत के अधिकांश राज्यों में भिक्षावृत्ति को अपराध घोषित कर दिया गया है। जेल और जुर्माना भी निर्धारित है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में भीख मांगना दंडनीय अपराध माना गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन्हीं स्थानों पर हजारों की संख्या में भिखारी सड़कों, स्टेशनों, सार्वजनिक स्थानों, मोहल्लों, कॉलोनियों आदि में आसानी से भीख मांगते देखे जा सकते हैं। ऐसे कई कारण हैं जो देश में भिक्षावृत्ति को जन्म देते हैं। गरीबी और बेरोजगारी एक ऐसा आर्थिक कारक है जो भीख मांगने को बढ़ावा देता है।

 

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने एक मानवीय और सराहनीय फैसला दिया है। कोरोना संक्रमण के नाम पर भिखारियों को सड़कों से हटाने के लिए दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने भिखारियों और बेघरों को सड़कों से हटाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हम ऐसा अभिजात्य आदेश नहीं दे सकते। लोग मजबूरी में भीख मांगते हैं। यह स्थिति शिक्षा और रोजगार में अवसरों की कमी से पैदा होती है। सवाल यह उठता है कि इंसान भीख मांगने की बजाए कुछ काम क्यों नहीं करता। इसका सीधा सा जवाब यह है कि वह भीख मांगने को ही काम मानता है।

दरअसल, भारत के अधिकांश राज्यों में भिक्षावृत्ति को अपराध घोषित कर दिया गया है। जेल और जुर्माना भी निर्धारित है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में भीख मांगना दंडनीय अपराध माना गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन्हीं स्थानों पर हजारों की संख्या में भिखारी सड़कों, स्टेशनों, सार्वजनिक स्थानों, मोहल्लों, कॉलोनियों आदि में आसानी से भीख मांगते देखे जा सकते हैं। ऐसे कई कारण हैं जो देश में भिक्षावृत्ति को जन्म देते हैं। गरीबी और बेरोजगारी एक ऐसा आर्थिक कारक है जो भीख मांगने को बढ़ावा देता है। अंधे, लंगड़े, लूले और अपाहिजों तथा रोगियों के कल्याण के लिए देश में पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अत: वे भीख मांगने को मजबूर हैं। अन्य सामाजिक कारण भी भिक्षावृत्ति को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए, निचली जातियों की विधवाएं या परित्यक्त महिलाएं भीख मांगती हैं। इसके अलावा कई मानसिक रोगी या गंभीर मानसिक संघर्ष से पीडि़त लोग आवारा बन जाते हैं और भीख मांगकर जीवन यापन करते हैं। बाढ़, भूकंप या अकाल आदि आपदाओं के कारण हजारों लोग बेघर और असहाय हो जाते हैं और अपने जीवन यापन के लिए भीख मांगने लगते हैं। अनाथ बच्चे और कमाने वाले की मौत भी कभी-कभी घर की महिलाओं और बच्चों को भिखारी बना देती हैं।

गौरतलब है कि 2018 में सामाजिक कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश में कुल 4,13,670 भिखारी हैं। जिनमें से 2,21,673 पुरुष और 1,91,997 महिलाएं हैं। सबसे ज्यादा भिखारी पश्चिम बंगाल में हैं। यहां भिखारियों की संख्या 81,000 है। केंद्र शासित प्रदेशों में भिखारियों की संख्या सबसे कम है। लक्षद्वीप में 2, दादरा और नगर हवेली में 19, दमन और दीव में 22 और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 56 भिखारी हैं। राष्ट्रीय राजधानी में 2,187 और चंडीगढ़ में 121 भिखारी हैं। इस सूची में दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है, जहां भिखारियों की संख्या 65,835 है, जबकि आंध्र प्रदेश तीसरे नंबर पर है, यहां 30,218 भिखारी हैं। बिहार की बात करें तो यहां 29,723 भिखारी हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में असम में सबसे ज्यादा 22,116 और मिजोरम में सबसे कम 53 भिखारी है। एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में सालाना लगभग 215 करोड़ रुपये का भिक्षावृत्ति का कारोबार है। पूरे देश में पिछले लगभग 60 वर्षों से भिक्षावृत्ति निरोधक कानून चला आ रहा है, लेकिन भीख मांगने पर रोक लगाने में इस कानून को कोई खास सफलता नहीं मिली है। इस कानून को लाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि भिक्षावृत्ति को एक व्यवस्थित व्यवसाय न बनने दिया जाए, लेकिन भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक आदि कारकों ने मिलकर इस समस्या को बहुत गंभीर बना दिया।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है, जिनमें से 50 प्रतिशत का पुलिस पता ही नहीं लगा पाती है। इनमें से अधिकांश बच्चों को संगठित अपराध में लिप्त संगठनों द्वारा पोर्नोग्राफी, वेश्यावृत्ति, मानव अंगों के अवैध व्यापार समेत भिक्षावृत्ति में धकेल दिया जाता है। भिक्षावृत्ति से जुड़े नाबालिगों का प्रयोग संगठित अपराध समूह कई अवैध गतिविधियों में करते हैं। उदाहरण के लिए ड्रग पेडलर, अवैध हथियारों की आवाजाही, पुलिस या अन्य की निगरानी, चोरी समेत अन्य छोटे-मोटे अपराधों इत्यादि में। इसके साथ ही कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि हत्या, लूट जैसे गंभीर मामलों में भी भिक्षावृत्ति में शामिल नाबालिगों का प्रयोग किया जाता है क्योंकि नाबालिगों के लिए कानून सख्त नहीं होते हैं और पकड़े जाने के बावजूद वह आसानी से कुछ समय बाद मामूली सजा काट कर वापस लौट आते हैं। इसके साथ ही भिक्षावृत्ति से जुड़े इन लोगों का मानसिक और शारीरिक उत्पीडऩ किया जाता है जो कि गंभीर चिंता का विषय है।

भिक्षावृत्ति की पृष्ठभूमि में बेरोजगारी और निर्धनता की अहम भूमिका है। इसलिए देश में उत्पादन के साधनों को बढ़ाना होगा। योजनाओं के माध्यम से ऐसी व्यवस्था करनी होगी ताकि हर कुशल और अकुशल श्रमिक को नौकरी मिल सके। शहरों और महानगरों में गुप्त तरीके से काम करने वाली कई ऐसी संस्थाएं हैं, जो बच्चों को पकड़कर, पीटकर, धमकाकर या अपंग बनाकर बेवजह भीख मंगवाती हैं। ऐसे संगठनों का पता लगाया जाना चाहिए और ऐसे संगठन चलाने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। जो व्यक्ति या परिवार बाढ़, सूखा, पाला या किसी अन्य कारण से आर्थिक पतन के कगार पर पहुंच गया है, उसे बहाल करने के लिए वित्तीय सहायता दी जानी चाहिए। हमें ऐसी व्यवस्था भी करनी होगी कि भिखारियों के बच्चे भीख न मांगें। इसके लिए उनके बच्चों को शिक्षा देनी होगी। समाज में अधिक से अधिक अनाथालय एवं शरणालयों की स्थापना की जाए, जहां विकलांगों का इलाज हो और अनाथ बच्चों को सार्थक एवं कुछाल नागरिक बनाया जाए। ऐसा जनमत तैयार करना होगा कि अंधविश्वास के कारण और पुण्य परोपकार भावना के वशीभूत होकर व्यक्ति को दान के रूप में भिक्षा नहीं दे। इससे समाज में भिखारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

जो लोग शारीरिक और मानसिक रोगों से पीडि़त हैं और मजबूरी में भिखारी बन जाते हैं, उनका उचित इलाज होना चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए विभिन्न कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए ताकि उनमें आत्मविश्वास विकसित हो सके और वे भीख मांगने के जघन्य कृत्य में शामिल न हो सकें। अनाथ बच्चों, विधवा महिलाओं और गरीब परिवारों पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्हें विभिन्न कुटीर उद्योगों में उनकी उम्र के अनुसार प्रशिक्षण देना होगा ताकि वे अपनी आजीविका कमा सकें। भिक्षावृत्ति को समाप्त करने के लिए हमें पहले पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था को समाप्त करना होगा। ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी होगी जिसमें हर व्यक्ति को नौकरी मिल सके या जीविकोपार्जन के ऐसे साधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि लोग आसानी से जीवन निर्वाह कर सकें। कहा जाता है कि समस्या के कारण में ही समाधान होता है। आमतौर पर जिन कारणों से भीख मांगने को बढ़ावा दिया जाता है, अगर उन कारणों को दूर कर लिया जाए तो भीख मांगने की समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है। अब समय आ गया है जब हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकारों पर दबाव बनाने की आवश्यकता है। राजस्थान में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की कुछ योजनाओं के माध्यम से भीख मांगने वाले बच्चों का पालन पोषण किया जा रहा है। इसमें पालनहार योजना, निराश्रित बाल गृह, शिशु गृह योजना और पालन गृह योजना आदि शामिल हैं। ऐसी योजनाओं को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अपनाए जाने की दरकार है।

 

देवेन्द्रराज सुथार

 

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