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जातिगत राजनीति का मकडज़ाल

जातिगत राजनीति का मकडज़ाल

ऐसा कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता लेकिन विगत कुछ वर्षों से भारत की राजनीति में भूचाल आना लगभग स्थाई सा हो गया है। ताज़ा भूचाल जातिगत जनगणना को लेकर है। लगभग सभी राजनीतिक दलों, विशेष रूप से क्षेत्रीय दलों के द्वारा जाति आधारित जनगणना के लिए  तीखे स्वर, एवं दबाव एक वैचारिक दिवालियेपन की ओर इशारा करता हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में यह कहना उचित होगा की स्वतंत्रता के बाद भारत में आयोजित प्रत्येक जनगणना में धर्मों, भाषाओं और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में विवरण प्रकाशित करने के अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी की गणना की गई है। हालाँकि, सरकार ने ओबीसी के बारे में विवरण एकत्र नहीं किया है, जिन्हें जनगणना में सामान्य श्रेणी के साथ जोड़ा जाना जारी है। जबकि ओबीसी को जनगणना की कवायद में वर्गीकृत नहीं किया गया है, इन समूहों को कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के तहत लाभ मिल रहा है। पिछली ओबीसी जनगणना अंग्रेजों के राज में  1931 में हुई थी, जब उनकी आबादी का हिस्सा 52 प्रतिशत पाया गया था। 2011 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए-।। सरकार  दबाव के आगे झुकी, और ओबीसी के बारे में विवरण एकत्र किया गया, लेकिन आंकड़ों में अशुद्धि के दावों के बीच सरकार ने रिपोर्ट प्रकाशित करने से परहेज किया। यहाँ इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की नई जातियों को उच्च सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में लाने के लिए जो राजनीतिक प्रयास  लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा किये गए, वे भारतीय लोकतंत्र की एक शानदार उपलब्धि है, जिसे निश्चित रूप से जाति-आधारित जनगणना से खतरा होगा, क्योंकि यह आगे एक विभाजन पैदा करेगा और कई तरह से कई  विशेष जातियों की पहुंच को प्रतिबंधित करेगा।

इस सन्दर्भ में यह अत्यंत उल्लेखनीय है की संविधान के अनुच्छेद 14 में इसीलिए समानता को मूल अधिकार में शामिल किया गया। यह ठीक है कि आजादी के कुछ साल बाद तक के लिए जातीय आधार पर आरक्षण दिया गया। वैसे इसे अनंतकाल तक लागू किए जाने के खिलाफ खुद बाबा साहेब अंबेडकर भी थे। उनका भी राम मनोहर लोहिया की तरह मानना था कि इस व्यवस्था से समाज में समानता आएगी और फिर किसी को विशेष दर्जा देने की जरूरत नहीं रहेगी। लेकिन इसका ठीक उलट हुआ। चूंकि जातियां राजनीति का नया हथियार बनती चली गईं, यही वजह है कि जातीय जनगणना की मांग उठ रही है। जातीय जनगणना की मांग करने वाले उन जातियों का और ज्यादा समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं, जिनकी बुनियाद और समर्थन पर उनकी राजनीति टिकी हुई है। लेकिन इसका उलटा यह होना है कि जैसे ही जातीय जनगणना हुई, संख्या के लिहाज से जो जातियां ताकतवर होंगी, वे अपने लिए और हिस्सेदारी मांगेंगी। अत: अब समय आ गया है कि इस देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग समझें कि अगर एक देश के रूप में हम लोगों को तरक्की करनी है तो वो योग्यता और एकता के दम पर ही हो सकती है। अगर देश को आगे ले जाना है तो नीतियों का लाभ उसके असली हकदार को मिलना चाहिए, कतार में खड़े आखरी व्यक्ति को, चाहे वो किसी भी जाति का हो। लेकिन जिस देश में नीतियां जातिगत आधार पर बनाई जाती हों, जिस देश के चुनावों में टिकट जाति के आधार पर बांटें जाते हों, जिस देश में मंत्रियों के पद जातिगत आधार पर दिए जाते हों उस देश में जनगणना की मांग जातिगत आधार पर की जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तो अब प्रश्न यह है कि क्या इक्कीसवीं सदी का भारत जातिगत भेदभाव के आधार पर बनेगा?

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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