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जातीय जनगणना : दोधारी तलवार

जातीय जनगणना : दोधारी तलवार

भाजपा को छोड़ कर धीरे-धीरे जातीय राजनीति करने वाले सारे राजनीतिक दल साथ खड़े हो रहे हैं। 2022 से पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बीजेपी को घेरने के लिए जातीय जनगणना का कार्ड खेल दिया है। अखिलेश यादव ने संसद में इसकी मांग उठाते हुए कह दिया कि अगर बीजेपी जातियों की गिनती नहीं करती तो ये पिछड़ों की जिम्मेदारी है कि वो बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दें।

 

जातीय जनगणना का सवाल एक बार फिर राजनीतिक गलियारे में घूमने लगा है। विपक्ष में शामिल कई दलों के साथ-साथ एनडीए खेमे से भी जाति आधारित जनगणना की मांग उठ रही है।  ये सियासत की एक ऐसी नब्ज़ है जिसके बिना राजनीति चल नहीं सकती। यह भी एक अलग सच्चाई है की सियासत का चाल-चलन ही कुछ ऐसा है कि यहां दो नेताओं की दुश्मनी कब, किस मुद्दे पर दोस्ती में बदल जायेगी, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।  इन दिनों यही सब बिहार की राजनीति में देखने को मिल रहा है कि जहां जाति आधारित जनगणना कराये जाने के मसले पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव एक साथ आ गए हैं।  लेकिन केंद्र सरकार ने संसद के इस सत्र में स्पष्ट कर दिया है कि 2021 में होने वाली जनगणना जातीय आधार पर नहीं होगी।

जातिवाद के चरम पर बिहार

बिहार में जातीय जनगणना को लेकर राजनीति जोरों पर है।  आरजेडी और जेडीयू  दोनों इस मुद्दे पर माइलेज लेना चाहती हैं।  इस मसले पर आरजेडी लगातार मुखर रही है और बीते 7 अगस्त को उसने बड़ा दांव चल दिया। मंडल दिवस के दिन जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर आरजेडी ने 7 अगस्त को पूरे राज्य में प्रदर्शन किया। दरअसल, पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 7 अगस्त 1990 को मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की थी। इसके तहत पूरे देश में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला हुआ था।

उस दौर में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव सरीखे नेताओं ने इस मुद्दे को भुनाकर सत्ता के शिखर पर पहुंचने में खुद को कामयाब बनाया था। ज़ाहिर है तेजस्वी अपने पिता की तर्ज पर उसी राजनीति को चमकाने की फिराक में हैं और सियासी पिच पर अपने तथाकथित चाचा नीतीश कुमार को पटखनी देना चाहते हैं।

यहाँ यह बता देना जरुरी है कि फरवरी 2019 में बिहार विधानमंडल और 2020 में बिहार विधानसभा में जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव पास हो चुका है। बिहार सरकार दोनों सदनों से जाति आधारित जनगणना कराने को लेकर केंद्र सरकार को अब तक दो बार प्रस्ताव भी भेज चुकी है, लेकिन दोनों बार केंद्र सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिरकार बिहार की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां जेडीयू और आरजेडी जाति आधारित जनगणना क्यों कराना चाह रही हैं? बिहार के सीएम नीतीश कुमार और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव जातिगत जनगणना करा कर क्या हासिल करना चाहते हैं? जातिगत जनगणना कराने के पीछे कहीं दोनों पार्टियों की राजनीतिक चाल तो नहीं है?

अब इसमें तो कोई शक है नहीं की  बिहार में जेडीयू और आरजेडी के साथ-साथ बाकी पार्टियां सत्ता प्राप्त करने के लिए जातिगत समीकरणों पर ही ज्यादा भरोसा करती हैं।   बिहार में जातिगत जनगणना को लेकर भले ही मत अलग-अलग रहे हों, लेकिन बिहार में जातिगत राजनीति का ही बोलबाला रहा है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार जातिगत जनगणना करा कर ओबीसी वोटबैंक को साधने की कवायद में लगे हुए हैं तो वहीं आरजेडी जनगणना करा कर ओबीसी वोटबैंक को और मजबूत करेगी।  अभी तक सिर्फ एससी और एसटी की ही गणना होती रही है, लेकिन पहली बार ओबीसी को भी जनगणना में शामिल कराने की मांग की गई है।

दरअसल, जातिगत जनगणना की मांग के पीछे एक बड़ा सियासी मकसद है।  देश में मंडल कमीशन की रिपोर्ट 1991 में लागू की गई, लेकिन 2001 में हुई जनगणना में जातियों की गिनती नहीं की गई। लेकिन पिछले दो दशकों में अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी की संख्या बेहद तेजी से बढ़ी है जिसने देश की राजनीति के समीकरणों को भी बदलकर रख दिया है।   इन सालों में ओबीसी समुदाय का सियासत में भी तेजी से दखल बढ़ा है।  केंद्र से लेकर राज्यों तक की सियासत में ओबीसी समुदाय की तूती बोलने लगी और राजनीतिक दलों को भी उनके बीच अपनी पैठ जमाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

चूंकि बिहार में ओबीसी के बीच आरजेडी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, लिहाज़ा नीतीश भी ये जानना चाहते हैं कि आखिर उनके राज्य में कितने ओबीसी वोटर हैं, ताकि उनका विश्वास हासिल करने के लिये उसी हिसाब से आगे की राजनीति की जाये।  यही कारण है कि वे जाति आधारित जनगणना कराये जाने का प्रस्ताव दो बार विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेज चुके हैं लेकिन मोदी सरकार ने उसे मानने से इनकार कर दिया है। चूंकि जनता दल (यू)केंद्र सरकार में भागीदार भी है, इसलिये नीतीश ने दबाव बनाने के लिए कुछ देर के लिए ही सही लेकिन लालू का साथ लेना उचित व जरुरी समझा।

देश के अलग-अलग राज्यों में ये ओबीसी वोटर अलग-अलग पार्टियों के साथ हैं।  यूपी में बीजेपी और सपा के बीच ओबीसी वोटर बंटा हुआ है तो बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव के अलावा अब वह बीजेपी के साथ भी जुड़ा है।

हालांकि ओबीसी जाति के बढ़ते प्रभाव के बीच ही इन जातियों के नेता लंबे वक्त से जाति आधारित प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार के वक्त से ही देश के एक बड़े हिस्से में जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश प्रमुख है, यह मांग उठती रही है कि अगर ओबीसी जातियों की 50 फीसदी हिस्सेदारी है तो उनके आरक्षण का अंश सिर्फ 27 फीसदी ही क्यों है?

वैसे इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिका लंबित है, जिसमें कहा गया है कि 2021 में होने वाली जनगणना के फॉर्म में धर्म, एस सी/एस टी  स्टेटस का कॉलम है, लेकिन ओबीसी स्टेटस के बारे में कोई कॉलम नहीं है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक शिक्षा, रोजगार, चुनाव आदि में आरक्षण लागू करने में ओबीसी की जातिगत जनगणना की अहम भूमिका है।

गौरतलब है कि भारत में जनगणना 1872 से हो रही है और यह सिलसिला कभी टूटा नहीं है।  साल 1931 तक सभी जातियों की गिनती होती थी और जनगणना की रिपोर्ट में सभी जातियों की संख्या और उसकी शैक्षणिक, आर्थिक हालत का ब्यौरा भी होता था। वर्ष 1941 में जो जनगणना की गई उसमें जाति का कॉलम तो था, लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के चलते इसका काम ठीक से नहीं हो पाया और आंकड़े सामने नहीं आए।

 

भाजपा के गले की फांस

भाजपा को छोड़ कर धीरे-धीरे जातीय राजनीति करने वाले सारे राजनीतिक दल साथ खड़े हो रहे हैं।  2022 से पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बीजेपी को घेरने के लिए जातीय जनगणना का कार्ड खेल दिया है।  अखिलेश यादव ने संसद में इसकी मांग उठाते हुए कह दिया कि अगर बीजेपी जातियों की गिनती नहीं करती तो ये पिछड़ों की जिम्मेदारी है कि वो बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दे।  वहीं मायावती भी इस मसले पर पीछे नहीं रहना चाहतीं। मायावती ने कहा कि ओबीसी समाज की अलग से जनगणना कराने की मांग बसपा शुरू से ही करती रही है। अभी भी बसपा की यही मांग है और इस मामले में केंद्र की सरकार अगर कोई सकारात्मक कदम उठाती है तो फिर बसपा इसका समर्थन जरूर करेगी। तो आखिर क्या कारण है की भाजपा जातिगत जनगणना से पीछे हट रही है? दरअसल भाजपा कभी भी नहीं चाहेगी कि हिंदुस्तान में हिंदू समाज जातियों के आधार पर इतना बंट जाए कि फिर उन्हें एक साथ लाना नामुमकिन हो जाए। इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती की भाजपा की राजनीति ही हिंदुत्व के मुद्दे पर टिकी होती है।  हिंदुत्व का मतलब पूरा हिंदू समाज है, अगर उसे जाति के नाम पर तोड़ दिया जाए तो भारतीय जनता पार्टी का वोट बैंक और उसके राजनीति का आधार ही खत्म हो जाएगा।  इसलिए बीजेपी हर चुनाव में कोशिश करती है कि देश में जाति आधारित मुद्दों को हटाकर राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के मुद्दे पर लोगों को एक साथ लाया जाए और तब चुनाव लड़ा जाए। पर हिंदी हार्ट लैंड यानि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा में जाति आधारित पार्टियां बहुत मजबूत जड़े जमाये हुए हैं।

आज भले ही भाजपा संसद में इस तरह के जातिगत जनगणना पर अपनी राय कुछ और रख रही हो, लेकिन 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में संसद में भाजपा के नेता गोपीनाथ मुंडे ने कहा था, ”अगर इस बार भी जनगणना में हम ओबीसी की जनगणना नहीं करेंगे, तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएंगे। हम उन पर अन्याय करेंगे।ÓÓ इतना ही नहीं, पिछली सरकार में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, उस वक्त 2021 की जनगणना की तैयारियों का जायजा लेते समय 2018 में एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि नई जनगणना में ओबीसी का डेटा भी एकत्रित किया जाएगा। लेकिन अब सरकार इससे पीछे हट रही है।  ध्यान देने वाली बात यह भी है की ओबीसी कार्ड खेलने में भाजपा पीछे नहीं है।  हाल में ही केंद्र ने मेडिकल एजुकेशन में 10 फीसदी आर्थिक पिछड़ों के साथ-साथ 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को मंजूरी दी है, तो वहीं मोदी मंत्रिमंडल में भी सबसे ज्यादा मंत्री ओबीसी से ही हैं।  लेकिन फिलहाल सरकार ने इस मुद्दे को बस्ते में डालना ही उचित समझा है।

जातियों के नए आंकड़े जारी ना करने का फैसला सरकार के भीतर से मंथन के बाद आया लगता है। 2016 में जब सामाजिक आर्थिक सर्वे का आंकड़ा तैयार हुआ, तब उसमें जातियों के आंकड़ों में गड़बड़ी के आधार पर उसे जारी नहीं करने का फैसला हुआ लेकिन एक एक्सपर्ट ग्रुप ने इन आंकड़ों को परखा, एक्सपर्ट ग्रुप की रिपोर्ट का क्या हुआ यह कोई नहीं जानता। अब जब सरकार जातियों का नया आंकड़ा बताने से पीछे हट गई है, तो इसमें राजनीति की कोई नई समझ का प्रभाव हो सकता है।  हालांकि सरकार के सामने सिर्फ नीतीश जैसे सहयोगियों का दबाव ही नहीं है, खुद भाजपा के भीतर से जाति जनगणना के समर्थन का खुल्लम खुल्ला ऐलान है।  जाति जनगणना की राजनीति भाजपा के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है।  अपनों की लामबंदी और विपक्ष के तेवर से जाति जनगणना का तूफान खड़ा हो सकता है।

जातीय जनगणना का भविष्य क्या होगा यह तो कहना फिलहाल मुश्किल है लेकिन इस जनगणना का होना कही से भी गलत नहीं लगता, ऐसा  कहना है दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक डॉ विवेक सिंह का। उनके मुताबिक इस जनगणना से ना सिर्फ किसी भी जाति की शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर की  जानकारी मुहैया हो सकेगी बल्कि यह भी सामने आ सकेगा की किस जाति का वास्तविक शोषण हो रहा है। उनका यह भी मानना  है की नीतीश और तेजस्वी इस मुद्दे पर सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की जुगत में हैं और जमीनी धरातल पर इन जातियों के विकास से उनका कुछ लेना देना नहीं है।

दरअसल जाति आधारित जनगणना सत्ताधारी दल के लिए काउंटर प्रोडक्टिव हो सकती है। जनगणना में ओबीसी की आबादी कम होने या बढऩे पर राजनीति के रुख बदल सकते हैं।  दरअसल आदिवासियों और दलितों की गिनती में फ़ेरबदल की गुंजाइश कम है क्योंकि वो हर जनगणना में गिन लिए जाते हैं।  जातिगत जनगणना में अपर कास्ट और ओबीसी की संख्या घट बढ़ सकती है जो सरकार के लिए नई मुसीबतें खड़ी कर सकती है। जाति आधारित जनगणना राजनीति को जन्म देती है और पार्टियां और एसोसिएशन इस आधार पर बनते रहे हैं।  लेकिन मंडल का वो दौर बीत चुका है और ओबीसी केंद्रित कई पार्टियां सत्ता का सुख भोग रही हैं।  वैसे साल 1931 के बाद से जातिगत जनगणना नहीं हुई है फिर भी जाति आधारित राजनीति भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा रही है। सवाल नितीश और लालू प्रसाद के नए तेवर का है जो बिहार और यूपी जैसे राज्य में जाति आधारित मुद्दों पर बीजेपी के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है।

नीलाभ कृष्णा

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